प्रेम कोई विचार नहीं है, प्रेम एक आदत भी नहीं है… प्रेम वह क्षण है जब भीड़ भरी दुनिया में अचानक तुम्हारा मन बिना वजह एक ही चेहरे पर टिक जाए और तुम खुद से पूछो भी नहीं “क्यों”।
प्रेम तब नहीं होता जब तुम किसी को पा लो, प्रेम तब होता है जब तुम उसे खो देने के डर से भी उसे बाँधना नहीं चाहते।
मान लो तुम्हारे कमरे में एक पुरानी कुर्सी है। सालों से वही है। कभी तुम उस पर बैठते हो, कभी उस पर कपड़े डाल देते हो, कभी उसे खिसका देते हो… वह बस है।
एक दिन अचानक तुम घर लौटते हो और वह कुर्सी वहाँ नहीं होती।
कोई शोर नहीं हुआ, कोई तूफान नहीं आया… पर कमरे में कुछ बदल गया।
तुम बैठ सकते हो, जगह भी है… पर बैठने का मन नहीं करता।
बस यही प्रेम है।
प्रेम वह नहीं जो हर समय सामने रहे, प्रेम वह है जिसकी अनुपस्थिति भी एक तरह की उपस्थिति बन जाए।
हम गलती कहाँ करते हैं?
हम उस कुर्सी को उठाकर अपने पास बाँध लेना चाहते हैं कि यह सिर्फ मेरी है।
लेकिन प्रेम में “मेरी” शब्द सबसे बड़ा बोझ है।
जिसे तुम सच में चाहते हो, उसे तुम सुरक्षित देखना चाहते हो… अपने पास नहीं, अपने मन में।
प्रेम में छूना जरूरी नहीं होता… कई बार दूरी ही सबसे कोमल स्पर्श होती है।
जैसे सर्दियों की सुबह धूप खिड़की से अंदर आती है वह तुम्हें छूती नहीं, बस पास बैठ जाती है… और तुम बिना छुए गर्म हो जाते हो।
और हाँ,
जो प्रेम सिर्फ शरीर तक पहुँचने की जल्दी में है, वह प्रेम नहीं है, वह अधीरता है।
प्रेम कभी जल्दी में नहीं होता।
वह इंतज़ार कर सकता है… बिना शिकायत के।
सच्चा प्रेम थोड़ा अजीब होता है
तुम उसे पाना नहीं चाहते, तुम उसे खोना भी नहीं चाहते…
तुम बस चाहते हो कि वह कहीं हो… ठीक हो… और कभी-कभी तुम्हारे ख्यालों में आकर बैठ जाए।
प्रेम में हमेशा मिलन जरूरी नहीं होता।
कुछ लोग जिंदगी में इसलिए आते हैं कि तुम्हें प्रेम सिखा जाए… तुम्हारे पास रहने के लिए नहीं।
तो अगर तुम्हें कभी ऐसा लगे कि कोई तुम्हारे पास नहीं है, फिर भी तुम्हारे भीतर कोई हमेशा मौजूद है
तो समझ लेना…
तुम प्रेम में हो।
No comments:
Post a Comment