लोग अक्सर बाहर की लड़ाइयों से नहीं, अपने ही भीतर उठते सवालों से हारने लगते हैं।
सबसे खतरनाक चोट वह नहीं होती जो शब्दों से दिखाई दे जाए, बल्कि वह होती है जो धीरे-धीरे इंसान को उसकी अपनी ही कीमत पर शक करना सिखा दे।
शुरुआत बहुत छोटी होती है
कुछ ताने, थोड़ी अनदेखी, भावनाओं को हल्के में लेना।
फिर एक दिन वही इंसान, जो पूरे दिल से किसी के साथ खड़ा था, खुद को ही गलत मानने लगता है।
उसे लगता है शायद उसकी उम्मीदें ज़्यादा थीं, उसका प्रेम भारी था, या उसकी संवेदनाएँ ही गलत थीं।
यहीं से इंसान भीतर टूटना शुरू करता है।
क्योंकि जब किसी को बार-बार यह महसूस कराया जाए कि उसकी भावनाओं की कोई अहमियत नहीं, तो वह दुनिया से पहले खुद पर शक करना सीख जाता है।
और जो इंसान अपनी ही सच्चाई पर भरोसा खो दे, उसके लिए हर रिश्ता धुंधला हो जाता है।
लेकिन हर टूटन सिर्फ दर्द नहीं देती, कुछ टूटन इंसान को उसकी असली आँखें भी दे जाती है।
तब समझ आता है कि प्रेम का मतलब खुद को मिटा देना नहीं होता।
समर्पण और आत्म-विलोपन में बहुत फर्क है।
जहाँ सच में प्रेम होता है, वहाँ आपकी आत्मा सुरक्षित महसूस करती है।
और जहाँ सिर्फ स्वार्थ होता है, वहाँ प्रेम के नाम पर धीरे-धीेरे नियंत्रण बोया जाता है।
बहुत लोग आकर्षण को गहराई समझ बैठते हैं।
तीव्र भावनाएँ उन्हें सच्चा प्रेम लगती हैं, जबकि कई बार वही भावनाएँ इंसान की समझ को धुंधला कर देती हैं।
उस हालत में इंसान सच नहीं देखता, वह सिर्फ वही देखता है जो उसका दिल देखना चाहता है।
इसीलिए कुछ रिश्ते इंसान को बेहतर नहीं बनाते, बल्कि उसकी शांति खा जाते हैं।
वह अपनी हँसी तक सोचकर देने लगता है।
अपने शब्द तौलने लगता है।
हर समय किसी की स्वीकृति का इंतज़ार करने लगता है।
लेकिन इंसान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है
वह टूटकर भी फिर से खुद को बना सकता है।
एक समय आता है जब उसे समझ आता है कि किसी का तिरस्कार उसकी कीमत तय नहीं कर सकता।
अगर कोई आपकी निष्ठा को समझ न पाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपकी निष्ठा छोटी थी।
कई बार समस्या प्रेम में नहीं, उस इंसान में होती है जो प्रेम को संभालने लायक ही नहीं होता।
असल परिपक्वता तब आती है, जब दर्द के बाद भी इंसान कठोर नहीं बनता।
वह सावधान जरूर होता है, लेकिन अपनी कोमलता को मरने नहीं देता।
क्योंकि जिसने भीतर की करुणा खो दी, उसने जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा खो दिया।
आत्मिक संतुलन का अर्थ इच्छाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देना है।
जब इंसान भीतर से परिपक्व होता है, तब वही बेचैनी सृजन बन जाती है।
वही भावनाएँ, जो पहले किसी एक व्यक्ति तक सीमित थीं, धीरे-धीरे पूरे जीवन के प्रति प्रेम में बदलने लगती हैं।
संवेदनशील होना कमजोरी नहीं है।
जो लोग भीतर से जीवित होते हैं, वही गहराई से प्रेम करते हैं, वही सबसे अधिक आहत भी होते हैं।
लेकिन वही लोग दुनिया को सबसे अधिक रोशनी भी देते हैं।
क्योंकि पत्थर कभी टूटते नहीं, पर उनमें धड़कन भी नहीं होती।
जीवन आखिर में बस इतना सिखाता है
अपनी सच्चाई को किसी की अस्वीकृति के हवाले मत करो।
जिस दिन इंसान खुद को स्वीकार करना सीख लेता है, उसी दिन उसके भीतर ऐसी शांति जन्म लेती है, जिसे कोई दूरी, कोई तिरस्कार, कोई अधूरापन छीन नहीं सकता।
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