मनुस्मृति और न्यायपालिका....
जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे 2 साल की जेल होगी, लेकिन अगर वही चोरी कोई आईएएस अधिकारी, बड़ा बिजनेसमैन, मंत्री या विद्वान करे, तो उसे 200 साल की जेल दी जाएगी..." तो क्या देश के रसूखदार लोग इस कानून का समर्थन करेंगे?
कदापि नहीं! वे इस कानून की प्रतियाँ जला देंगे।
लेकिन विडंबना देखिए, सदियों से विदेशी और वामपंथी इतिहासकारों ने आपको यह रटाया कि मनुस्मृति ने अमीरों और ब्राह्मणों को रियायत दी। अब खुद से एक सवाल पूछिए— "क्या दुनिया का कोई भी इंसान अपने ही लिए इतना कठोर कानून लिखेगा जो उसकी सात पीढ़ियों को कँपा दे?"अगर मनु 'जातिवाद' कर रहे होते, तो क्या वे अपनी ही जाति के लिए 128 गुना दंड लिखते? कोई भी व्यक्ति अपने परिवार या बिरादरी के लिए इतना खौफनाक कानून नहीं बनाता।
आज जिसे 'ब्राह्मणवाद' कहकर गाली दी जाती है, वह असल में 'विद्वता का अपमान' है।
जो लोग आज मनुस्मृति जलाते हैं, वे असल में उस पन्ने को जला रहे हैं जो ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को कठोर दंड देने की वकालत करता है। वे उन मुगलों और अंग्रेजों के हाथों के खिलौने हैं जो चाहते थे कि हिंदू समाज कभी एक न हो पाए।सच्चाई ये है कि मनु के लिए ब्राह्मण कोई 'सरनेम' नहीं था। ब्राह्मण वह था जो 'ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः' (जो ब्रह्म को, सत्य को, ज्ञान को जानता हो)।
अब आप
मनुस्मृति अध्याय 8 के वे श्लोक 337,
श्लोक 338 जो न्याय की परिभाषा बदल देते हैं, उनको पढ़िए...
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम्।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः ॥
अष्टापाद्यं: आठ गुना (8x)
तु: लेकिन/ही
शूद्रस्य: शूद्र के लिए (अज्ञानी या अकुशल व्यक्ति)
स्तेये: चोरी के अपराध में
भवति: होता है
किल्विषम्: दंड या पाप का फल (जुर्माना)
षोडशैव: सोलह गुना ही (16x)
वैश्यस्य: वैश्य के लिए (व्यापारी वर्ग)
द्वात्रिंशत्: बत्तीस गुना (32x)
क्षत्रियस्य: क्षत्रिय के लिए (शासक या रक्षक वर्ग)
ब्राह्मणस्य: ब्राह्मण के लिए (विद्वान या शिक्षक वर्ग)
चतुःषष्टिः: चौंसठ गुना (64x)
पूर्णं वापि शतं: या फिर पूरा सौ गुना (100x)
द्विगुणा वा चतुःषष्टि: या फिर चौंसठ का दोगुना अर्थात एक सौ अट्ठाइस गुना (128x)
तद्दोष-गुण-विद्धि: क्योंकि वह उस दोष (अपराध) और उसके गुण (परिणाम) को पूरी तरह जानने वाला है।
सः: वह (विद्वान व्यक्ति)।
अर्थ:
चोरी के मामले में, यदि अपराधी शूद्र है तो उसे 8 गुना दंड मिलना चाहिए। यदि वैश्य है तो उसे 16 गुना, यदि क्षत्रिय है तो 32 गुना दंड मिलना चाहिए। लेकिन यदि अपराधी ब्राह्मण है, तो उसे 64 गुना, 100 गुना या 128 गुना दंड दिया जाना चाहिए, क्योंकि वह ज्ञानी है और जानता है कि वह क्या कर रहा है।
कल्पना कीजिए, आप एक ऐसी अदालत में खड़े हैं जहाँ जज अपराधी का बैंक बैलेंस या रसूख देखकर सजा कम नहीं करता, बल्कि उसकी डिग्रियाँ देखकर सजा बढ़ा देता है! एक ऐसा कानून, जहाँ आप जितने पढ़े-लिखे और ताकतवर होंगे, जेल की सलाखें आपके लिए उतनी ही मोटी होती जाएँगी।
सुनने में यह किसी आदर्श लोक की कल्पना लगती है न? लेकिन सच तो यह है कि यह महान भारतीय न्याय पद्धति का वह हिस्सा है जिसे मुगलों की तलवारों और अंग्रेजों की स्याही ने आपसे सदियों तक छिपाकर रखा। आज समय है उस बौद्धिक घेराबंदी को उधेड़ने का और उस सच को नग्न करने का, जिसे तथाकथित इतिहासकारों ने भेदभाव की चादर ओढ़ा दी थी।
मनुस्मृति का यह श्लोक ब्रह्मास्त्र हैं, जो उस जहरीले नैरेटिव को भस्म कर देते हैं जिसमें कहा गया कि मनु जातिवादी थे। मनु का सीधा सिद्धांत था— जितनी बड़ी अक्ल, उतनी बड़ी सजा।
मनुस्मृति के यह श्लोक केवल जाति की बात नहीं करते, वे ज्ञान और पद के साथ बढ़ते दंड की बात करते हैं। इसे इस तरह देखिये।
1. अज्ञानी को अभयदान (शूद्र - 8 गुना दंड): समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति जिसके पास न संपत्ति थी, न सत्ता, न ही वेदों का ज्ञान। मनु जानते थे कि अभाव में व्यक्ति भटक सकता है। इसलिए उसकी सजा सबसे कम रखी गई। यह कमजोर के प्रति सनातन की करुणा थी।
2. आर्थिक अपराधी पर लगाम (वैश्य - 16 गुना दंड): अब बात आती है व्यापारी वर्ग की। वैश्य के पास धन था, हिसाब-किताब की समझ थी। मनु ने कहा कि अगर एक व्यापारी, जिसे लाभ-हानि का पूरा ज्ञान है, वह चोरी या मिलावट करता है, तो उसे अज्ञानी वाली रियायत नहीं मिलेगी। उसे दुगनी सजा यानी 16 गुना दंड भुगतना होगा। आज के सफेदपोश अपराधियों के लिए यह एक कड़ा सबक है।
3. रक्षक को महादंड (क्षत्रिय - 32 गुना दंड): जिसके पास हथियार थे और जिसे गांव की रक्षा की कसम दी गई थी, उसे और भी सख्त घेरे में लिया गया। रक्षक अगर भक्षक बना, तो सजा 32 गुना।
4. विद्वान का मृत्युदंड जैसा न्याय (ब्राह्मण - 64 से 128 गुना दंड): और वह जिसे समाज गुरु मानता था, जिसे वेदों का सर्वोच्च ज्ञान था— मनु ने उसे सबसे क्रूर दंड के घेरे में खड़ा किया। संदेश साफ था— जितना अधिक जानते हो, समाज के साथ गद्दारी करने पर उतनी ही निर्दयता से कुचले जाओगे।
अंग्रेजों ने हमारे ग्रंथों का 'अंग्रेजी अनुवाद' किया और हमने उसे सच मान लिया। उन्होंने 'वर्ण' (Profession) को 'जाति' (Birth) बना दिया ताकि हम आपस में लड़ें।
मुगलों ने मंदिर तोड़े, अंग्रेजों ने हमारी 'सोच' तोड़ी।
उन्होंने हमें बताया कि तुम 'पिछड़े' हो, तुम्हारा धर्म 'असमान' है।
जबकि सच यह था कि जब यूरोप के जंगलों में लोग नग्न घूम रहे थे, तब भारत का मनुस्मृति जैसा ग्रंथ कह रहा था कि— "समाज में जिसका सम्मान जितना ज्यादा होगा, अपराध करने पर उसकी सजा उतनी ही भयावह होगी।"
आज समय है कि हम इस 'बांटो और राज करो' की राजनीति को पहचानें।
एक ब्राह्मण का बेटा अगर अज्ञानी है, तो वह शूद्र है। * एक शूद्र का बेटा अगर वेदों का ज्ञाता है, तो वह ब्राह्मण है। यही मनु का असली संदेश था। यह जन्म की लड़ाई नहीं, यह 'कर्म और जवाबदेही' का उत्सव था।
अंग्रेजों और मुगलों ने हमारे समाज को बांटने के लिए ज्ञान और कर्म को जन्म में बदल दिया। उन्होंने हमें सिखाया कि ऊंचे वर्णों ने निचले वर्णों का शोषण किया, जबकि सच्चाई यह है कि मनु के विधान में ऊंचाई का मतलब था जवाबदेही की सूली पर चढ़ना।
अगर यह सवर्णों का तंत्र होता, तो क्षत्रिय, वैश्य और ब्राह्मण के लिए विशेष रियायतें होतीं, विशेष दंड नहीं। क्या आज का कोई अरबपति चाहेगा कि उसे आम आदमी से 128 गुना ज्यादा सजा मिले? अर्थात अगर एक आम आदमी को 1 साल की सजा मिले तो जो ब्राह्मण है उसे 128 साल की सजा मिले। अगर यह कारागार की सजा है तो अंतिम सांस तक ब्राह्मण जेल के अंदर ही रहेगा।
आज समय है कि हम इस विदेशी चश्मे को उतार फेंकें। मुगलों ने हमारे मंदिर तोड़े, लेकिन इन इतिहासकारों ने हमारा गौरव और हमारी एकता तोड़ने की सफल कोशिश की। जरा ठंडे दिमाग से सोचिए— क्या दुनिया का कोई भी इंसान अपने ही लिए (ब्राह्मणों के लिए) इतना खौफनाक कानून लिखेगा जो उसकी गर्दन पर हमेशा तलवार लटकाए रखे? कभी नहीं!
यह ब्राह्मणवाद नहीं था, यह पवित्र जवाबदेही का तंत्र था। अंग्रेजों ने वर्ण को जाति बनाकर हमें आपस में लड़ाया ताकि हम अपनी जड़ों से नफरत करने लगें। उन्होंने हमें वह चश्मा पहनाया जिससे हमें अपना ही रक्षक शोषक दिखने लगा। मुगलों ने हमारे मंदिर तोड़े, लेकिन इन वैचारिक आतंकवादियों ने हमारा आत्मसम्मान तोड़ दिया।
यहाँ 'ब्राह्मण' कोई सरनेम नहीं, बल्कि 'ज्ञान की पराकाष्ठा' थी। और मनु का संदेश साफ था— "जितना अधिक जानते हो, गलती करने पर उतनी ही निर्दयता से कुचले जाओगे।"
अंग्रेजों और मुगलों ने हमारे समाज को बांटने के लिए 'ज्ञान' को 'जाति' में बदल दिया। उन्होंने हमें सिखाया कि ब्राह्मण 'शोषक' था, जबकि सच्चाई यह है कि मनु के विधान में ब्राह्मण की गर्दन पर हमेशा तलवार लटकी रहती थी।
षड्यंत्र का पर्दाफाश: अगर यह 'ब्राह्मणवाद' होता, तो ब्राह्मणों के लिए 'विशेष रियायतें' होतीं, 'विशेष दंड' नहीं।
एकजुट होने का मंत्र: आज जब हम अपनी जड़ों की ओर देखते हैं, तो हमें समझ आता है कि हमें आपस में लड़ाने के लिए हमारे ही न्यायशास्त्र का गला घोंटा गया।
यह विश्लेषण उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो कहते हैं कि सनातन धर्म असमानता सिखाता है। सनातन तो वह महान व्यवस्था है जिसने VIP कल्चर को हजारों साल पहले ही कुचल दिया था। यहाँ पद प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि कठोरतम जिम्मेदारी का विषय था।
खून खौलना चाहिए इस बात पर कि हमें सदियों तक बेवकूफ बनाया गया! हमें बताया गया कि हमारा धर्म हमें बांटता है, जबकि हमारा धर्म तो योग्यता के आधार पर न्याय करता था।
कल्पना कीजिए कि आपके घर का एक कानून है जो कहता है कि— "घर का बड़ा बेटा गलती करेगा तो उसे सौ कोड़े लगेंगे, और छोटा बच्चा गलती करेगा तो उसे सिर्फ एक टॉफी कम दी जाएगी।" अब एक दुश्मन आपके घर में घुसता है। वह देखता है कि यह नियम तो बहुत महान है, यह तो इंसाफ की पराकाष्ठा है! वह क्या करता है? वह कानून की किताब चुराता है और बाहर जाकर शोर मचाता है— "देखो! इस घर में छोटे बच्चे के साथ भेदभाव होता है, उसे टॉफी नहीं दी जाती!" और बड़े बेटे वाली सजा का पन्ना फाड़कर कूड़े में फेंक देता है।
मुगलों, अंग्रेजों और वामपंथियों ने 'मनुस्मृति' के साथ यही किया।
ब्राह्मण: 'जाति' नहीं, 'जिम्मेदारी' का नाम था
आज के दौर में 'ब्राह्मण' शब्द को एक गाली की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। लेकिन मनु के विधान में ब्राह्मण वह 'सुपर कंप्यूटर' था जिसे समाज को चलाने का डेटा दिया गया था।
अगर मनुस्मृति 'ब्राह्मणों' ने अपने फायदे के लिए लिखी होती, तो क्या कोई बेवकूफ अपने ही लिए 128 गुना दंड लिखता? क्योंकि ब्राह्मण तो कोई भी बन सकता था। शूद्र प्रवृत्ति वाला वैश्य बन सकता था, क्षत्रिय बन सकता था, ब्राह्मण बन सकता था, अगर सजा इस तरह न होती तो शूद्र अगर ब्राह्मण बनता तब तो वह कुछ भी करता उसे तो सजा मिलनी ही नहीं या ना के बराबर मिलती।
आज का कोई भी नेता, कोई भी वीआईपी क्या ऐसा कानून पास करेगा कि अगर उसने गलती की तो उसे आम आदमी से 100 गुना ज्यादा जेल होगी? कभी नहीं!
लेकिन मनु ने किया। क्योंकि वहां 'ब्राह्मण' का मतलब सुख भोगना नहीं, बल्कि कांच की दीवार पर चलना था।
षड्यंत्रकारियों ने नैरेटिव सेट किया कि 'शूद्र' को प्रताड़ित किया गया। अब जरा ठंडे दिमाग से सोचिए:
अगर एक अनपढ़ व्यक्ति (शूद्र) चोरी करे, तो सजा सिर्फ 8 गुना।
और अगर एक महाज्ञानी (ब्राह्मण) वही काम करे, तो सजा 128 गुना।
बताइए, रक्षा किसकी हुई? रक्षा उस कमजोर की हुई जिसे समाज 'शूद्र' कहता था, क्योंकि उसे कानून ने 'बेनिफिट ऑफ डाउट' दिया। प्रताड़ित तो वह ब्राह्मण हुआ जिसके ज्ञान को ही उसकी फांसी का फंदा बना दिया गया। यह भेदभाव नहीं, यह 'कमजोर के प्रति करुणा' और 'ताकतवर पर लगाम' थी।
जब आक्रमणकारी भारत आए, तो उन्होंने देखा कि यहाँ का समाज किसी राजा के डर से नहीं, बल्कि अपने 'धर्म' (कर्तव्य बोध) से बंधा है। इसे तोड़ने के लिए उन्होंने सबसे पहले 'न्याय की रीढ़' यानी मनुस्मृति पर हमला किया।
अंग्रेजों की चाल यही थी उन्होंने 'Divide and Rule' के लिए मनुस्मृति का ऐसा अनुवाद करवाया (जैसे विलियम जोन्स के समय), जिसमें जानबूझकर 'वर्ण' को 'जाति' (Caste) बना दिया गया।
आज़ादी के बाद, वामपंथी इतिहासकारों ने इसी को आगे बढ़ाया। उन्होंने चतुराई से उन श्लोकों को गायब कर दिया जहाँ ब्राह्मणों को कठोर दंड मिलता था और केवल उन अंशों को उछाला जिन्हें 'भेदभाव' के रूप में पेश किया जा सके।
यही असली वजह है कि नैरेटिव बनाने वालों ने इन श्लोकों को छिपाया। क्योंकि अगर ये श्लोक सामने आ गए, तो 'दलित बनाम ब्राह्मण' की उनकी पूरी दुकान बंद हो जाएगी। मनुस्मृति तो असल में 'High Accountability' (उच्च जवाबदेही) का ग्रंथ है।
मुगल और अंग्रेज चले गए, लेकिन उनकी फैलाई हुई 'मानसिक गुलामी' आज भी हमारे अपने ही लोगों के हाथों में है, जो बिना पढ़े ही अपने पूर्वजों की न्याय व्यवस्था को गाली देते हैं।
यह एक गहरी साजिश थी। जिस ग्रंथ ने 'ज्ञान' को सबसे बड़ी जिम्मेदारी और 'अज्ञान' को सबसे बड़ी रियायत दी, उसे ही 'अत्याचारी' घोषित कर दिया गया।
यह एक बौद्धिक युद्ध (Intellectual Warfare) था । जहाँ तलवार से ज्यादा प्रहार कलम और नैरेटिव से किया गया और निश्चित तौर पर वह उसमें सफल हुए।
अब
एक कहानी के साथ बात खत्म करते हैं
कल्पना कीजिए एक आधुनिक जेल है। इसके चार गेट हैं और आज जज साहब (मनु) चार अलग-अलग कैदियों को सजा सुनाने वाले हैं। चारों ने मिलकर एक ही अपराध किया है— सरकारी खजाने से धन की हेराफेरी।
1. नादान मजदूर (शूद्र)
सबसे पहले कटघरे में वह मजदूर आता है जिसे मुश्किल से अपना नाम लिखना आता है। उसने मजबूरी और बहकावे में आकर इस अपराध में साथ दिया। जज साहब अपनी कलम उठाते हैं और कहते हैं:
इस व्यक्ति के पास न शिक्षा है, न इसे कानून की पेचीदगियों का पता है। इसने अनजाने में गलती की। इसे समाज को सुधारने का मौका मिलना चाहिए। इसे मात्र 8 साल के लिए जेल भेजा जाए।
2. मुनीम जी (वैश्य)
दूसरा नंबर आता है उस मुनीम या कारोबारी का जिसे पैसे की एक-एक पाई का हिसाब पता है। वह जानता था कि जो वह कर रहा है, वह हेराफेरी है। जज साहब उसे घूरते हुए कहते हैं:
मुनीम जी, आपको तो लाभ और हानि की पूरी समझ है। आपने यह काम अज्ञानता में नहीं, बल्कि मुनाफे के लालच में किया। आपको मजदूर वाली रियायत नहीं मिलेगी। आपको 16 साल की जेल काटनी होगी।
3. दरोगा साहब (क्षत्रिय)
अब बारी आती है उस दरोगा या अधिकारी की जिसके कंधों पर उस खजाने की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। जज साहब का चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है:
तुम्हें तो वर्दी पहनाई गई थी, तुम्हें कसम दी गई थी कि तुम रक्षा करोगे। जब रक्षक ही सेंध लगाने लगे, तो समाज का कानून से भरोसा उठ जाता है। तुम्हारी सजा बहुत सख्त होगी। तुम्हें 32 साल की कालकोठरी दी जाती है।
4. जिले के सबसे बड़े प्रोफेसर/विद्वान (ब्राह्मण)
अंत में कटघरे में वह व्यक्ति खड़ा होता है जिसने समाज को नीति और शास्त्र पढ़ाए हैं, जो नैतिकता का पाठ पढ़ाता है। पूरा गांव कांप रहा है कि जज साहब क्या कहेंगे। जज साहब अपनी मेज पर जोर से मुक्का मारते हैं और दहाड़ते हैं:
सबसे बड़े अपराधी तुम हो! तुमने समाज के भरोसे का कत्ल किया है। तुमने वह ज्ञान प्राप्त किया था जो अंधकार को मिटाता है, लेकिन तुमने उसी ज्ञान का इस्तेमाल अंधेरा फैलाने के लिए किया। अगर तुम जैसे विद्वान अपराध करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को कौन बचाएगा?
तुम्हें 64 साल, 100 दिन साल या 128 साल की सबसे कठोर जेल काटनी होगी!
इस कहानी को सुनकर क्या आपको अब भी लगता है कि मनुस्मृति 'उच्च वर्ण' के लोगों को बचाने के लिए लिखी गई थी?
सच तो यह है कि मनु के विधान में ब्राह्मण या विद्वान होना कोई सुख की बात नहीं थी, बल्कि एक निरंतर डर में जीना था कि अगर मुझसे एक छोटी सी भी गलती हुई, तो मुझे आम आदमी से 100 गुना ज्यादा सजा मिलेगी।
वहाँ शूद्र यानी कम समझ वाले व्यक्ति को सबसे सुरक्षित रखा गया था। आज के लोकतंत्र में क्या ऐसा संभव है? आज तो रसूखदार लोग कानून की पेचीदगियों का फायदा उठाकर बच निकलते हैं और गरीब जेलों में सड़ते रहते हैं।
मनु का विधान कहता था:
जितना ऊंचा पद, उतनी बड़ी जेल।
जितना गहरा ज्ञान, उतनी कड़ी जंजीर।
जिस ग्रंथ ने ज्ञान को ही कालकोठरी बना दिया, उसे आज के स्वार्थी नैरेटिव ने 'अत्याचारी' बता दिया!
आज हम उस मानसिक गुलामी के लोहे के पिंजरे को तोड़ रहे हैं, जिसे सदियों की साजिशों ने हमारे चारों ओर खड़ा किया था। जब आप इस लेख को पढ़कर अपनी आँखें मूँदेंगे, तो खुद से एक सवाल पूछिएगा— क्या हम वाकई उस व्यवस्था के वंशज हैं जो भेदभाव करती थी, या हम उस महान विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने 'ज्ञान' को ही 'अग्निपरीक्षा' बना दिया था?
सनातन कोई जंजीर नहीं, बल्कि न्याय का वह दैदीप्यमान सूर्य है जिसकी किरणों में हर व्यक्ति अपने कर्मों और अपनी पात्रता के अनुसार तपता है। मनु का तराजू अंधा नहीं था, वह दिव्य दृष्टि वाला था, जो देख सकता था कि किसकी आत्मा पर बोध का कितना बोझ है। मुगलों की तलवारें चली गईं, अंग्रेजों की हुकूमत मिट गई, लेकिन उनकी फैलाई हुई 'वैचारिक विषबेल' आज भी हमारे अपनों के दिलों में नफरत बनकर पनप रही है। यह समय वापस उसी गौरव को पाने का है जहाँ न्याय रसूख देखकर नहीं, बल्कि चरित्र और कर्तव्य देखकर होता था।
याद रखिए, जिस समाज में शिक्षक और रक्षक अपराधी होने पर सबसे कठोर दंड भुगतते हैं, वही समाज अमर होता है। आज हम अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं, उस अखंड भारत की चेतना की ओर जहाँ न्याय का अर्थ केवल कानून नहीं, बल्कि ईश्वर का आदेश था। अब फैसला आपके हाथ में है— आप शत्रुओं के गढ़े हुए 'झूठ' के साथ खड़े होंगे, या अपने पूर्वजों के इस 'साश्वत सत्य' के साथ?
जब ज्ञान ही कालकोठरी बन जाए और अज्ञान कवच, समझ लेना कि तुम मनु के भारत में खड़े हो!
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