“टूटी खिड़की” और “टूटे इंसान” : स्त्री–पुरुष सम्बन्धों का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
"एक टूटी हुई खिड़की, यदि ठीक न की जाए, तो पूरी इमारत के ढहने का आरंभ बन जाती है।"
यही बात, मनुष्यों और रिश्तों दोनों पर समान रूप से लागू होती है।
1. ब्रोकन विंडो थ्योरी और मनुष्य का मन
ब्रोकन विंडो थ्योरी कहती है कि अगर किसी जगह पर छोटी अव्यवस्थाओं को अनदेखा किया जाए जैसे टूटी खिड़की, बिखरा कचरा, दीवारों पर पोस्टर तो वह जगह धीरे-धीरे अपराध और अराजकता का केंद्र बन जाती है।
क्योंकि जब समाज देखता है कि किसी को इसकी परवाह नहीं है, तो वह “सीमा” मिट जाती है, और अनुशासन धीरे-धीरे गायब होने लगता है।
यही सिद्धांत मानवीय मन पर भी लागू होता है।
जब कोई इंसान भीतर से टूटता है किसी संबंध के बोझ से, असफलता से, या उपेक्षा से और उसके उस टूटेपन पर किसी का ध्यान नहीं जाता,
तो धीरे-धीरे उसकी आत्मा में अव्यवस्था शुरू हो जाती है।
पहले आत्मसम्मान टूटता है, फिर आत्मविश्वास, और फिर वह धीरे-धीरे भीतर से खाली होने लगता है।
2. जब रिश्ता एक “इमारत” बनता है
स्त्री और पुरुष का रिश्ता किसी इमारत की तरह है
जहाँ विश्वास नींव है, संवाद दीवारें हैं, और आदर उसकी छत है।
जब इस इमारत की कोई “खिड़की” यानी छोटी सी गलती, गलतफहमी या उपेक्षा टूटती है,
तो उस समय अगर किसी ने उसे ठीक नहीं किया,
तो धीरे-धीरे दरारें गहरी होने लगती हैं।
छोटी-छोटी बातें जो पहले हँसी में निकल जाती थीं, अब तकरार का कारण बन जाती हैं।
जहाँ पहले मौन समझदारी थी, अब मौन दूरी बन जाता है।
और फिर रिश्ता एक ऐसी जगह बन जाता है जहाँ भावनाओं की चोरी शुरू हो जाती है
विश्वास की, सम्मान की, प्रेम की।
3. “टूटे हुए” स्त्री या पुरुष के साथ समाज का व्यवहार
जैसे सड़क पर छोड़ी गई टूटी कार को देखकर लोग उसके हिस्से उखाड़ने लगते हैं,
वैसे ही समाज एक टूटे हुए इंसान के प्रति भी वैसा ही व्यवहार करता है।
एक टूटी हुई स्त्री, जो किसी रिश्ते या अपमान से घायल हुई हो,
उसके भीतर झाँकने से पहले समाज उसके चरित्र का विश्लेषण करने लगता है।
कोई उसके आँसू में दर्द नहीं, बल्कि “कमज़ोरी” देखता है।
एक टूटा हुआ पुरुष, जो अंदर से थक गया हो, टूट गया हो,
उसे कहा जाता है “मर्द बनो”, “कमज़ोर मत बनो”।
कोई उसके भीतर चल रही जंग नहीं देखता, बस उसके चेहरे की मुस्कान की मांग करता है।
और फिर वही होता है जो ब्रोकन विंडो थ्योरी कहती है
जब एक टूटी खिड़की की मरम्मत नहीं की जाती,
तो पूरी इमारत लूट ली जाती है।
जब एक टूटा हुआ इंसान समय पर समझा नहीं जाता,
तो वह या तो खुद को खो देता है या दूसरों के लिए “संवेदना से परे” बन जाता है।
4. रिश्तों में मरम्मत की संस्कृति
रिश्ते टूटते नहीं, अनदेखे रह जाने से ढहते हैं।
हर रिश्ता किसी न किसी समय दरारों से गुजरता है
पर फर्क इस बात से पड़ता है कि कोई उस दरार को “मरम्मत” करना चाहता है या नहीं।
मरम्मत का अर्थ है
बातों को सुनना, दोष नहीं ढूंढना।
मौन को समझना, मौन में चुभना नहीं।
समय देना, समाधान नहीं थोपना।
ब्रोकन विंडो थ्योरी हमें सिखाती है
छोटी चीज़ों को अनदेखा मत करो।
चाहे वह दीवार की दरार हो या मन की।
क्योंकि हर दरार, यदि अनदेखी रह जाए,
तो एक दिन वह सब कुछ गिरा देती है
रिश्ते भी, विश्वास भी, और व्यक्ति भी।
टूटी हुई खिड़कियों की मरम्मत से शहर बचते हैं,
और टूटे हुए मनों की मरम्मत से समाज।
पर शर्त यही है कि कोई यह देखना चाहे कि कहाँ से दरार शुरू हुई थी।
रिश्तों की दुनिया में,
समझ और सहानुभूति वह औजार हैं
जो टूटे हुए को फिर से जोड़ सकते हैं।
कभी अगर कोई “टूटा हुआ इंसान” दिखे,
तो उसके हिस्से को मत लूटो
थोड़ी संवेदना से,
शायद तुम किसी की पूरी दुनिया बचा सकते हो।
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