ध्यान वह कला है जिसमें मनुष्य अपनी कल्पना शक्ति को केवल सोच में नहीं छोड़ता, बल्कि उसे धरती पर उतारता है।
जो भीतर दिखता है, वही बाहर बनना शुरू होता है।
हर निर्माण पहले एक अदृश्य चित्र होता है फिर वह शब्द बनता है, फिर कर्म, फिर वास्तविकता।
मनुष्य का सबसे बड़ा वरदान उसकी कल्पना शक्ति है।
पर अधिकांश लोग कल्पना केवल डरने, चिंता करने और असफलताओं को दोहराने में उपयोग करते हैं।
वे भविष्य को बनने से पहले ही टूटते हुए देख लेते हैं।
यही कारण है कि जीवन बिखरने लगता है।
ध्यान इस बिखराव को दिशा देता है।
ध्यान कल्पना को भ्रम से निकालकर सृजन में बदल देता है।
जब व्यक्ति शांत बैठता है, आँखें बंद करता है और भीतर उतरना शुरू करता है, तब उसे पता चलता है कि उसके भीतर कितनी आवाज़ें हैं।
कुछ आवाज़ें कहती हैं “तुम नहीं कर पाओगे।”
कुछ कहती हैं “दुनिया कठिन है।”
कुछ पुराने घावों को दोहराती हैं।
कुछ भविष्य का भय बनाती हैं।
धीरे-धीरे ध्यान इन आवाज़ों के पीछे छिपे मौन तक ले जाता है।
और उसी मौन में पहली बार व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप से मिलता है।
यहीं से कल्पना शक्ति बदलती है।
अब कल्पना डर की नहीं रहती।
अब वह निर्माण की भाषा बन जाती है।
जिस व्यक्ति ने अपने भीतर स्पष्ट देखना सीख लिया, वह बाहर भी स्पष्ट बनाना सीख जाता है।
हर महान आविष्कार, हर कला, हर विज्ञान, हर परिवर्तन पहले किसी के शांत मन में जन्मा था।
किसी ने पहले भीतर देखा फिर बाहर उसे आकार दिया।
ध्यान का पहला नियम है
मन को रोकना नहीं, मन को देखना।
जब व्यक्ति मन को देखने लगता है, तब उसे समझ आता है कि उसके भीतर लगातार चित्र बन रहे हैं।
यदि वे चित्र अंधकार से भरे हैं, तो जीवन में थकान बढ़ती है।
यदि वे चित्र स्पष्ट, शांत और जीवंत हैं, तो ऊर्जा बढ़ती है।
कल्पना शक्ति बीज है।
ध्यान मिट्टी है।
नियमित अभ्यास पानी है।
और कर्म सूर्य है।
इन चारों के मिलन से जीवन बदलता है।
सिर्फ बैठकर कल्पना कर लेना पर्याप्त नहीं।
यदि भीतर महल बनाए जाएँ लेकिन बाहर कदम न उठे, तो कल्पना नशा बन जाती है।
ध्यान व्यक्ति को जमीन से जोड़ता है।
वह सिखाता है कि हर दृश्य को कर्म में बदलना आवश्यक है।
यदि कोई अपने जीवन में समृद्धि चाहता है, तो उसे केवल धन की कल्पना नहीं करनी चाहिए।
उसे अपने भीतर उस व्यक्ति की छवि बनानी होगी जो अनुशासित है, केंद्रित है, धैर्यवान है, सीखने वाला है।
फिर उसी के अनुसार प्रतिदिन छोटे कर्म करने होंगे।
यही ध्यान की वास्तविक शक्ति है।
ध्यान कोई चमत्कार नहीं करता।
वह व्यक्ति को ऐसा बना देता है कि उसके कर्म चमत्कार जैसे दिखने लगते हैं।
जब मन शांत होता है, तब निर्णय स्पष्ट होते हैं।
जब निर्णय स्पष्ट होते हैं, तब ऊर्जा व्यर्थ नहीं जाती।
जब ऊर्जा बचती है, तब कल्पना गहरी होती है।
और जब कल्पना गहरी होती है, तब जीवन दिशा पकड़ लेता है।
आज अधिकांश लोग इसलिए थके हुए हैं क्योंकि उनका मन हर क्षण बिखरा हुआ है।
वे एक साथ हजार दिशाओं में सोचते हैं।
उनकी कल्पना शक्ति नियंत्रण में नहीं, दुर्घटना में बदल चुकी है।
ध्यान उस दुर्घटना को व्यवस्था देता है।
प्रतिदिन कुछ समय स्वयं के साथ बैठना आवश्यक है।
शरीर स्थिर।
श्वास धीमी।
आँखें बंद।
और केवल देखना।
शुरुआत में बेचैनी होगी।
मन भागेगा।
पुरानी बातें आएँगी।
भविष्य के दृश्य आएँगे।
लेकिन अभ्यास जारी रखने पर भीतर एक गहराई खुलती है।
उस गहराई में व्यक्ति समझता है कि वह केवल परिस्थितियों का परिणाम नहीं है।
उसके भीतर सृजन करने की क्षमता है।
वहीं से कल्पना शक्ति धरती पर उतरनी शुरू होती है।
यदि कोई लेखक है, तो शब्द साफ होने लगते हैं।
यदि कोई व्यापारी है, तो निर्णय मजबूत होने लगते हैं।
यदि कोई कलाकार है, तो अभिव्यक्ति गहरी होने लगती है।
यदि कोई विद्यार्थी है, तो समझ बढ़ने लगती है।
ध्यान किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं है।
यह मानव चेतना को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया है।
कल्पना शक्ति को वास्तविकता में बदलने का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि व्यक्ति पहले भीतर वही बन जाए जो वह बाहर बनाना चाहता है।
यदि भीतर डर है, तो बाहर संघर्ष बढ़ेगा।
यदि भीतर स्पष्टता है, तो बाहर मार्ग बनने लगेंगे।
ध्यान धीरे-धीरे व्यक्ति को प्रतिक्रियाओं से मुक्त करता है।
फिर वह हर परिस्थिति में स्थिर रहने लगता है।
और स्थिर व्यक्ति की कल्पना शक्ति सबसे प्रभावशाली होती है।
क्योंकि उसका मन धुएँ से भरा नहीं होता।
वह साफ दर्पण बन जाता है।
जब मन दर्पण बनता है, तब जीवन की दिशा दिखने लगती है।
कल्पना का अर्थ केवल सपना देखना नहीं।
कल्पना का अर्थ है
जिसे अभी दुनिया नहीं देख पा रही, उसे भीतर इतनी स्पष्टता से देखना कि वह धीरे-धीरे वास्तविकता बन जाए।
ध्यान इस स्पष्टता को जन्म देता है।
इसलिए जो व्यक्ति अपने जीवन को बदलना चाहता है, उसे पहले अपने भीतर बैठना सीखना होगा।
भीतर जितनी शांति बढ़ेगी, बाहर उतनी शक्ति प्रकट होगी।
संसार की सबसे बड़ी शक्ति मनुष्य की सजग चेतना के भीतर छिपी है।
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