मृत्यु 'भय का नाम' नहीं
“मरना तो प्रत्येक देह का निश्चित है; इस सत्य से कोई भी बच नहीं सकता। परंतु जो साधक आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है, उसके लिए यह तथ्य भय या चिंता का कारण नहीं रह जाता। क्योंकि वह जान लेता है कि जो नष्ट होता है, वह केवल शरीर है—न कि उसका वास्तविक स्वरूप।
अतः जीवन में ऐसा अमर भाव धारण करो कि ‘मैं नित्य हूँ, शाश्वत हूँ, काल से परे हूँ।’ यह भाव साधक को निर्भय बनाता है, उसे मृत्यु के भय से मुक्त करता है और उसे आत्मा की दिव्यता का अनुभव कराता है।
किन्तु सावधान! जब यह दिव्य अनुभूति प्रकट हो जाए कि ‘मैं सदा रहने वाला हूँ’, तब भी उसमें अहंकार का लेशमात्र प्रवेश न होने पाए। क्योंकि जैसे ही यह भाव ‘मैं महान हूँ’, ‘मैं अमर हूँ’ के अभिमान में परिवर्तित होता है, उसी क्षण साधना का पतन आरंभ हो जाता है।
अतः अमरत्व का अनुभव विनम्रता के साथ ही शोभा देता है। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं आत्मा का सत्य प्रकाश स्थिर होता है।”
१
“मैं करता हूँ” भाव जब, चित्त भीतर बसि जाय।
तब तक जीव बंधन रहे, सत्य न प्रकट होय।।
अर्थ: जब तक “मैं कर्ता हूँ” का भाव है, तब तक बंधन बना रहता है।
२
अहं न केवल गर्व है, देह-बुद्धि अभिमान।
यही कर्तृत्व मूल है, यही जगत की तान।।
अर्थ: अहंकार केवल घमंड नहीं, बल्कि देह-बुद्धि से जुड़ाव है।
३
प्रकृति करै सब क्रिया, गुण गुणहि अनुरूप।
मूढ़ कहै “मैं कर्ता”, भूलि गया निज रूप।।
अर्थ: सब कार्य प्रकृति करती है, पर अज्ञानवश मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है।
४
जब देखे साक्षी भाव से, उठत विचार अपार।
तब ढीला हो अहंभाव, मिटे कर्ता का भार।।
अर्थ: साक्षीभाव से देखने पर अहंकार ढीला पड़ने लगता है।
५
अकर्ताभाव स्थित हुए, शांति प्रकट मन माहिं।
फल-बंधन सब छूटते, चिंता रहे न काहिं।।
अर्थ: अकर्ताभाव से कर्मफल का बंधन समाप्त हो जाता है।
६
अहंकार हटि जाय जब, ब्रह्म प्रकाशे आप।
ज्यों घट हटते मेघ से, दीखे रवि प्रतिताप।।
अर्थ: अहंकार हटते ही आत्मा का प्रकाश प्रकट हो जाता है।
(साक्षीभाव)
७
दृश्य सकल यह जगत है, बदलत क्षण-क्षण रूप।
द्रष्टा साक्षी अचल है, नित निरंतर अनूप।।
अर्थ: संसार बदलने वाला है, पर साक्षी आत्मा स्थिर है।
८
“मैं दुखी, मैं सुखी” कहै, मन का खेल अनंत।
आत्मा सदा अछूत है, साक्षी रहे संत।।
अर्थ: सुख-दुःख मन के हैं, आत्मा उनसे परे है।
९
जो देखे बस देखता, न करे संग विचार।
साक्षीभाव विकसित हो, कटे मोह जंजाल।।
अर्थ: केवल देखने का अभ्यास साक्षीभाव उत्पन्न करता है।
१०
करता सब व्यवहार वह, भीतर रहे उदास।
जग में रहकर मुक्त है, यही साक्षी निवास।।
अर्थ: साक्षीभाव से व्यक्ति संसार में रहते हुए भी मुक्त रहता है।
११
बंध-मोक्ष सब मन गढ़े, आत्मा सदा स्वतंत्र।
साक्षीभाव स्थित जन को, न बंधन न तंत्र।।
अर्थ: आत्मा सदा मुक्त है, बंधन-मोक्ष मन की कल्पना है।
१२
साक्षी में जो लीन है, वही परम विश्राम।
तरि जाता भवसागर, पाकर निज ही धाम।।
अर्थ: साक्षीभाव ही मुक्ति का मार्ग है।
(वैराग्य का रहस्य)
१३
वैराग्य न त्यागे जगत, न घर-वन का भेद।
आसक्ति का क्षय जहाँ, वहीं सच्चा वेद।।
अर्थ: वैराग्य वस्तु त्याग नहीं, आसक्ति का त्याग है।
१४
बाह्य त्याग करि क्या भया, मन में रहे विकार।
सच्चा वैरागी वही, जिसका शुद्ध विचार।।
अर्थ: केवल बाहरी त्याग से वैराग्य नहीं आता।
१५
भोग सभी क्षणभंगुर हैं, जानत विवेकवान।
अपने आप छूटते फिर, न करे कोई त्राण।।
अर्थ: विवेक से भोग स्वतः छूट जाते हैं।
१६
ज्यों बालक खेलन तजे, पाकर बोध महान।
त्यों साधक जग छोड़ता, पा आत्मा ज्ञान।।
अर्थ: ज्ञान आने पर वैराग्य सहज हो जाता है।
१७
दृष्टि बदलते ही लगे, जगत नया स्वरूप।
जहाँ मोह था बंधन, वहाँ दिखे ब्रह्म रूप।।
अर्थ: दृष्टिकोण बदलते ही संसार का अनुभव बदल जाता है।
१८
त्याग नहीं यह ज्ञान है, यह अंतर की बात।
वैराग्य वही श्रेष्ठ है, जहाँ न रहे आसक्त।।
अर्थ: वैराग्य भीतर की अवस्था है।
(पूर्णता का अनुभव)
१९
पूर्ण वही यह जगत है, पूर्ण स्वयं ही आप।
पूर्ण से ही पूर्णता, प्रकटे बिना प्रयास।।
अर्थ: सब कुछ पहले से ही पूर्ण है।
२०
बाहर खोजे जगत में, दौड़े जन अज्ञान।
पूर्णता भीतर बसि, जानत नहीं इंसान।।
अर्थ: मनुष्य बाहर पूर्णता खोजता है, जबकि वह भीतर है।
२१
न कुछ पाना शेष है, न कुछ खोना काज।
जो है सो ही पूर्ण है, यही आत्मा राज।।
अर्थ: पूर्णता में न पाने की इच्छा रहती है, न खोने का भय।
२२
जब यह बोध हृदय धरे, मिटे सकल संदेह।
शांति, आनंद, मुक्तता, प्रकटे अपने नेह।।
अर्थ: पूर्णता का अनुभव शांति देता है।
२३
यही मोक्ष की सत्यता, न काल न स्थान।
वर्तमान में जो मिले, वही ब्रह्म पहचान।।
अर्थ: मोक्ष वर्तमान का अनुभव है।
२४
अहं लय, साक्षी स्थित, वैराग्य दृष्टि सुधार।
पूर्णत्व अनुभव करै, वही भव पार अपार।।
अर्थ: अहंकार त्याग, साक्षीभाव, वैराग्य और पूर्णता का अद्भुत अद्वैत मय भाव —ये ही मुक्ति का मार्ग हैं।
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