श्रीनिवास रामानुजन — वो जो संख्याओं से बातें करते थे
कभी-कभी ईश्वर कुछ लोगों को धरती पर एक खास मकसद से भेजते है —
किसी के हाथों कला खिलती है, किसी के शब्दों से विचार जन्म लेते हैं,
और कुछ लोग… संख्याओं में ईश्वर को खोज लेते हैं।
ऐसे ही थे श्रीनिवास रामानुजन।
एक साधारण घर का बालक, जिसकी आँखों में बस एक ही दुनिया बसती थी —
संख्याओं की दुनिया।
बचपन की शुरुआत
22 दिसंबर 1887 का दिन।
तमिलनाडु के एक छोटे-से कस्बे इरोड में एक नन्हा बालक जन्मा।
कौन जानता था कि यह बच्चा एक दिन पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन करेगा।
रामानुजन का बचपन संघर्षों से भरा था —
गरीबी, सीमित साधन, और शिक्षा के कम अवसर।
पर जहाँ दुनिया किताबों में उत्तर खोज रही थी,
वहाँ यह बच्चा खुद अपनी दुनिया के सूत्र रच रहा था।
उसके लिए गणित कोई विषय नहीं था,
वह तो एक भक्ति थी,
एक संवाद था ईश्वर से।
वह कहा करते थे —
“हर गणितीय सूत्र तभी सार्थक है जब उसमें ईश्वर की झलक मिले।”
संघर्ष और जिजीविषा:-
औपचारिक शिक्षा में वे कई बार असफल हुए,
लेकिन संख्याओं के प्रति उनका प्रेम कभी असफल नहीं हुआ।
कागज़ न मिले तो स्लेट पर,
स्लेट न मिले तो दीवार पर,
दीवार न मिले तो ज़मीन पर…
वे बस गणित लिखते जाते थे।
उनकी माँ कहतीं,
“नमगिरि देवी उन्हें सपनों में सूत्र बताती हैं।”
और वे सुबह उठकर वही सूत्र लिख देते।
जब एक साधारण टैक्सी बनी अमर:-
एक दिन प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी अस्पताल में रामानुजन से मिलने आए।
वे बोले,
“आज मैं टैक्सी नंबर 1729 से आया हूँ — बड़ा साधारण नंबर है।”
रामानुजन मुस्कुराए —
“नहीं, यह संख्या बहुत खास है।
यह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो अलग-अलग तरीकों से दो घनों के योग के रूप में लिखा जा सकता है।”
और फिर उन्होंने सहजता से कहा —
“देखिए,
1729 = 1³ + 12³ = 9³ + 10³”
हार्डी हैरान रह गए!
वह क्षण इतिहास में दर्ज हो गया,
और 1729 हमेशा के लिए ‘रामानुजन संख्या’ बन गई।
विश्व में पहचान
जब उनकी प्रतिभा की चर्चा इंग्लैंड पहुँची,
तो हार्डी ने उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय बुलाया।
वहाँ रामानुजन ने ऐसे-ऐसे सूत्र दिए जिन्हें आज भी वैज्ञानिक समझने की कोशिश कर रहे हैं।
उनके पास न कोई कंप्यूटर था, न प्रयोगशाला —
बस एक कॉपी, पेंसिल और अटूट आस्था।
वो कहते थे —
“मेरे सूत्र देवी की कृपा हैं, मैं तो केवल माध्यम हूँ।”
अनोखी बातें:-
वे गणित को प्रमाण से नहीं, अनुभव से समझते थे।
उन्हें लगता था कि हर संख्या एक जीवित आत्मा है।
वे पाई (π) और अनंत श्रेणियों पर ऐसे सूत्र बताते थे,
जिनका कोई दूसरा उदाहरण नहीं।
अंत जो शुरुआत बन गया:-
सिर्फ़ 32 वर्ष की आयु में, 1920 में,
यह अद्भुत आत्मा इस दुनिया से विदा हो गई।
पर जाते-जाते वह एक विरासत छोड़ गए —
विचार, विश्वास और गणित के प्रति श्रद्धा की।
आज 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है,
और हर भारतीय गर्व से कहता है —
“हमारे देश ने वह प्रतिभा जन्मी थी,
जिसने संख्याओं में ईश्वर देखा था।”
संदेश-
श्रीनिवास रामानुजन हमें सिखाते हैं—
गरीबी प्रतिभा को नहीं रोक सकती।
सीमाएँ सिर्फ़ शरीर की होती हैं, मन की नहीं।
और जब हम अपने काम से प्रेम करते हैं,
तो हर गणना एक प्रार्थना बन जाती है।
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