पृथ्वी तत्व ध्यान: शरीर की नींव को मजबूत बनाने की सीधी और असरदार विधि
हम जिस शरीर में रहते हैं, वो मिट्टी यानी पृथ्वी तत्व से ही बना है। हड्डियां, मांस, त्वचा सब कुछ पृथ्वी का ही रूप है। जब तक ये नींव मजबूत रहती है, तब तक बाकी चारों तत्वों का संतुलन ठीक रहता है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यही पृथ्वी तत्व सबसे ज्यादा कमजोर पड़ता है। इसकी कमजोरी से हड्डियों में दर्द, शरीर में भारीपन, थकान और डर-सा लगने लगता है। इसी को ठीक करने के लिए शास्त्रों में पृथ्वी तत्व ध्यान बताया गया है।
पृथ्वी तत्व ध्यान के मूल श्लोक:
पृथिवी चतुरस्रं च पीतवर्णं लवर्णकम्।
पार्थिवे वायुमारोप्य लकारेण समन्वितम्॥
ध्यायंश्चतुर्भुजाकारं चतुर्वक्त्रं हिरण्मयम्।
धारयेत्पञ्चघटिकाः पृथिवीजयमाप्नुयात्॥
पृथिवीयोगतो मृत्युर्न भवेदस्य योगिनः।
आजानोः पायुपर्यन्तमपां स्थानं प्रकीर्तितम्॥
श्लोक का सरल अर्थ:
पृथ्वी तत्व का रंग सुनहरा पीला है, इसकी आकृति चौकोर है और इसका बीज मंत्र "लं" है। साधक को इसी "लं" बीज के साथ पार्थिव क्षेत्र में वायु का आरोपण करना चाहिए। चार भुजाओं वाले, चार मुखों वाले और स्वर्ण के समान चमकते हुए स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। जो साधक प्रतिदिन पांच घड़ी अर्थात ढाई घंटे तक इस ध्यान को धारण करता है, वह पृथ्वी तत्व पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है। इस योग के प्रभाव से उस साधक की अकाल मृत्यु नहीं होती। शरीर में पृथ्वी तत्व का स्थान गुदा से लेकर घुटनों तक का क्षेत्र बताया गया है।
पृथ्वी तत्व ध्यान करने की विधि:
स्थान और समय: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में यह ध्यान सर्वोत्तम फलदायी होता है। स्वच्छ एवं शांत स्थान पर आसन बिछाकर बैठ जाएं। मेरुदंड एकदम सीधा रहे। कोई भी सुखासन लगा सकते हैं।
ध्यान की प्रक्रिया:
1. शरीर को शिथिल करें: आंखें बंद करके तीन-चार गहरी सांस लें और शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें।
2. पृथ्वी तत्व के स्थान पर ध्यान केंद्रित करें: अपना पूरा ध्यान गुदा से लेकर घुटनों तक के भाग पर ले जाएं। यही पूरा क्षेत्र पृथ्वी तत्व का स्थान है।
3. रंग और आकृति का ध्यान: कल्पना करें कि आपके इस पूरे क्षेत्र में चौकोर आकृति है और वहां सुनहरे पीले रंग का प्रकाश फैल रहा है। यह प्रकाश इतना चमकीला है मानो पिघला हुआ सोना हो।
4. बीज मंत्र का जप: अब मन ही मन "लं" बीज मंत्र का उच्चारण करें। हर "लं" के साथ महसूस करें कि यह पीला प्रकाश और अधिक गहरा और ठोस होता जा रहा है।
5. वायु का आरोपण: श्वास को धीरे-धीरे भरें और कल्पना करें कि यह श्वास उसी पार्थिव क्षेत्र में "लं" मंत्र के साथ घूम रही है। श्वास को रोककर कुछ क्षण वहीं स्थिर रखें और फिर धीरे-धीरे छोड़ दें।
6. दिव्य स्वरूप का ध्यान: अब उसी पीले प्रकाश के मध्य चार भुजाओं वाले, चार मुखों वाले और संपूर्ण स्वर्णिम आभा से युक्त एक दिव्य पुरुष की कल्पना करें। उनका तेज हजार सूर्यों के समान प्रतीत हो। उन्हें अपने समक्ष देखें और अनुभव करें कि उनका आशीर्वाद आपके संपूर्ण शरीर में प्रवाहित हो रहा है।
7. स्थिरता का अनुभव: कुछ क्षण इसी ध्यान में स्थित रहें। महसूस करें कि आपका शरीर पर्वत की भांति अडिग और स्थिर होता जा रहा है। पैरों में एक अजीब-सी जड़ता और भारीपन का सुखद अनुभव होगा। यही पृथ्वी तत्व के जागरण का संकेत है।
8. समापन: जब ध्यान से बाहर आना चाहें तो धीरे-धीरे शरीर को हिलाएं-डुलाएं। हथेलियों को आपस में रगड़कर गर्म करें और चेहरे तथा आंखों पर लगाएं। फिर धीरे-धीरे आंखें खोलें।
अभ्यास की अवधि:
शुरुआत में केवल 10-15 मिनट तक ही यह ध्यान करें। धीरे-धीरे समय बढ़ाते हुए अधिकतम सामर्थ्यानुसार करें। शास्त्रों में पांच घड़ी अर्थात लगभग ढाई घंटे तक के ध्यान का विधान है, किंतु गृहस्थ जीवन में सामर्थ्यानुसार ही करना चाहिए।
नियमित अभ्यास के लाभ:
· शारीरिक दुर्बलता, हड्डियों की कमजोरी एवं जोड़ों के दर्द में विशेष लाभ
· मानसिक चंचलता एवं अस्थिरता का निवारण
· भय, विशेषकर मृत्यु भय से मुक्ति
· आत्मविश्वास एवं निर्णय क्षमता में वृद्धि
· शरीर में स्थिरता, दृढ़ता एवं सहनशक्ति का विकास
· आयु में वृद्धि एवं स्वास्थ्य की रक्षा
यह ध्यान सरल होते हुए भी अत्यंत गूढ़ एवं प्रभावशाली है। नियमित रूप से श्रद्धापूर्वक करने पर इसके लाभ स्वयं अनुभव में आने लगते हैं।
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