Tuesday, April 28, 2026

परमात्मा का कोई लेना-देना नहीं

 भक्ति में दुख? परीक्षा? यह सब तुम्हारे मन की धारणा है – परमात्मा का कोई लेना-देना नहीं


मेरे प्यारे मित्रो, आप सब जो हमसे फेसबुक से जुड़े हैं, आप सबके लिए आज एक सीधी और बिल्कुल साफ बात कहने आया हूँ। जो बात आपको कोई धर्मगुरु नहीं बताएगा, जो बात परंपराओं के अंधेरे में दब गई है – वही आज आपके सामने रखता हूँ।


"भगवान की भक्ति में कष्ट आते हैं, परीक्षाएँ होती हैं, भगवान परीक्षा लेते हैं।"


यह वाक्य आपने सुना होगा। शायद आप खुद भी यह मानते होंगे। पर यह सबसे बड़ा झूठ है – जो आपके धर्मगुरुओं ने आपके मन में बैठा दिया है। यह कोई आध्यात्मिक सत्य नहीं है। यह एक धारणा है। एक खतरनाक धारणा।


गहराई से समझो –


जब आप यह धारणा लेकर भक्ति के मार्ग पर चलते हैं कि "मुझे दुख आएगा, परीक्षा होगी", तो आपका मन वह सब पैदा करना शुरू कर देता है। दुख आता है। परीक्षा आती है। कष्ट आता है। और आप सोचते हो – "देखो, भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं।" पर भगवान कहीं खड़ा हुआ कुछ कर नहीं रहा। यह सब आपका मन कर रहा है। आपकी धारणा कर रही है। परमात्मा न तो तुम्हें दुख देने के लिए खड़ा है, न सुख देने के लिए। वह तो बस है। खेल तुम्हारे मन का है।


मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥


अर्थ – मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। जब मन विषयों (धारणाओं, विचारों) में आसक्त होता है, तो वही बंधन बन जाता है। और जब वही मन उन धारणाओं से मुक्त हो जाता है, तो मोक्ष मिलता है।


संकल्पो हि जगत् सर्वम्


यह पूरा जगत तुम्हारे संकल्प से, तुम्हारी धारणा से ही बना है। जो दुख तुम देख रहे हो, वह बाहर नहीं है – वह तुम्हारी धारणा का प्रक्षेपण है।


तो क्या करना है?


होश संभालो। अपनी बुद्धि से काम लो। साक्षी भाव से देखो। बस एक बार सारी धारणाओं को गिरते हुए देख लो। जिसकी सारी धारणाएँ गिर जाती हैं, उसे अपने स्वरूप का बोध हो जाता है। वह समझ जाता है कि वह शरीर नहीं, नाम नहीं, रूप नहीं – वह शुद्ध चेतना है।


। भक्ति का मतलब है आनंद में विलीन होना, शांति में डूब जाना। 


एक प्रयोग करके देखो –


अपने मन में बैठी किसी एक दृढ़ धारणा को लो – जैसे "मुझे हमेशा देर से सफलता मिलती है" या "भगवान ने मुझे दर्द दिया है"। अब उस धारणा को पकड़ो, और पूछो – क्या यह सच है? क्या परमात्मा ने खुद आकर तुमसे कहा? या तुमने यह सोच लिया? फिर उस धारणा को छोड़ो। बस देखो कि उसके बिना तुम क्या हो। तुम पाओगे – सारा दुख उसी धारणा के साथ चला गया। नया प्रकाश आ गया।


लाभ –


जब तुम यह समझ जाते हो कि दुख और परीक्षा भगवान नहीं, तुम्हारी अपनी धारणाएँ पैदा कर रही हैं – तो तुम डरना बंद कर देते हो। तुम किसी से नहीं डरते, किसी पर निर्भर नहीं रहते। तुम अपनी धारणाओं के मालिक बन जाते हो। और जब मात्र विचार करने से ही जगत में हलचल पैदा कर सकते हो – तो फिर क्या असंभव है? धारणा शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। उसे पहचानो, उसे समझो, उसे अपने वश में करो।


एक लाइन में सार –

"भगवान तुम्हारी परीक्षा नहीं ले रहा – तुम्हारी अपनी धारणाएँ तुम्हारी परीक्षा ले रही हैं। बस साक्षी बनकर देखो, सारी धारणाएँ गिर जाएँगी, और तुम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर हो जाओगे।"

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