स्त्री और पुरुष : सात्विकता की ओर एक अंतर्मन यात्रा
जीवन को केवल बुद्धि, तर्क या बाहरी आचार से नहीं समझा जा सकता।
मनुष्य चाहे स्त्री हो या पुरुष, जब तक वह अपने भीतर की सच्चाई और सात्विकता को नहीं पहचानता, तब तक जीवन अधूरा रहता है।
विचारों, मतों या वादों के आधार पर जीवन के अर्थ नहीं खुलते वे तो केवल दिशा देते हैं, मंज़िल नहीं।
मंज़िल मिलती है तब, जब हृदय में सात्विकता का दीपक जलता है।
सात्विकता का अर्थ : बाहरी आचरण से भीतर की शुद्धता तक
सात्विकता केवल भोजन या व्यवहार का विषय नहीं है; यह जीवन की आत्मिक अवस्था है।
यह वह भावना है जो मनुष्य को दूसरों के दुःख को अपना मानने की क्षमता देती है।
यह वह संतुलन है जो वासनाओं, क्रोध, ईर्ष्या और मोह के बीच भी मन को स्थिर रखता है।
स्त्री की सात्विकता उसकी करुणा, धैर्य और सृजनशीलता में झलकती है।
पुरुष की सात्विकता उसकी स्थिरता, निष्ठा और त्यागभावना में दिखाई देती है।
दोनों मिलकर जब इस सात्विकता को जीते हैं, तब जीवन केवल पारिवारिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना बन जाता है।
सात्विकता का आधार : जीवदया, सत्य और भक्ति
सात्विक जीवन का पहला कदम है जीवदया हर जीव के प्रति करुणा और सम्मान।
जब मनुष्य यह समझ लेता है कि दूसरों का अस्तित्व भी उतना ही मूल्यवान है जितना उसका स्वयं का, तब उसका व्यवहार सहज रूप से नम्र हो जाता है।
दूसरा आधार है सत्य केवल वचन का नहीं, बल्कि विचार और भावना का भी।
सत्य वह शक्ति है जो भीतर की अशुद्धताओं को उजागर करती है, और आत्मा को पारदर्शी बनाती है।
तीसरा आधार है भक्ति जो केवल किसी ईश्वर की आराधना नहीं, बल्कि जीवन के हर कार्य में पवित्रता और समर्पण का भाव है।
जब स्त्री अपने परिवार की सेवा में, और पुरुष अपने कर्म के प्रति निष्ठा में भक्ति का भाव लाता है, तब वह साधक बन जाता है।
स्त्री और पुरुष : एक-दूसरे के पूरक
स्त्री और पुरुष जीवन के दो छोर नहीं, बल्कि एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ हैं।
एक में करुणा का प्रवाह है, तो दूसरे में निर्णय की दृढ़ता।
जब करुणा और दृढ़ता का यह संगम होता है, तब सृजन होता है
सिर्फ एक नए जीवन का नहीं, बल्कि एक नए समाज का, जहाँ प्रेम, समानता और सहयोग का वास होता है।
स्त्री की सात्विकता परिवार को कोमलता देती है;
पुरुष की सात्विकता उसे स्थायित्व देती है।
इन दोनों के बिना समाज की संरचना अधूरी रहती है।
सात्विकता का सामाजिक प्रभाव
जब व्यक्ति सात्विक होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसके भीतर नहीं, उसके परिवेश पर भी पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति अपने व्यवहार से दूसरों में शांति, विश्वास और सद्भाव का संचार करता है।
उसकी उपस्थिति ही एक संदेश बन जाती है कि बिना आडंबर के भी जीवन सुन्दर हो सकता है।
यदि स्त्री और पुरुष दोनों अपने जीवन में सात्विकता को स्थान दें,
तो घर में वाद-विवाद की जगह संवाद आएगा,
संदेह की जगह विश्वास, और भय की जगह प्रेम का वातावरण बनेगा।
यही सात्विकता समाज में फैलकर हिंसा, ईर्ष्या और स्वार्थ को दूर कर सकती है।
भीतर की साधना से बाहर की शांति तक
जीवन की सच्ची सफलता धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं मापी जाती।
वह मापी जाती है इस बात से कि हमारे भीतर कितनी शांति है,
हम दूसरों के सुख-दुःख में कितना सहभागी बन पाते हैं,
और हमारे मन में कितना प्रेम, करुणा और संयम है।
जब स्त्री और पुरुष दोनों सात्विकता की इस साधना को अपनाते हैं,
तो न केवल उनका व्यक्तिगत जीवन संतुलित होता है,
बल्कि पूरा समाज भी शांति और सौहार्द से भर जाता है।
सात्विकता केवल एक विचार नहीं यह जीवन की अनिवार्य साधना है।
यही साधना मनुष्य को मनुष्यता के उच्चतम शिखर तक ले जाती है।
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