जैसे ही ध्यान कर्म के परिणाम पर जाता है, वैसे ही कर्म से ध्यान हटने लगता है। यही मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना है वह उस चीज़ के पीछे भागता है जो उसके नियंत्रण में नहीं है, और जिसे वह पूरी तरह साध सकता है, उसे अधूरा छोड़ देता है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है कि वह भविष्य में भटकता है या अतीत में उलझता है। वर्तमान में टिकना उसे कठिन लगता है। जब हम किसी कार्य को करते हैं चाहे वह व्यापार हो, परीक्षा की तैयारी हो या जीवन का कोई छोटा-बड़ा निर्णय तो हमारा ध्यान बार-बार परिणाम की ओर खिंच जाता है। “क्या मैं सफल हो पाऊँगा?”, “अगर असफल हुआ तो क्या होगा?”, “लाभ होगा या हानि?” ये प्रश्न धीरे-धीरे हमारे भीतर जड़ें जमा लेते हैं।
और जैसे ही ये प्रश्न गहराने लगते हैं, वैसे ही वर्तमान धुंधला होने लगता है। कार्य की गति धीमी पड़ जाती है, एकाग्रता टूटने लगती है, और जो ऊर्जा कर्म में लगनी चाहिए थी, वह चिंता में खर्च होने लगती है। यही वह क्षण होता है जब मनुष्य अपने ही प्रयासों के मार्ग में बाधा बनने लगता है।
वास्तव में, हर इंसान अपने जीवन में अनेक घटनाओं से गुजरता है। कुछ घटनाएँ उसे मजबूत बनाती हैं, तो कुछ भीतर डर, भय, बेचैनी और असफलता की आशंका भर देती हैं। ये भावनाएँ अवचेतन मन में घर कर लेती हैं और समय-समय पर उभरकर हमारे वर्तमान को प्रभावित करती हैं। जब हम किसी नए कार्य की शुरुआत करते हैं, तो ये छिपे हुए भय हमें परिणाम की चिंता में धकेल देते हैं।
लेकिन एक गहरी सच्चाई यह है कि परिणाम कभी वर्तमान में नहीं मिलता। वह हमेशा समय की गोद में छिपा होता है। आज जो कर्म हम कर रहे हैं, वही कल परिणाम बनकर हमारे सामने आएगा। फिर भी मनुष्य परिणाम को पहले जानना चाहता है यही उसकी अधीरता है।
जब मन परिणाम में उलझ जाता है, तो विचारों का एक चक्र शुरू हो जाता है। एक विचार दूसरे को जन्म देता है, और धीरे-धीरे यह सोच इतनी गहरी हो जाती है कि वह हमारे कर्म को प्रभावित करने लगती है। कार्य में बाधा आने लगती है, निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ती है, और व्यक्ति अपने ही संदेहों में फँस जाता है।
ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि मन वर्तमान से कट जाता है। जागरूकता कम हो जाती है, और व्यक्ति यांत्रिक तरीके से काम करने लगता है। वह काम तो करता है, लेकिन उसमें जीवन नहीं होता, उसमें समर्पण नहीं होता।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या फल की चिंता करना गलत है? बिल्कुल नहीं। फल से ही जीवन जुड़ा है रोटी, परिवार, जिम्मेदारियाँ सब कुछ परिणाम पर ही निर्भर करता है। इसलिए फल की चिंता स्वाभाविक है, आवश्यक भी है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यह चिंता हमारे कर्म पर हावी हो जाती है।
जीवन का संतुलन इसी में है कि हम फल की आवश्यकता को समझें, लेकिन उसे अपने कर्म पर हावी न होने दें।
मैंने 2016 में अपनी (MA) पढ़ाई पूरी करने के बाद यह निश्चय किया कि मैं जो भी करूँगा, अपने दम पर करूँगा। अपने सपनों के साथ मैं एक नए शहर की ओर बढ़ा। जेब में थोड़े पैसे थे, लेकिन इरादे मजबूत थे। मैंने सोचा कि कुछ काम करके एक छोटा सा व्यवसाय शुरू करूँगा।
जीवन ने पहली ही परीक्षा में मुझे झटका दिया। जिस फैक्ट्री में मैं काम कर रहा था, वहाँ आग लग गई। रोज़गार छिन गया, और मुझे वापस लौटना पड़ा। यह वह क्षण था जहाँ बहुत लोग हार मान लेते हैं, लेकिन मैंने हार नहीं मानी।
इसके बाद मैंने एक अलग राह चुनी समाज सेवा की राह। 2018 में मैंने भारत शांति विश्व शांति का संदेश लेकर लंबी पदयात्रा(बंगाल से दिल्ली ) की। 65 दिनों तक चलता रहा, लोगों से मिला, अपने विचार साझा किए। इस यात्रा में मुझे प्रशंसा भी मिली और उपहास भी। कई लोगों ने मुझे पागल कहा, कई ने सवाल उठाए “इससे क्या मिला?”, “पैसा मिला या नौकरी?”
यहीं से मुख्य संघर्ष शुरू हुआ बाहरी नहीं, बल्कि भीतर का।
जब समाज मेरे प्रयासों को परिणाम की कसौटी पर तौलने लगा, तब अपने विश्वास को बनाए रखना आसान नहीं था। यह दबाव धीरे-धीरे मन को तोड़ने लगा। एक समय ऐसा भी आया जब मैं अवसाद की ओर बढ़ने लगा।
लेकिन यहीं मैंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया मैंने अपने कर्म को ही अपना फल मान लिया। मुझे बाहरी मान्यता की आवश्यकता नहीं रही। मुझे अपने कार्य में ही शांति मिलने लगी।
इसके बाद मैंने समाज के लिए काम जारी रखा मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई, बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहा हूँ । मैंने यह सब बिना किसी फल की अपेक्षा के किया और आज भी कर रहा हूँ । और यही मेरी सबसे बड़ी शक्ति बन गई।
हर कोई इस सोच को नहीं समझ सकता। क्योंकि समाज का बड़ा हिस्सा परिणाम पर केंद्रित है। लेकिन जो व्यक्ति कर्म में ही संतोष ढूंढ लेता है, वह भीतर से मुक्त हो जाता है।
जीवन का सार यही है कर्म करना, पूरी सजगता और समर्पण के साथ। फल की चिंता करना स्वाभाविक है, लेकिन उसे अपने ऊपर हावी न होने देना ही साधना है।
जब हम वर्तमान में जीना सीख जाते हैं, तो हमारा हर कार्य बेहतर हो जाता है। हमारी ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि एक दिशा में प्रवाहित होती है। और तब परिणाम भी अपने समय पर, अपने स्वरूप में, हमारे सामने आता है।
फल हमारे अधिकार में नहीं है, लेकिन कर्म पूरी तरह हमारे हाथ में है। और जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तब न केवल हमारा कार्य बेहतर होता है, बल्कि हमारा मन भी शांत हो जाता है।
"कर्म में ही जीवन है, और उसी में उसका सच्चा फल छिपा है।"
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