कभी ध्यान दिया है?
किसी के एक शब्द से भीतर आग लग जाती है।
कोई अनदेखा कर दे तो दिल टूटने लगता है।
कोई चरित्र पर सवाल उठा दे तो सहना मुश्किल हो जाता है।
कोई रिश्ता छोड़ दे तो लगता है जैसे भीतर कुछ मर गया।
लेकिन सच में दर्द कहाँ है?
दर्द दूसरों के व्यवहार में कम होता है,
दर्द उस छवि के टूटने में होता है
जो हमने अपने बारे में बना रखी है।
वो छवि जिसे सालों से सजाया, सँवारा, बचाया।
धीरे-धीरे उसी को अपना असली “मैं” मान लिया।
जब कोई उसे चुनौती देता है,
तो लगता है जैसे हम खत्म हो रहे हैं।
पर सच यह है —
हम खत्म नहीं होते,
सिर्फ भ्रम टूटता है।
हमें मौत से उतना डर नहीं लगता,
क्योंकि भीतर कहीं पता है कि शरीर एक दिन जाना ही है।
असल डर उस नकली “मैं” के मिटने का है
जो हमने लोगों की नजरों में गढ़ लिया है।
ज़रा खुद से पूछिए —
अभी आपकी सबसे मजबूत पहचान क्या है?
समझदार?
मजबूत?
सफल?
आध्यात्मिक?
सबको खुश रखने वाले?
अगर आज यही पहचान टूट जाए
तो भीतर क्या उठेगा?
घबराहट?
खालीपन?
बेचैनी?
या यह सवाल —
“अब मैं कौन हूँ?”
यही डर है।
मन हर दिन हमारे बारे में कहानियाँ बनाता है —
मैं ऐसा हूँ…
मुझे ऐसा दिखना है…
लोग मुझे ऐसा समझें…
धीरे-धीरे हम कहानी के रचयिता नहीं रहते,
उसके कैदी बन जाते हैं।
पर क्या वह कहानी सच है?
या बस एक आरामदायक भ्रम?
सोचिए, एक बीज को मिट्टी में दबाया जाता है...
अंधेरा, दबाव, नमी…
बीज को लगता होगा — मैं खत्म हो रहा हूँ....
पर वही टूटना
उसके वृक्ष बनने की शुरुआत है।
प्रकृति भी यही कहती है —
पुराना टूटता है, तभी नया जन्म लेता है.....
इसलिए हर टूटन विनाश नहीं होती,
कई बार वही रूपांतरण होती है।
अब खुद से पूछिए —
आप क्या बचा रहे हैं?
अपना अस्तित्व?
या अपनी इमेज?
अस्तित्व को बचाने की जरूरत नहीं होती...
वह पहले से है।
बचानी पड़ती है सिर्फ छवि,
जो क्षणिक है, बदलने वाली है..
आज एक छोटा अभ्यास करें —
जहाँ-जहाँ आप लोगों के सामने कुछ बनने की कोशिश करते हैं,
वहाँ खुद को पकड़िए।
देखिए —
मैं अभी कौन-सा किरदार निभा रहा हूँ?
फिर एक जगह
अपनी इमेज बचाने की कोशिश मत कीजिए।
जहाँ परफेक्ट दिखना था, वहाँ सच्चे रहिए।
जहाँ छिपना था, वहाँ थोड़ा खुलिए।
फिर महसूस कीजिए —
आप कमजोर हुए
या हल्के हो गए?
आपको नया बनने की जरूरत नहीं है।
बस झूठे को गिरने देने का साहस चाहिए।
बीज अगर खुद को बचाता रहेगा
तो वृक्ष कभी नहीं बनेगा।
और जब वह टूटने को तैयार होता है,
वहीं से उसका पहला सच्चा जन्म शुरू होता है।
कभी-कभी जो टूट रहा होता है,
वह आप नहीं होते…
बस वह चेहरा होता है
जो आपने दुनिया को दिखाने के लिए पहन रखा था।
No comments:
Post a Comment