Friday, April 24, 2026

सोंच और विचार

 🌹🌿आदिवासी पेट से ही सोचता है। वह जो मैंने नाभि का चक्र कहा, उसी से सोचता है। वे अभी पशुओं से बहुत ज्यादा विकसित हालत में नहीं हैं। हजारों साल तक करोड़ों लोग यही समझते रहे हैं कि सोचने की प्रक्रिया पेट में होती है, बेली में होती है, सोचने की प्रक्रिया बुद्धि में नहीं होती। और हममें से भी बहुत ही कम लोग सिर से सोचते हैं। जितने भी विश्वास करने वाले लोग हैं वे पेट से सोचते हैं, वे कभी भी सिर से नहीं सोचते। क्योंकि विश्वास करने के लिए सोचना ही नहीं पड़ता है। और इसलिए जो आदमी विश्वास ही किए चला जाता है उसके ऊपर के चक्र कभी विकसित नहीं होते, उसके नीचे के चक्र ही रह जाते हैं, वही सक्रिय रह जाते हैं।🌿🌹


🌹🌿इसलिए मैं निरंतर विरोध करता हूं कि किसी पर श्रद्धा मत करना, किसी पर विश्वास मत करना। क्योंकि जब तक कोई स्वयं सोचना शुरू न करे, उसके सोचने के अपने चक्र सक्रिय नहीं होंगे। और अपने चक्र सक्रिय न हों तो व्यक्ति करीब-करीब हवा में भटकता हुआ एक पत्ते की भांति रह जाता है। उसके पास न अपनी कोई विल है, न अपना कोई संकल्प है, न अपनी कोई दृढ़ स्थिति है। उसके पास अपना कुछ भी नहीं है। वह किसी के पीछे चल रहा है।🌿🌹


🌹🌿दुनिया के नेता आदमी को जितना नुकसान पहुंचाते हैं उतना और कोई नहीं पहुंचाता। क्योंकि दुनिया के सब नेता आर्डर्स देते हैं और आपसे कहते हैं, आपको सिर्फ स्वीकार करना है। दुनिया के गुरु आज्ञाएं देते हैं और लोगों से कहते हैं, आपको स्वीकार करना है। आपका अपने आज्ञा का चक्र कभी विकसित नहीं हो पाता।🌿🌹


🌹🌿दुनिया में जो इतनी मनुष्य-जाति दीन-हीन दिखाई पड़ती है, इस दीन-हीनता में सबसे बड़ा कारण यह है कि हम मनुष्य-जाति को आज्ञाएं देते हैं, उसकी अपनी आज्ञा की क्षमता को विकसित नहीं होने देते। छोटे से बच्चे को हम आज्ञाएं देना शुरू करते हैं–यह करो और यह मत करो! हम कभी इसकी फिक्र नहीं करते कि उसकी अपनी चिंतना, अपना डिसीजन, अपना निर्णय विकसित हो सके। उस बच्चे का आज्ञा चक्र कभी भी विकसित नहीं हो पाता, वह अधूरा ही रह जाता है। और अगर आज्ञा चक्र विकसित न हो तो आदमी का व्यक्तित्व ही विकसित नहीं हो पाता है।🌿🌹


🌹🌿बच्चों को हम समझाते हैं–ऐसे बनो, ऐसे बनो। लेकिन हम यह भूल ही जाते हैं, वे बच्चे वैसे कभी नहीं बनेंगे। वे बन सकते हैं, लेकिन उनके बन सकने के लिए उनके चक्रों पर ध्यान देना पड़ेगा, जिनसे व्यक्तित्व निर्मित होता है। जो मां-बाप जानते हैं, जो शिक्षक जानते हैं, वे बच्चे के मस्तिष्क के आज्ञा चक्र पर पूरा श्रम करेंगे।🌿🌹


🌹🌿यह शिक्षा बहुत अधूरी और बहुत बेमानी है। क्योंकि इस शिक्षा में मनुष्य के बुनियादी सूत्रों के संबंध में कोई चिंतन नहीं है, कोई विचार नहीं है। अगर हम बच्चों की यूनिवर्सिटी तक आते-आते उनके आज्ञा चक्र को, उनके संकल्प को विकसित कर सकें, हम सारी दुनिया को बदल देंगे। एक नई दुनिया और एक नया आदमी पैदा हो जाएगा। एक आदमी, जिसमें बल है। एक आदमी, जो सोचता है–वैसा करता है, वैसा कर सकता है। एक आदमी, जिसमें साहस है। एक आदमी, जिसमें कि हिम्मत है, जिसमें करेज है। लेकिन वह हममें हो नहीं सकता, क्योंकि जिस चक्र से वह सारी चीजें आती हैं वह चक्र ही हमारा सोया रह जाता है…

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