"प्रेम, भय और नियंत्रण: स्त्री-पुरुष के भीतर छिपी असुरक्षाएँ"
मनुष्य का जीवन केवल बाहर की दुनिया में घटने वाली घटनाओं से नहीं बनता, बल्कि भीतर चलने वाले संघर्षों से आकार लेता है। प्रेम, विश्वास और समर्पण जैसे शब्द जितने सुंदर लगते हैं, उतने ही जटिल भी हैं। इन्हीं भावनाओं के भीतर कहीं न कहीं भय, असुरक्षा और खो देने की आशंका छिपी रहती है चाहे वह स्त्री का मन हो या पुरुष का।
स्त्री का प्रेम अक्सर पूर्ण समर्पण चाहता है। वह जिसे प्रेम करती है, उसमें अपनी पहचान ढूँढने लगती है। यही उसका सबसे बड़ा बल भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी। जब उसका सारा संसार एक व्यक्ति, एक विचार या एक उद्देश्य के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, तब उसके भीतर यह डर जन्म लेने लगता है कि कहीं यह सब छिन न जाए। यही भय उसे नियंत्रक बना सकता है, कठोर बना सकता है, और कभी-कभी ऐसे निर्णयों की ओर धकेल देता है जिनका वह स्वयं अनुमान नहीं कर पाती।
वहीं पुरुष का प्रेम अक्सर स्वतंत्रता से जुड़ा होता है। वह चाहता है कि उसे समझा जाए, पर बाँधा न जाए। उसकी सबसे गहरी आशंका यह होती है कि कहीं प्रेम उसकी गति, उसकी सोच और उसके विस्तार को सीमित न कर दे। जब उसे लगता है कि कोई उसके चारों ओर घेरा बना रहा है, तब वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगता है। वह खुलकर संघर्ष नहीं करता, बल्कि चुप्पी, दूरी और अंततः त्याग का रास्ता चुन लेता है।
यहीं से दोनों के बीच का असंतुलन शुरू होता है। स्त्री जितना पास आती है, पुरुष उतना दूर जाने लगता है। स्त्री इस दूरी को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानती है और उसे भरने के लिए और अधिक प्रयास करती है। पुरुष उस प्रयास को दबाव समझने लगता है। यह टकराव प्रेम का नहीं, बल्कि दोनों की छिपी असुरक्षाओं का होता है।
स्त्री की आशंका यह होती है कि यदि उसने सब कुछ नहीं थामा, तो सब कुछ बिखर जाएगा। पुरुष की आशंका यह होती है कि यदि वह रुक गया, तो वह स्वयं को खो देगा। दोनों अपने-अपने डर से संचालित होते हैं, और यही डर प्रेम को धीरे-धीरे सत्ता, नियंत्रण और अपेक्षाओं के खेल में बदल देता है।
सबसे दुखद बात यह है कि जब यह संबंध टूटता है, तो दोनों ही खुद को पीड़ित मानते हैं। स्त्री सोचती है कि उसने सब कुछ दिया फिर भी उसे छोड़ा गया। पुरुष सोचता है कि उससे बहुत कुछ छीन लिया गया। दोनों ही सच होते हैं, और दोनों ही अधूरे।
प्रेम वास्तव में तभी मुक्त करता है, जब उसमें भय न हो। जब स्त्री यह समझ सके कि उसका अस्तित्व किसी एक केंद्र पर निर्भर नहीं है, और पुरुष यह स्वीकार कर सके कि निकटता स्वतंत्रता की शत्रु नहीं होती। जब समर्पण और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री बन जाएँ।
समस्या प्रेम की नहीं होती, बल्कि उस खालीपन की होती है जिसे हम प्रेम से भरना चाहते हैं। और जब तक मनुष्य अपने भीतर की उस रिक्ति से सामना नहीं करता, तब तक वह हर रिश्ते में उसी भय को दोहराता रहेगा चाहे पात्र बदल जाएँ, चाहे परिस्थितियाँ।
राहुल कुमार झा ✒️✒️
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