Sunday, April 26, 2026

मानव शरीर-एक नयी दृस्टि

 मानव शरीर--एक नयी दृस्टि


      एक_साधारण_मनुष्यात्मा_अध्यात्मिक_मार्ग पर धीरे-धीरे चलती हुई उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचती है परिणामस्वरूप उसे उपलब्ध होती है-

विशुद्ध दिव्य अवस्था। योग की दृष्टि से यह परम सौभाग्य है और ऐसा सौभाग्य विरले ही किसी मनुष्यात्मा को प्राप्त होता है। इस परम आध्यात्मिक प्राप्ति के मूल में है--ज्ञान और कर्म। यह प्राप्ति संभव है मानव शरीर में। मानव योनि को छोड़कर सभी योनियाँ यहां तक कि देवयोनि भी भोगयोनियां हैं। लेकिन एकमात्र मानव योनि ही एक ऐसी योनि है जो भोगयोनि के साथ-साथ कर्मयोनि भी है। मनुष्य ज्ञान भी प्राप्त करता है और कर्म भी करता है। लेकिन उपलब्ध ज्ञान के अनुसार कर्म नहीं करता। ज्ञान कुछ और है और कर्म कुछ और। यही आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। ज्ञान के अनुसार कर्म और आचरण करने वाला सच्चा मनुष्य है।

       इसके मूल में 'प्रज्ञा' है क्योंकि प्रज्ञा का सीधा सम्बन्ध आत्मा से है। आत्मा ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है। प्रज्ञा द्वारा ही वह बाहर निकलता है। कहा जाता है--"प्रज्ञावान लभते ज्ञानम्।" प्रज्ञावान को ही ज्ञान प्राप्त होता है। प्रज्ञा ही ज्ञान को कर्म में और कर्म को ज्ञान में नियोजित करती है। यह कार्य अति कठिन है--एक घाट पर बाघ और बकरी को एक साथ पानी पिलाने के समान है। 

      हमें अपनी प्रज्ञा के बारे में कुछ पता नहीं है। उसका बोध हमें तभी हो सकता है जब हम अपने आपको, अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को चारों ओर से समेंट कर अपने आप से पूछें कि 'हम कौन हैं' ? यह प्रश्न यदि हम बार-बार दोहराते रहें तो एक-न-एक दिन हमारे भीतर  प्रज्ञा का बोध जागृत हो जायेगा और इसके जागृत होते ही ज्ञान और कर्म के परस्पर नियोजित होने की कला भी उपलब्ध हो जायेगी।

      प्रज्ञा मनुष्य के आलावा और किसी प्राणी के पास नहीं है। इस कारण मनुष्य शरीर अति मूल्यवान है। जरा सोचिये--परब्रह्म परमात्मा भी मनुष्य शरीर प्राप्त करने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता है। आश्चर्य की बात है कि इतना मूल्यवान, इतना दुर्लभ होते हुए भी मानव शरीर को समझने में मानवता ने बराबर भूल की है।

      केवल शरीर ही ऐसी चीज़ है जो मनुष्य के अत्यंत समीप है और सबसे प्रमाणिक मित्र भी। उससे मनुष्य शत्रुता क्यों रखता है ?

     भारतीय भाषाओँ में शरीर के लिए जो भी शब्द हैं, वे सब उसकी क्षुद्रता और नश्वरता के प्रतीक हैं। 

1-शरीर---शरीर का अर्थ है जो निरन्तर क्षीण हो रहा है (शीर्यते इति शरीरः)।


2-देह-- देह का अर्थ है जिसका दहन किया जाता है।


3-तनु(तन) -- जो आकार में छोटी हो।


4-काया-- काया वह है जिसे काल दबोच लेता है।


5-घट (घड़ा)--घड़ा तो फूटने के लिए ही बना है।

      समस्त आध्यात्मिक ग्रन्थ और महात्मा बार-बार मनुष्य को सतर्क करते रहे हैं कि देह मिट्टी की बनी है और एक दिन मिटटी में ही मिल जायेगी, उस पर ध्यान मत देना। हमारा तो कहना है कि मिट्टी में जब मिलेगी तब मिलेगी, लेकिन जब तक उसमें जी रहे हैं तब तक क्या उसकी उपेक्षा करें ?

     इस प्राणवान अद्भुत यंत्र की महिमा का वर्णन करने वाला कोई शास्त्र इस संसार में नहीं है--एक 'तंत्र' को छोड़ कर। क्या इसका कारण यह हो सकता है कि जिस समय ये शास्त्र निर्मित हुए, उस समय मनुष्य अपने शरीर के प्रति अत्यंत आसक्त रहा हो। उसका जीवन शरीर-ही-शरीर रहा हो। भोग में लिप्त मनुष्य की ऑंखें इन्द्रियों के ऊपर उठती ही न हों और उसे सावधान करने के लिए ज्ञानियों ने शरीर की निन्दा की हो। फिर ईसाईयत का विस्तार हुआ और नैतिकता की ऐसी पकड़ हुई मानव के सभी अंगों को उसने ग्रसित कर लिया। नैतिकता नैसर्गिक वस्तु नहीं है।(नैतिकता की नकाब के पीछे घोर अनैतिकता मौजूद है। अनैतिकता को ढकने के लिए ही नैतकता का चोंगा पहना गया है।) नैसर्गिक के बिलकुल विरुद्ध है यह। शरीर ही सबसे नैसर्गिक चीज़ है जो मनुष्य के अत्यन्त निकट है इसीलिए उसी का दमन सबसे अधिक हुआ है।

      शरीर को मानने वाला एक वर्ग अवश्य है जो गलत कारणों से शरीर को देता है महत्व। एक सूत्र भारत में बहुत प्रचलित है--"शरीरमाद्यम् खलु धर्म साधनम्।" धर्म को साधने का सबसे पहला साधन शरीर है।

      लेकिन इसके मर्म को बिना समझे उन लोगों ने इसे अपना लिया जो केवल शरीर को ही महत्व देते हैं। जो शरीर को व्यायाम के द्वारा केवल बलिष्ठ बनाने के चक्कर में ही पड़े रहते हैं। ध्यान और योग के प्रचलित रूप भी इसके पीछे पड़े रहते हैं। प्रचलित प्राणायाम भी शरीर की केवल बलिष्ठता की ओर ही ले जाते हैं, देह के रहस्य जानने के लिए नहीं, इसमें निहित असीम ऊर्जा के रहस्य को जानने के लिए नहीं। वे शरीर को मन का गुलाम बना कर अति प्रसन्न होते हैं। उनके लिए योग का अर्थ है--इन्द्रियों का दमन कर शरीर को अपने वश में करना।

      एकमात्र तंत्र ही ऐसा शास्त्र है जो शरीर को अन्तर्विज्ञान की दृष्टि से देखता है। उसने शरीर को बहुत सम्मान दिया है। शरीर की निसर्गदत्त प्रज्ञा, अद्भुत कार्य-प्रणाली,उसकेे भीतर के रहस्यों की पर्त--इन सबकी ओर तंत्रशास्त्र ने बार-बार हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

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