Friday, May 15, 2026

किरलियान फोटोग्राफी और मृत्यु का रहस्य

 किरलियान फोटोग्राफी और मृत्यु का रहस्य – जब विज्ञान ने योग की पुष्टि की


मित्रो, आज हम किरलियान फोटोग्राफी के उन प्रयोगों पर विस्तार से चर्चा करेंगे जिन्होंने मृत्यु, ऊर्जा और सूक्ष्म शरीर से जुड़े भारतीय योग के रहस्यों को वैज्ञानिक प्रमाण दिया है।


इलेक्ट्रिकल इंजीनियर शिमोन किरलियान और उनकी पत्नी वेलेंटीना ने 1939 में एक अनोखी फोटोग्राफी तकनीक विकसित की। इस तकनीक में वस्तुओं और जीवों को उच्च आवृत्ति वाले विद्युत क्षेत्र में रखकर फोटो खींचे जाते हैं। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि फोटो में शरीर के चारों ओर एक चमकदार रंगीन आभा – जिसे ‘बायो-प्लाज्मा’ या ‘ऊर्जा क्षेत्र’ कहा गया – स्पष्ट दिखाई देती है। यह आभा वही है जिसे भारतीय योग परंपरा में ‘तेजोबलय’ या ‘आभा’ (आभा मंडल) कहा गया है।


मरने के बाद भी ऊर्जा का बहना


किरलियान ने मरते हुए व्यक्ति के फोटो लिए। उन्होंने देखा कि व्यक्ति के शरीर से ऊर्जा के छल्ले लगातार बाहर विसर्जित हो रहे थे। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि यह प्रक्रिया चिकित्सकीय रूप से मृत्यु होने के बाद भी तीन दिनों तक जारी रही।


यही कारण है कि भारतीय परंपरा में शव का अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद किया जाता था। क्योंकि यह माना जाता था कि सूक्ष्म शरीर (प्राणमय कोश) को स्थूल शरीर से पूरी तरह अलग होने में यही समय लगता है। अब तो हम सुबह मरा शाम जला देते हैं – पर यह प्रक्रिया तीन दिन बाद भी पूरी नहीं हुई होती।


वैज्ञानिक तो यहाँ तक कह रहे हैं कि तीन दिनों के भीतर मनुष्य को पुनर्जीवित किया जा सकता है। क्योंकि तब तक सूक्ष्म शरीर पूरी तरह से नहीं छूटता।


क्रोध – एक छोटी मृत्यु


किरलियान के प्रयोगों में एक और महत्वपूर्ण खोज हुई। जब व्यक्ति क्रोध की अवस्था में होता है, तो उसके शरीर से ऊर्जा के छल्ले निकलते हैं – ठीक उसी प्रकार जैसे मृत्यु के समय निकलते हैं।


अंतर केवल इतना होता है – मृत्यु के समय ऊर्जा के छल्ले बाहर निकलते हैं और वापस नहीं आते। क्रोध में यह ऊर्जा तो निकलती है, पर व्यक्ति के शांत होने पर वापस लौट भी सकती है।


पर यदि बार-बार क्रोध किया जाए, तो हर बार कुछ ऊर्जा हमेशा के लिए चली जाती है। क्रोध भी एक छोटी मृत्यु के समान है। जब तुम क्रोध करते हो, तो तुम मर रहे हो – थोड़ा-थोड़ा करके। क्रोधी व्यक्ति का जीवनकाल घट जाता है – यह अब चिकित्सा विज्ञान भी मानता है।


मृत्यु की प्रक्रिया छह माह पहले शुरू हो जाती है


सबसे चौंकाने वाली खोज किरलियान ने मृत्यु के समय के संबंध में की। उन्होंने देखा कि मरने से ठीक छह महीने पहले मनुष्य के शरीर से ऊर्जा के छल्ले कमजोर पड़ने लगते हैं और धीरे-धीरे अलग-अलग भागों से निकलने लग जाते हैं। यानी मरने की प्रक्रिया छह माह पहले ही शुरू हो जाती है।


जैसे मनुष्य का शरीर माँ के पेट में नौ महीने विकसित होने में लेता है, वैसे ही उसे मिटने के लिए छह माह का समय चाहिए।


यहाँ एक गणितीय समानता देखें – नौ महीने जन्म के लिए, छह महीने मृत्यु के लिए। कुल मिलाकर, हमारा शरीर पन्द्रह-सोलह महीने के चक्र में बंधा हुआ है – जन्म से जन्म तक। भारत में हजारों वर्षों से योगी मरने के छह माह पहले अपनी मृत्यु तिथि बता देते थे। अब विज्ञान इसकी पुष्टि कर रहा है।


विनोबा भावे ने महीनों पहले कह दिया था कि शरद पूर्णिमा के दिन वह अपनी देह त्यागेंगे। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने उत्तरायण के दिन मरने का संकल्प लिया और उसी दिन शरीर छोड़ा। यह छह माह की अवधि कोई संयोग नहीं है – इसमें कोई न कोई गहरा रहस्य अवश्य है।


हाथ की ऊर्जा छह माह पहले ही छूट गई थी


एक और अद्भुत प्रयोग किरलियान ने किया। उसने एक व्यक्ति की फोटो ली। फोटो में दिखा कि व्यक्ति के दाहिने हाथ से ऊर्जा प्रवाहित नहीं हो रही थी। जबकि हाथ शारीरिक रूप से बिल्कुल सामान्य, सक्रिय और ठीक था।


ठीक छह माह बाद एक दुर्घटना में उसी व्यक्ति का वही हाथ कट गया। यानी हाथ की ऊर्जा छह माह पहले ही अपना स्थान छोड़ चुकी थी – इसलिए हाथ का ‘भविष्य’ पहले से ही तय था।


यह प्रमाण है कि स्थूल शरीर में कोई भी घटना – चाहे वह बीमारी हो, दुर्घटना हो या मृत्यु – उसके घटित होने से छह माह पहले ही सूक्ष्म शरीर में उसकी प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यदि सूक्ष्म शरीर पर ही छह माह पहले उपचार कर दिया जाए, तो बहुत सी बीमारियों और दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है।


अतीन्द्रिय ज्ञान – पशु-पक्षी हमसे कहीं आगे


सवाल उठता है – यदि मृत्यु की प्रक्रिया छह माह पहले शुरू हो जाती है, तो मनुष्य को इसका एहसास क्यों नहीं होता? इसके दो मुख्य कारण हैं।


पहला, मनुष्य मृत्यु के नाम से इतना भयभीत है कि वह मृत्यु की चर्चा से भी बचता है। दूसरा, वह भौतिक वस्तुओं – पैसे, मकान, सामान, रिश्तों – में इतना डूब गया है कि उसने अपनी अतीन्द्रिय शक्तियों से नाता तोड़ लिया है।


पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी इतना दीन-हीन हो गया है, जबकि पशु-पक्षी भी अतीन्द्रिय ज्ञान में हमसे कहीं आगे हैं।


साइबेरिया में कुछ पक्षी ऐसे हैं जो बर्फ गिरने के ठीक 14 दिन पहले वहाँ से उड़ जाते हैं – न एक दिन पहले, न एक दिन बाद। जापान में एक विशेष चिड़िया है जो भूकम्प के ठीक 12 घंटे पहले वहाँ से गायब हो जाती है। चींटियाँ बारिश आने से पहले ही अपना बिल बंद करना शुरू कर देती हैं। कुत्ते भूकम्प आने से पहले ही भौंकने और भागने लगते हैं।


सुनामी आने से पहले जंगली जानवर पहाड़ियों की ओर भाग गए थे – जबकि मनुष्य समुद्र की ओर दौड़ा। हजारों मनुष्य मरे, पर लगभग कोई जानवर नहीं मरा। इतना ही नहीं, इन अतीन्द्रिय क्षमताओं के कारण ही ये प्रजातियाँ आज भी जीवित हैं। यदि वे इतने असंवेदनशील होते जितने हम हैं, तो शायद विलुप्त हो चुकी होतीं।


छोटी संध्या और बड़ी संध्या


जब आप रात को बिस्तर पर सोने जाते हैं, तो जागने और नींद के बीच एक अन्तराल आता है – एक संध्या काल। यह क्षण पल के हज़ारवें हिस्से के बराबर होता है। इसे ‘संध्या’ कहते हैं।


इस संध्या को देखने के लिए अत्यधिक सजगता और होश चाहिए। साधारण व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि कब वह जाग रहा था और कब नींद में गहरा गया। मनुष्य का चित्त इस संध्या से बिना परिचित ही जीवन भर निकल जाता है।


योगी वर्षों तक इस छोटी संध्या पर मेहनत करता है। जब वह उससे पूर्णतः परिचित हो जाता है, तो मरने के ठीक छह महीने पहले उसके चित्त की वही अवस्था सारे दिन के लिए हो जाती है। तब योगी समझ जाता है – अब मेरी बड़ी संध्या का समय आ गया है। और वह अपनी मृत्यु तिथि बता देता है। पर इसके लिए पहले छोटी संध्या के प्रति सजग होना आवश्यक है।


प्राण तत्व का शरीर छोड़ना


मृत्यु के समय हमारा सम्पूर्ण स्नायु तंत्र प्राण ऊर्जा का वर्तुल (घूमने की दिशा) उलट देता है। यानी शरीर तो साँस लेना जारी रखता है, पर उस साँस के साथ प्राण तत्व ग्रहण नहीं होता। शरीर प्राण तत्व छोड़ना शुरू कर देता है।


जिस प्रकार जीवन के लिए प्राण तत्व का ग्रहण आवश्यक है, उसी प्रकार मृत्यु के लिए प्राण तत्व का त्याग आवश्यक है। जब प्राण का ‘इनफ्लो’ बंद हो जाता है और ‘आउटफ्लो’ बढ़ जाता है, तो मृत्यु अनिवार्य हो जाती है।


एक प्रयोग – छोटी संध्या को पहचानो


रात में बिस्तर पर लेटते समय, जागने और नींद के बीच के उस सूक्ष्म अन्तराल को पहचानने का प्रयास करो। यह अत्यंत सूक्ष्म है और पहले-पहल शायद दिखे नहीं, पर नियमित प्रयास से धीरे-धीरे तुम इसे महसूस करने लगोगे।


अभ्यास की विधि – रात में सोते समय आँखें बंद करो और सजग रहो। जब नींद आने लगे, तो उसी क्षण नींद में मत बह जाओ – बस देखो कि “अब मैं नींद में जा रहा हूँ”। यह देखना ही संध्या को पहचानने का पहला कदम है। मात्र 2-3 मिनट का यह प्रयास करो, फिर सो जाओ। तीन माह के अभ्यास से तुम इस संध्या को स्पष्ट अनुभव करने लगोगे।


यही अभ्यास तुम्हें भीतर की उन सूक्ष्म प्रक्रियाओं के प्रति सजग करेगा, जिन्हें जानने के बाद तुम जीवन और मृत्यु दोनों को एक अलग नजरिए से देखोगे। तब तुम समझ जाओगे कि मृत्यु कोई दुःख नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है – उतनी ही स्वाभाविक जितना जन्म। और उस दिन तुम भय से मुक्त हो जाओगे।


एक लाइन में सार – “जन्म नौ माह में, मृत्यु छह में। दोनों के बीच का संध्या ही असली जीवन है – और उसे जाने बिना तू अधूरा है।”

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