Friday, February 6, 2026

प्रेम, भय और वर्तमान में जीने की कला

 प्रेम, भय और वर्तमान में जीने की कला


प्रेम केवल किसी व्यक्ति से जुड़ जाना नहीं है, बल्कि वह हमारे भीतर घटने वाली सबसे गहरी मानवीय प्रक्रिया है। हम जिस चीज़ से प्रेम करते हैं, धीरे-धीरे वही हमारे सोचने, महसूस करने और जीने का तरीका बन जाती है। इसीलिए प्रेम हमें विस्तार भी देता है और असुरक्षा भी।


प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहाँ वह सुख देता है, वहीं वह भय भी पैदा करता है खो देने का भय।


प्रेम एक चाह है


प्रेम हमेशा किसी “अच्छे” की ओर बढ़ता है।

हम वही चाहते हैं जो हमें सुखी कर सकता है ऐसा हमें लगता है।


लेकिन चाह की एक सच्चाई यह भी है कि


हम केवल उसी चीज़ को चाहते हैं जो हमारे पास नहीं है।


जैसे ही वह चीज़ मिल जाती है, चाह शांत होने लगती है।

और उसी क्षण एक नया भाव जन्म लेता है 

डर कि कहीं यह छिन न जाए।


जहाँ पकड़ है, वहाँ डर है


जब प्रेम अधिकार बन जाता है,

जब वह “मेरा” और “हमेशा के लिए” की माँग करता है,

तब वह शांति नहीं, बेचैनी पैदा करता है।


हम भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश में

वर्तमान को खो बैठते हैं।


हम साथ होते हुए भी जी नहीं पाते,

क्योंकि मन लगातार आने वाले नुकसान की गणना करता रहता है।


भविष्य का भय और वर्तमान की मृत्यु


मनुष्य अक्सर उस चीज़ से डरता है जो अभी हुई ही नहीं।

यह डर इतना प्रबल हो जाता है कि

वह जीवन को देखने का नज़रिया ही बदल देता है।


भय हमें वर्तमान से बाहर खींचकर

या तो बीते हुए कल में डाल देता है

या आने वाले कल की चिंता में।


इस तरह हम जीते हुए भी जीवन से दूर हो जाते हैं।


सच्चा प्रेम क्या चाहता है


सच्चा प्रेम किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को बाँधना नहीं चाहता।

वह चाहता है ... निडरता।


ऐसी निडरता जिसमें साथ रहने का सुख हो,

लेकिन खोने का आतंक न हो।


ऐसा प्रेम जो यह जानता हो कि

हर चीज़ अस्थायी है 

और फिर भी उसे पूरे मन से स्वीकार करता हो।


वर्तमान क्षण की शक्ति


वास्तविक जीवन केवल इसी क्षण में है।

न अतीत में, न भविष्य में।


जब हम पूरी तरह अभी में होते हैं 

बिना उम्मीद और बिना डर 

तभी प्रेम अपनी सबसे शुद्ध अवस्था में होता है।


वही क्षण सबसे जीवंत होता है,

भले ही वह बहुत छोटा क्यों न हो।


प्रेम और पहचान


मनुष्य अकेला पूरा नहीं होता।

वह हमेशा किसी से, किसी विचार से, किसी उद्देश्य से जुड़ना चाहता है।


हम कौन हैं 

यह हमारे प्रेम से तय होता है।


जिससे हम प्रेम करते हैं,

वही हमारी पहचान का हिस्सा बन जाता है।


और जो प्रेम से पूरी तरह दूर हो जाता है,

वह धीरे-धीरे स्वयं से भी कटने लगता है।


क्षणभंगुरता ही सुंदरता है


हर रिश्ता, हर प्रेम, हर मिलन 

एक दिन समाप्त होगा।


यह सच्चाई प्रेम को छोटा नहीं बनाती,

बल्कि उसे और मूल्यवान बनाती है।


प्रेम की जीत उसकी स्थायित्व में नहीं,

बल्कि उसकी ईमानदार उपस्थिति में है।


पूरी सच्चाई से जिया गया एक दिन

झूठे आश्वासन से भरे वर्षों से कहीं बड़ा होता है।


प्रेम हमें डराना नहीं चाहिए,

उसे हमें खुला बनाना चाहिए।


जो प्रेम वर्तमान में जीना सिखा दे,

जो हमें पकड़ने के बजाय भरोसा करना सिखा दे,

वही प्रेम जीवन को अर्थ देता है।


क्योंकि अंततः,

जीवन को थामकर नहीं,

उसे जीकर ही समझा जा सकता है।

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