Friday, May 15, 2026

संसार में बुराई क्यों है

 जो सीमित है वो सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है, उसमें भी गति है

That which is limited is not bound by boundaries, it too has movement.


संसार में बुराई क्यों है, यह प्रश्न वैसा ही है जैसे यह कि संसार में अपूर्णता क्यों है। अथवा यह कि संसार की रचना का अर्थ ही क्या है? हमें मान लेना पड़ेगा कि इसके सिवा और कुछ संभव ही नहीं था, इस रचना का अपूर्ण होना, धीरे-धीरे विकसित होना अनिवार्य था। और यह प्रश्न भी निरर्थक है कि हमारा अस्तित्व किस लिए है। प्रश्न यह होना चाहिए; यह अपूर्णता ही क्या अंतिम सत्य है? क्या बुराई अनिवार्य और यथार्थ है? जैसे नदी की सीमा होती है उसके दो तट, किन्तु क्या वे तट ही नदी रूप हैं, या उन तटों में ही नदी है? पानी के बहाव को बाँधने वाले ये तट ही नदी को आगे बहने में सहायता देते हैं?

जैसे संसार के प्रवाह की भी मर्यादाएं हैं, वैसे ही नदी के किनारे हैं। उनके बिना नदी का अस्तित्व ही नहीं होता। संसार का अर्थ इसकी अवरोधक मर्यादाओं में नहीं बल्कि उस गति में है, जो पूर्णता की ओर ले जाती है। संसार का चमत्कार यह नहीं है कि यहाँ कष्ट और बाधाएं हैं। बल्कि इसमें है कि यहाँ व्यवस्था, सौंदर्य, आनंद, कल्याण और प्रेम का वास है। सबसे बड़ा चमत्कार इस कल्पना में है कि मनुष्य में ईश्वर का वास है। मनुष्य ने अपने जीवन की गहराई में यह अनुभव किया है कि जो अपूर्ण दिखाई देता है वह पूर्ण की शुरुआत है। उसमें विकसित होते रूप का दर्शन है। जो सीमित है वो सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है, उसमें भी गति है। वह हर क्षण बंधनों को तोड़ रहा है। अपूर्णता में भी एक तरह की पूर्णता और सीमितता में भी असीमितता है। 


कुछ लोग आपको खोने से इसलिए नहीं डरते, क्योंकि उन्हें अंदर से यकीन होता है कि चाहे वो कितना भी hurt करें, कितना भी ignore करें, आप फिर भी वापस आ जाओगे। उन्हें लगता है कि आपकी feelings इतनी strong हैं कि आप हर बार उन्हें एक और chance दे दोगे, हर बार उनकी दूरी और बेरुखी को समझने की कोशिश करोगे। और यही certainty उन्हें careless बना देती है।


इसीलिए वो कई बार आपकी emotions की कद्र नहीं करते। वो आपको hurt भी करते हैं, आपकी feelings को ignore भी करते हैं, और फिर भी confident रहते हैं कि आप रिश्ता नहीं छोड़ोगे। क्योंकि उन्हें आपके जाने का डर नहीं होता, और जहाँ डर खत्म हो जाता है, वहाँ effort भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।


शुरुआत में आप इसे प्यार समझते हो—आप सोचते हो कि आपका वापस आना loyalty है, आपका बार-बार माफ करना maturity है। लेकिन धीरे-धीरे यही चीज़ सामने वाले को ये एहसास दिलाने लगती है कि वो चाहे जैसा behavior करे, आप रहोगे ही। और जब किसी इंसान को आपकी मौजूदगी की आदत पड़ जाती है, तो कई बार वो आपकी value करना छोड़ देता है।


असल में सच्चा रिश्ता वो होता है जहाँ दोनों को एक-दूसरे के खोने का एहसास हो, जहाँ दोनों effort करें, care करें और एक-दूसरे की feelings की respect करें। लेकिन जहाँ सिर्फ एक इंसान डरता रहे और दूसरा पूरी तरह comfortable हो जाए, वहाँ balance खत्म होने लगता है।


सच यही है—जहाँ किसी को आपके जाने का डर नहीं होता, वहाँ आपका रहना भी धीरे-धीरे खास नहीं रह जाता। इसलिए प्यार में खुद को इतना आसान मत बना दो कि सामने वाला आपकी मौजूदगी को guaranteed समझने लगे। क्योंकि value वहीं बनी रहती है जहाँ respect और effort दोनों साथ हों। 

अद्वेत क्या है ? अद्वेत यानी दो मिलके एक बना है यानी एक दुसरे से मिलकर ही अद्वेत बना है अर्थात एकाकार होना होता है अंहकार, क्रोध, इष्या सभी प्रकार के विकार अद्वेत से उत्पन्न होती है सारे शरीर को प्रभावित करती है । अद्वेत का स्वभाव हे विभक्त होना या यू कहे अंहकार का बाप है अद्वेत यही से दो मार्ग निकलती है प्रेम- घृणा । जब आत्म चेतना किसी बिन्दु पर सोचती हे द्वेत मे विभक्त होकर अद्वेत होती है यही अद्वेत उर्जा जो प्रकृति या ईश्वर से मिलती है इस अद्वेत उर्जा का अनुभूति ब्रेन के न्यूराँन से होकर सारे शरीर मे होती है । इंसान अपने आप मे एक अद्वेत उर्जा है जिसके बदौलत जगत मे क्रियाशिल होकर कर्म करता है इस अद्वेत उर्जा के अनुभूति पर स्थिर होना ध्यान है ,प्रेममय उर्जा है ,जो आत्म से परमात्मा का मिलन खुद के अन्दर का एहसास है ,श्रद्धा है, जो निरविचार आत्म चित है । द्वेत- मै ही तू है,तू ही मै है ये दो द्वेत एकाकार होकर अद्वेत बन गया जो आत्म चित निरविचार चेतन शक्ति है । अद्वेत ही दो भागो मे विचार धारा के रुप मे विभक्त होता है वो है हाँ-नाँ, करु - न करु का सोच उत्पन्न होता है।ऊँ शिवोहम सत्यम शिवम सुन्दरम


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