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Monday, January 19, 2026
ब्रूस ली
ब्रसू ली होंगकोंग के सबसे प्रसिद्ध चाइल्ड आर्टिस्ट में से एक थे। वे 18 साल की उम्र तक वे 20 फिल्में कर चुके थे।
वे दुनिया के सबसे बेहतरीन मार्शल आर्टिस्ट थे। साल 2013 में मरणोपरांत उन्हें एशियाई अवॉर्ड्स में प्रतिष्ठित फाउंडर अवॉडर्स से नवाजा गया था।
हमेशा रियल रहो, खुद को पेश करो, खुद पर विश्वास रखो, बाहर जाकर किसी अन्य सफल व्यक्तित्व को मत तलाशो और इसकी नक़ल मत करो।
जॉनी लीवर
Success Story of Johnny Lever
मेरा परिचय
जॉन प्रकाश राव उर्फ़ जॉनी लीवर एक भारतीय कॉमेडियन अभिनेता हैं। वह हिंदी सिनेमा में अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए प्रसिद्ध हैं। जॉनी लीवर भारत के पहले स्टैंड कॉमेडियन हैं। उन्हें अब तक 13 बार फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। जॉनी बॉलीवुड में अब तक साढ़े तीन सौं से अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं।
कभी पैन बेचता था देश का यह मशहूर कॉमेडियन
वैसे तो बॉलीवुड में एक से बढकर एक कॉमेडियन हुए लेकिन पहला स्टैंडअप कॉमेडियन जॉनी लीवर को ही माना जाता है. 14 अगस्त 1956 को इसाई परिवार में जन्मे Johnny Lever का असली नाम जॉन प्रकाश राव है. जॉनी लीवर बॉलीवुड के अपने शुरुआती समय में मिमिक्री किया करते थे और धीरे धीरे कड़ी महनत के साथ वो आज बॉलीवुड के एक हास्य कलाकार के रूप में जाने जाते है जिन्हें अब तक 13 फिल्मफेयर अवार्ड मिल चुके है. 350 से भी ज्यादा फिल्मो में काम करना इस बात का सबुत है कि लोगो ने उनकी कड़ी मेहनत के साथ, उन्हें एक कॉमेडियन के रूप में स्वीकारा है. परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत न हो तो मुंबई में सपने पुरे करना और भी मुश्किल हो जाता है. ऐसा ही कुछ Johnny Lever के साथ भी था. वह घर में अपने दो भाई और तीन बहनो में सबसे बड़े थे और जिम्मेदारियो के नीचे दबे थे. ऐसे में उन्होंने आन्ध्रा एजुकेशन सोसाइटी हाई स्कूल में अपनी पढाई शुरू की और सातवी क्लास के बाद स्कूल छोड़ कर काम के लिए मुंबई आना पड़ा. मुंबई में उन्होंने पैन बेचना शुरू कर दिया. मुंबई में वह बॉलीवुड गानों पर लोगो का मनोरंजन कर पैन बेचा करते थे. उसके बाद उनके पिता प्रकाश राव जानुमाला ने उन्हें अपने साथ हिंदुस्तान यूनिलीवर की फैक्ट्री में काम पर लगवा दिया. वहां भी उन्होंने लोगो का, अपने साथियों का मनोरंजन कर दिल जीत लिया और उनके सहकर्मियों ने ही उन्हें “जॉनी लीवर” नाम दिया. जॉनी लीवर के अंदर के मिमिक्री कलाकार को प्रताप जैन और राम कुमार ने पहचाना. और उन्हें स्टेज शो पर काम करने का मौका दिया जहा से उनकी कॉमेडी का जादू चलता गया. 1982 में उन्हें मशहूर संगीतकार कल्यानजी-आनंदजी और अमिताभ बच्चन के साथ स्टेज शेयर करने का मौका मिला. इसी तरह एक स्टेज शो के दौरना सुनील दत्त ने जॉनी लीवर के टैलेंट को समझते हुए अपनी फिल्म ‘’दर्द का रिश्ता’’ में एक रोल दिया जिसके बाद उन्हें कई छोटे मोटे रोल मिलते चले गए. उस समय उन्होंने एक ऑडियो कैसेट कम्पनी के लिए भी काम किया जो ‘’हंसी के हंगामे’’ नाम का कार्यक्रम बनाते थे और ये कार्यक्रम देश ही नही बल्कि विदेशो में भी हिट रहा. अब तक Johnny Lever स्टेज और फिल्मो में कई छोटे छोटे रोल कर चुके थे लेकिन उन्होंने कोई बड़े बजट की फिल्म नही की थी. फिर उन्होंने एक कार्यक्रम में भाग लिया जहा बॉलीवुड के बड़े बड़े सितारे और निर्देशक आये हुए थे. वहा भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया और निर्देशक गुल आनंद ने उन्हें फिल्म जलवा के लिए रोल ऑफर किया. फिल्म जलवा की सफलता के बाद उन्हें खुद को औपचारिक रूप से भी एक हास्य कलाकार के रूप में स्थापित किया. उसके बाद उन्हें कई बड़ी फल्मो में काम मिलने लगा. जाहिर है पैन बेचने से लेकर एक बेस्ट कॉमेडियन बनने तक का सफर जॉनी लीवर के लिए आसान नही रहा होगा लेकिन उनकी मेहनत और उनकी कलाकरी ने आज उन्हें इस मुकाम पर पहुंचा दिया है कि वे आर्टिस्ट असोसिएशन के प्रेसिडेंट हैं और इसके अलावा वह मिमिक्री आर्टिस्ट असोसिएशन मुंबई के अध्यक्ष भी हैं। साथ ही जॉनी लीवर लगभग 190 करोड़ की सम्पति के मालिक भी है. दोस्तों जॉनी लीवर का जीवन लाखो लोगो के लिए एक प्रेरणा है जो दिखाता है की अगर आपमें टैलेंट है तो चाहे जिन्दगी में कितनी भी मुश्किलें क्यों न हो मेहनत के दम पर आप अपने सपनो को उडान दे सकते है.
कपिल देव
कपिल देव का जीवन परिचय
परिचय
कपिल देव क्रिकेट की दुनिया का एक ऐसा नाम हैं, जिनको क्रिकेट में उच्च एवं सम्मानीय दर्जा प्राप्त है. इस महान खिलाड़ी ने भारत में पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप लाने का काम किया था, जिसको उस समय किसी ने भी सपने में भी नहीं सोचा था. इन्होंने साल 1999 एवं साल 2000 के बीच 10 महीने तक भारत के कोच की भूमिका निभाई थी. हरियाणा तूफान के नाम से जाने वाले इस क्रिकेटर को क्रिकेट पिच पर कभी भी रन आउट होते हुए नहीं देखा गया था. इस खिलाड़ी ने अपनी फिटनेस पर इतना ध्यान दिया हुआ था कि सेहत की वजह से इन्हें कभी भी टेस्ट मैच से बाहर नहीं किया गया. कपिल देव दाएं हाथ के बल्लेबाज होने के साथ साथ दाएं हाथ के तेज गेंदबाज भी थे, जो तेजी से रन बनाना पसंद करते थे.
कपिल देव का जन्म एवं शिक्षा
ये महान खिलाड़ी पंजाब के एक बहुत प्रसिद्ध शहर चंडीगढ़ में पैदा हुए थे. इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा डी. ए. वी. स्कूल से प्रारम्भ की और स्नातक की पढ़ाई के लिए सेंट एडवर्ड कॉलेज में गए. खेल में रूचि एवं प्रतिभा को देखकर इनको देश प्रेम आजाद के पास क्रिकेट सीखने के लिए भेजा गया.
कपिल देव का परिवार
जब भारत और पाकिस्तान को अलग किया जा रहा था, उस समय इनका परिवार रावलपिंडी (पाकिस्तान) से फाजिल्का (भारत) में आकर रहने लगा था. यहीं पर इनके पिता रामलाल निखंज ने लकड़ी का व्यवसाय किया. पाकपट्टन पाकिस्तान से सम्बन्ध रखने वालीं इनकी माता राजकुमारी एक ग्रहणी थीं. ये कुल मिलाकर सात भाई-बहन थे जिनमें से चार बहनें, तीन भाई थे, जबकि ये छठे स्थान पर थे. कुछ समय बाद इनके माता-पिता ने पंजाब की राजधानी में रहना उचित समझा. इनका विवाह सन् 1980 में रोमी भाटिया नाम की एक स्त्री से हुआ था. इसके 17 साल बाद इनके यहां एक लड़की का जन्म हुआ, जिसका नाम अमिया देव रखा गया था.
कपिल देव का क्रिकेट करियर
कपिल देव का करियर सन् 1975 से प्रारम्भ हुआ था. जब इन्होंने हरियाणा के लिए पंजाब के विरुद्ध मैच खेला था, जिसमें कपिल देव ने 6 विकेट के साथ हरियाणा को शानदार जीत दिलाकर, पंजाब को 63 रन पर ही ढेर कर दिया था. सन् 1976 -77 में जम्मू कश्मीर के विरुद्ध खेले गए एक मैच में इन्होंने 08 विकेट लिए तथा 36 रन बनाये और उन्होंने उसी वर्ष बंगाल के विरुद्ध 07 विकेट तथा 20 रन बनाये थे. इन दोनों मैचों में इनकी प्रतिभा सबको दिखाई देने लगी. इसके बाद इन्होंने सन् 1978 में टेस्ट मैच खेलना प्रारम्भ कर दिया था. इन्होंने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच पाकिस्तान के खिलाफ खेला था. इस मैच में कपिल देव ने सिर्फ 13 रन बनाए थे, हालांकि 1 विकेट भी लिया था. कपिल देव ने बेहतरीन बल्लेबाजी से सन् 1979 -1980 में उन्होंने दिल्ली के खिलाफ 193 रन की नाबाद पारी खेलकर हरियाणा को शानदार जीत दिलायी. ये उनके करियर का पहला शतक था. जिसके बाद साबित हो गया की कपिल देव सिर्फ गेंदबाजी से ही नहीं बल्कि बल्लेबाजी से भी भारत को जीत दिला सकते हैं. इनकी दोनों प्रतिभाओं की बदौलत इनको अभी तक का सबसे बेहतरीन आलराउंडर माना जाता है. 17 अक्टूबर सन् 1979 में वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने 124 में 126 रन बनाये थे. इसको इनकी एक यादगार पारी के रूप में गिना जाता है.
कप्तानी
उस समय सन् 1982-83 में भारत श्रीलंका से मैच खेलने गया हुआ था. लेकिन आधिकारिक तौर पर इन्हें वेस्टइंडीज में हो रही एकदिवसीय मैचों की श्रृंखला में कप्तान बनने का मौका मिला. उस समय वेस्टइंडीज टीम का काफी बोलबाला था, मतलब उस समय वेस्टइंडीज टीम को हराना नामुमकिन सा था. और सुनील गावस्कर की शानदार पारी के सहारे वेस्टइंडीज को भारत ने एक मैच में हरा दिया था. उस मैच में सुनील गावस्कर जो इनके साथी खिलाड़ी थे उन्होंने 90 रन बनाये थे. वहीं कपिल देव ने 72 रन बनाने के साथ-साथ 2 विकेट भी चटकाए थे. इसी जीत की बदौलत भारत को आने वाले वर्ल्ड कप में वेस्टइंडीज को हरा पाने का विश्वास बढ़ गया. जो कि विश्व कप हासिल करने में दिखाई दिया था.
1983 का वर्ल्ड कप
उसके बाद 1983 के वर्ल्ड कप का समय आया. हालांकि पिछले विश्व कप में भारतीय टीम के प्रदर्शन को देखने के बाद किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि भारत विश्व कप जीत सकता है. जब कपिल देव ने वर्ल्ड कप में खेलना शुरू किया था तब इनका औसत: 24.94 सामान्य बॉलर की तरह ही था. भारत को सेमीफइनल में पहुंचने के लिए ज़िम्बाब्वे से मैच जीतना आवश्यक हो गया था. उस मैच के दौरान भारत लगभग हार की ओर बढ़ ही रहा था कि कपिल देव ने अपनी शानदार बल्लेबाजी की बदौलत मैच संभाल लिया. इसी मैच के दौरान इन्होंने 175 रन बनाकर ज़िम्बाब्बे की गेंदबाजी को धोकर रख दिया, क्योंकि इन्होंने सिर्फ 138 गेंदों में ये रन बनाएं थे. जिसमें इन्होंने 22 बॉउंड्रीज, 16 चौके और 6 छक्कों की मदद से लगाईं थीं. 9 वें विकेट के लिए 126 रन की सबसे बड़ी साझेदारी किरमानी (22 रन) एवं कपिल देव के बीच हुई थी, जिसको 27 सालों तक कोई नहीं तोडा पाया था. इतना ही नहीं इसी मैच में कपिल देव ने शानदार गेंदबाजी करते हुए ज़िम्बाब्बे के 5 विकेट भी लिए थे. इसके बाद कपिल देव को मर्सिडीज कार पुरस्कार के रूप में मिली, यही पारी इनके जीवन की सबसे यादगार एवं महत्वपूर्ण पारी थी. जिसने इनको सबकी नजरों में महान बनाया. इस मैच की बदौलत भारत का 1983 के विश्व कप में जीत के लिए अपना सफर तय कर पाने का रास्ता मिला था. 1983 के विश्व कप के दौरान बीबीसी की हड़ताल की वजह से इस मैच का टेलीकास्ट नहीं हो सका था और इस मैच का लुफ्त क्रिकेट प्रेमी नहीं उठा सके थे. भारत को 1983 विश्व कप अपने नाम करने के लिए वेस्टइंडीज को फाइनल में हराना पड़ा था. भारत ने कपिल देव की कप्तानी में 1983 में इंग्लैंड में होने वाले इस वर्ल्ड कप को जीतकर इतिहास रच दिया. कहा जाता है इस शानदार प्रदर्शन की बदौलत भारत भी क्रिकेट की दुनिया का सितारा बनकर सामने आया. इस समय भारत को एक अलग स्तर पर देखा जाता है. इतना ही नहीं भारत ने अभी तक सभी तरह की ट्रॉफी जीत रखीं है. कपिल देव के करियर का बुरा दौर उसके बाद 1984 में वेस्टइंडीज के साथ टेस्ट मैचों के साथ एकदिवसीय मैंचों की श्रृंखला का आयोजन किया गया. जिसमें भारत की बुरी हार हुई. वहीं ये कपिल देव के करियर का सबसे बुरा वक्त था, जिससे चयनकर्ताओं ने इनको कप्तानी के पद से हटाने का फैसला लिया और फिर से गावस्कर को कप्तान बना दिया गया. इसके बाद कपिल देव 1987 में कप्तान बनाया गया, जिसमें भारत सेमीफाइनल तक पहुंचा था. लेकिन भारत इंग्लैंड से हारकर विश्व कप जीतने में असफल रहा और सबने इसके लिए देव पर ही इल्जाम लगा दिया. एक बार फिर से इनसे कप्तानी छीनकर गावस्कर को दे दी गई, यही इनकी कप्तानी का अंतिम सफर था. जिसके बाद इनको कभी भी कप्तान बनने का मौका नहीं मिला. हालांकि 1989 में उपकप्तान जरूर बनाया गया था.
कपिल देव के कोच बनने का सफर
बीसीसीआई ने इन्हें भारत का कोच नियुक्त किया लेकिन कुछ विवाद के चलते इन्होंने केवल 10 महीने में ही इस्तीफा दे दिया. कहा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया से भारत के 2-0 से श्रृंखला हारने के बाद इन पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया गया था. जिसके चलते इन्होंने इन सब बेबुनियादी आरोपों से बचने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
कपिल देव पुरस्कार एवं उपलब्धियां
सन् 1979-80 के सत्र में क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने की वजह से इन्हें भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला अर्जुन पुरस्कार दिया गया. ये पुरस्कार सरकार उन खिलाड़ी को देती हैं जिन्होंने किसी भी खेल के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया हो.
उसके 1982 के दौरान भारत ने कपिल देव की प्रतिभा और लगन को देखकर पद्म श्री का पुरस्कार भी इन्हें दिया. इतना ही नहीं इनको एक साल बाद यानी कि सन् 1983 विज्डन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का सम्मान दिया गया, जिसका आधार इनकी विश्व-कप में जबरदस्त प्रदर्शन को माना जाता है.
इन्होंने 1994 में रिचर्ड हेडली का टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट हासिल करने का रिकार्ड तोड़ दिया था. इतना ही नहीं टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट के साथ-साथ टेस्ट क्रिकेट में अपने 4000 रन पूरे करने वाले अभी तक के विश्व के उच्चतम खिलाड़ी हैं.
सन् 1991 में कपिल देव के योगदान एवं लगन को सम्मानित करने के लिए पद्म भूषण जैसा उच्चतम पुरस्कार दिया गया. इसके बाद सन् 2002 में सदी के विज्डन भारतीय क्रिकेटर के सम्मान को देकर इनका दर्जा क्रिकेट की दुनिया में और बड़ा दिया गया.
सन् 2010 आईसीसी क्रिकेट हॉल ऑफ फेम पुरस्कार देकर इनकी प्रतिभा को सम्मानीय दर्जा दिया गया. इसके तीन साल बाद सन् 2013 एनडीटीवी द्वारा भारत में 25 सबसे महान वैश्विक जीवित महापुरूष का खिताब दिया गया.
भारतीय सेना से जुड़ने के लिए कपिल देव ने सन् 2008 भारतीय क्षेत्रीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल का पद ग्रहण कर लिया. भारतीय सेना का अधिक सम्मान करने की वजह से इन्होंने ऐसा किया था.
कपिल देव के जीवन पर आधारित फिल्म
भारतीय सिनेमा के मशहूर निर्देशक कबीर खान ने कपिल देव की बायोपिक बनाने का काम शुरू कर दिया है. जब कपिल देव से पूछा गया था कि आपका किरदार किस अभिनेता को दिया जाना चाहिए, तो उन्होंने रणवीर सिंह का नाम लिया था. फैंटम प्रोडक्शन एवं अनुराग बासु के साथ अन्य लोगों ने भी इस फिल्म पर अपना पैसा लगाया है. जिसमें रणवीर सिंह को कपिल देव की भूमिका में अभिनय करते हुए देखा जाएगा.
कपिल देव के जीवन के रोचक तथ्य
कपिल देव ने व्यापार करने के लिए कैप्टन्स एलेवेन नाम से सन् 2006 में दो रेस्टोरेंट खोले जिनमें एक चंडीगढ़ में हैं और दूसरा पटना में मौजूद है, जिनको ये खुद संभालते हैं.
कपिल देव एक ऐसे खिलाडी हैं, जिन्होंने दो से अधिक फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाई हैं. जिनके नाम ‘इकबाल’ दूसरी ‘मुझसे शादी करोगी’ एवं ‘ये दिललगी है’. इतना ही नहीं अभी हाल में कपिल देव के ऊपर एक फिल्म बनने की खबरें भी आ रहीं हैं.
कपिल देव की रूचि किताबें लिखने में भी बहुत है, इसलिए इन्होंने अभी तक तीन आत्मकथाएं लिखी है, जिनके नाम ‘गोड्स डिक्री’, ‘क्रिकेट माय स्टाइल’ एवं ‘स्ट्रैट फ्रॉम माय हार्ट’ शामिल हैं.
Conclusion:-
Never Forever, Give Up..!!!
शाहरुख खान
शाहरुख खान की सफलता की कहानी
शाहरुख खान को कौन नहीं जानता, वे फिल्मी दुनिया के सबसे चमकते सितारों में से एक है। शाहरुख खान बॉलीवुड के सर्वश्रेष्ठ एवं सफल अभिनेता हैं जिन्होंने अपने शानदार अभिनय के अंदाज से करोड़ों लोगों के दिलों में अपनी एक अलग जगह बनाई है। शाहरुख खान जो SRKके नाम से भी जाने जाते है। एक भारतीय फिल्म अभिनेता, निर्देशक और टेलीविज़न कलाकार भी है। जिन्हें मीडिया में “बॉलीवुड का बादशाह”, “किंग ऑफ़ बॉलीवुड” और “किंग खान” भी कहा जाता है। वे एक्शन, रोमांस, ड्रामा, कॉमेडी सभी फिल्में कर चुके हैं। उनका नाम सबसे अमीर अभिनेताओं में भी गिना जाता है। शाहरुख़ खान अब तक 80 से भी ज्यादा बॉलीवुड फिल्म कर चुके है। लोस एंजेल्स के टाइम्स पत्रिका के अनुसार वे “दुनिया के सबसे बड़े मूवी स्टार” के नाम से भी जाने जाते है। जिनके चाहते भारत के साथ-साथ पुरे एशिया में भी फैले हुए है।
Childhood
इस प्रेरणादायक कहानी की शुरुआत 2 November 1965 से होती हैं। दिल्ली के एक मुस्लीम परिवार में शाहरुख खान का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम मीर ताज मोहम्मद था जो एक स्वतंत्रता सेनान्नी थे और उनकी माँ का नाम लतीफ फातिमा था। वैसे तो भारत पाकिस्तान के अलग होने से पहले उनका परिवार पेशावर में रहता था लेकिन 1948 में जब विभाजन हुआ तो उनके पिता अपने परिवार के साथ दिल्ली में आकर बस गये। शाहरुख का बचपन दिल्ली के राजेंद्र इलाके में बिता, जहाँ उनका परिवार एक किराये के घर में रहती थी। शाहरुख खान के पिता एक रेस्टोरेंट चलाया करते थे। शाहरुख खान ने अपनी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के St. Columba School से की और पढ़ाई में अच्छे होने की वजह से शाहरुख ने स्कूल का सबसे बड़ा अवार्ड Sword of Honour भी जीता था। लेकिन सिर्फ 16 साल की उम्र में shahrukh khan के जीवन में एक दुखद पल जब आया जब उनके पिता ने दुनिया को अलविदा कहा, हालाँकि इतनी कम उम्र में पिता को खोने के बाद भी शाहरुख के अन्दर परेशानीयों से लड़ने का जज्बा कभी भी खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने 1950 में हंसराज कॉलेज में एडमिशन ले लिया, जहाँ पर उन्होंने एक ग्रुप ज्वाइन किया और उस ग्रुप में रहते हुए उन्होंने बैरी जॉन के अंतर्गत एक्टिंग सीखी। इसके बाद शाहरुख खान Mass Communications में मास्टर डिग्री लेने का फैसला लिया लेकिन एक्टिंग के लिए पढ़ाई अधूरी छोड़ दी और इसी बीच उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में भी एडमिशन लिया। जहाँ पर उन्होंने एक्टिंग के रोल्स सीखें। Shahrukh khan का पहला रोल टीवी सीरीज दिल दरिया में था लेकिन कुछ production परेशानीयों के चलते ये टीवी सीरिज एक साल के बाद रिलीज हुआ और इसी बीच शाहरुख खान ने फौजी नाम के एक सीरीयल में काम किया। इस तरह से उनकी टेलीविजन में प्रथम एंट्री फौजी नाम के एक टीवी सीरियल से हुई, उसके बार उन्होंने कई और टीवी सीरीज जैसे सर्कस, Wagle ki duniya, Idiot और उम्मीद में काम किया। उस समय शाहरुख खान की एक्टिंग को देखकर लोगों ने उनकी तुलना दिलीपकुमार से करनी शुरू कर दी थी और फिर 1991 में उन्होंने अपनी प्रेमिका गौरी के साथ शादी कर ली। गौरी और शाहरुख के बीच पिछले कई सालों से प्रेम संबंध थे लेकिन बहुत सारी रुकावट और परेशानीयों का सामना करने का बाद ये दोनों एक हो पाये थे। शाहरुख खान का अभी एक्टिंग करियर शुरू ही हुआ था की उन्हें एक और बड़ा सदमा लगा, जब 1991 में उन्होंने अपनी माँ को खो दिया और इस दुख को भुलाने के लिए वे मुंबई चले गये और अपने आप को पूरी तरह से एक्टिंग में झोंक दिया।
Career
मुंबई जाकर उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया और उनकी एक्टिंग को देखते हुये उन्हें कई सारी फिल्मों में काम मिल गया। जैसे की सबसे पहले उन्हें हेमा मालिनी डायरेक्शन में "दिल आशना है" फिल्म में साइन किया गया। ये हेमा मालिनी का एक डायरेक्टर के तौर पर एक डेब्यू फिल्म था लेकिन 1992 में रिलीज हुई "Deewana" मूवी शाहरुख खान की डेब्यू फिल्म बनी। इस मूवी में उस समय के स्टार एक्टर ऋषि कपूर ने भी काम किया था। दीवाना पोस्ट ऑफिस पर एक हिट फिल्म साबित हुई और इसने शाहरुख खान के बॉलीवुड करियर को एक अच्छी शुरुआत दी। इस मूवी के लिए उन्हें फिल्मफेयर का "Best Male Debut Award" से नवाजा गया था। 1992 में उनकी इसके अलावा तीन और भी फ़िल्में आई जैसे चमत्कार, दिल आशना है और राजू बन गया जेंटलमैन। 1993 में शाहरुख खान ने अपनी लीग से हटकर रोल किये और इसी साल उनकी 2 फिल्म डर और बाजीगर आई जिनमें वे हीरो की जगह खलनायक की भूमिका निभाते नजर आये और लोगों को उनकी एक्टिंग खूब पसंद आई। बाजीगर में उनके अलग किरदार और शानदार एक्टिंग की वजह से उनको फिल्मफेयर अवार्ड फॉर दे बेस्ट एक्टर मिला और इस तरह से बॉलीवुड़ में कदम रखकर सिर्फ 2 साल में ही शाहरुख खान ने अपनी एक्टिंग के जरिये पूरी दुनिया में लोहा मनवाया। आगे भी शाहरुख खान कई फिल्मों में खलनायक का रोल निभाते नजर आये। कोई भी अपनी शुरुआत समय में खलनायक वाले किरदार करने से बचता है पर शाहरुख खान उनके विपरीत काम कर रहे थे और वो हर मुश्किल से मुश्किल रोल को करके लोगों के बीच मशहूर होते जा रहे थे। 1995 में शाहरुख खान ने ६ से ७ फिल्मों में काम किया जिनमें से उनकी सफल फिल्म "करण अर्जुन" और "दिल वाले दुल्हनियाँ ले जायेंगें" साबित हुई और यही वो मूवी थी जिसके बाद शाहरुख खान के एक रोमांटिक छवि बन गई। इस फिल्म ने कूल १० filmfare awards जीते थे जिसमें शाहरुख खान को दूसरी बाद बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला। जिसके बाद शाहरुख ने अलग - अलग फिल्मों में अहम भूमिका निभाई। 1998 में करण जोहर के डायरेक्शन में आई फिल्म "Kabhi Khushi Kabhi Gham" में एक्टिंग के लिए उन्हें फिर से फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला और इस तरह से शाहरुख खान ने अभी तक कूल 14 फिल्मफेयर अवार्ड जीते हैं। आगे भी शाहरुख खान बहुत सारी फिल्मों में काम करते रहे जिनमें से कुछ सुपरहिट रही तो कुछ फ्लॉप भी रही। 1999 में शाहरुख खान ने जूही चावला के साथ एक प्रोडक्शन हाउस खोला जिसकी बदौलत वो एक प्रोडूसर भी बने। उनके प्रोडक्शन द्वारा बनाई गई पहली फिल्म "Phir Bhi Dil Hai Hindustani" बॉक्स ऑफिस पर फेलियर साबित हुई। इसके बाद 2001 में शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस की दूसरी फिल्म "Asoka" भी बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पीटी और बतौर एक्टर काफी सफल रहे शाहरुख खान एक प्रोडूसर के तौर पर कमाल करने में नाकाम रहे थे। तभी 2001 December में उनको "Shakti: The Power" फिल्म की सूटिंग जके दौरान पीठ में चौट लग गई जिसकी वजह से उनकी पीठ में काफी दर्द रहने लगा था जब इसका इलाज भारत में ना हो सका तो उन्होंने लंदन जाकर इलाज करवाया और फिर भारत वापसी के बाद उन्होंने कम से कम दबाव में काम करने का फैसला लिया। हालाँकि इसी दौर में "Mohabbatein, कभी ख़ुशी कभी गम, और Devdas जैसी उन्होंने लगातार कई सारी हिट फ़िल्में की और फिर आगे भी उन्होंने Swades, Veer-Zaara, Paheli, Don, Chak De India, My Name Is Khan, Ra. one, Chennai Express, Happy New Year और Raees की तरह बहुत सारी हिट मूवीज में काम किया और अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया। इतना ही नहीं शाहरुख खान एक अच्छे एक्टर होने के साथ - साथ एक बिजनेसमैन भी है वे Red Chillies Entertainment production कंपनी के मालिक है।
Conclusion
साथ ही वे जूही चावला और उनके पति के साथ पार्टनरशिप में आईपीएल की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) के मालिक है और फ़िलहाल शाहरुख की कूल संपति लगभग 5 हजार करोड़ के आसपास है जिस वजह से वे दुनिया के सबसे अमीर एक्टर्स में शुमार किये जाते हैं। उम्मीद करता हूँ आपको बॉलीवुड़ के किंग शाहरुख खान (Shahrukh Khan) की सफलता की कहानी पसंद आई होगी और आपको इससे बहुत प्रेरणा मिली होगी अगर हाँ तो इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करें।
Conclusion:-
Never Forever, Give Up..!!!
मलाला यूसुफजई
मलाला यूसुफजई
जीवन परिचय
मलाला यूसुफजई एक ऐसी लड़की का नाम है, जिसने पाकिस्तान जैसे देश में लड़कियों की शिक्षा को उसका हक बताकर लड़ाई की शुरुआत की। ना सिर्फ लड़ाई बल्कि तालिबानी आतंकवादियों का निशाना बनते हुए सिर पर गोली भी खाई। अब मलाला पूरे दुनियाभर में सबसे कम उम्र में शांति का नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाली व्यक्तित्व है।
कौन हैं मलाला यूसुफजई
12 जुलाई, 1997 को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के स्वात में जन्मी मलाला के संघर्ष की कहानी उस वक्त शुरु होती है, जब वो आठवीं में पढ़ती थी। 2007 से 2009 तक तालिबान ने स्वात घाटी पर कब्जा कर लिया था। तालिबानियों के डर से घाटी के लोगों ने लड़कियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया और 400 से ज्यादा स्कूल बंद हो गए। जिसमें मलाला का स्कूल भी शामिल था।
पढ़ने में तेज मलाला ने ने अपने पिता जियाउद्दीन यूसुफजई से दूसरी जगह एडमिशन कराने की गुजारिश की। इसके बाद मलाला ने पिता उसे पेशावर लेकर गए। यहीं मलाला ने सिर्फ 11 साल की उम्र में नेशनल मीडिया के सामने एक मशहूर भाषण दिया जिसका शीर्षक था हाउ डेयर द तालिबान टेक अवे माय बेसिक राइट टू एजुकेशन? इस घटना ने मलाला की जिंदगी बदल कर रख दी।
'गुल मकई' बन उजागर की तालिबान की करतूत
तालिबान ने मलाला और उसकी सहेलियों का बचपना और स्कूल छीन लिया था। मलाला को ये बात इतनी चुभ गई कि उन्होंने 2009 से दूसरे नाम 'गुल मकई' से बीबीसी के लिए एक डायरी लिखी। जिसमें उन्होंने स्वात घाटी में तालिबान के कुकृत्यों की परत दर परत खोल कर रख दी। इसमें उसने जिक्र किया था कि टीवी देखने पर रोक के चलते वह अपना पसंदीदा भारतीय सीरियल राजा की आएगी बारात नहीं देख पाती थी। इससे तालिबानी बौखला उठे। कुछ दिनों बाद दिसंबर 2009 में मलाला के पिता ने ये खुलासा कर दिया कि मलाला ही 'गुल मकई' हैं।
जब आतंकियों ने पूछा...कौन है मलाला
अपनी डायरी से मलाला ने तालिबानियों ने नाक में दम कर दिया। बौखलाए तालिबानियों ने 9 अक्टूबर, 2012 के दिन आतंकियों ने मलाला की स्कूल बस पर कब्जा कर लिया। बस में चढ़ते ही आतंकियों ने पूछना शुरु किया कि मलाला कौन है? सभी बच्चे चुप होकर मलाला की ओर देखने लगे। सभी आतंकी ने मलाला के सिर पर एक गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल मलाला को इलाज के लिए ब्रिटेन ले जाया गया। यहां उन्हें क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में भर्ती कराया गया। पूरी दुनिया में मलाला के स्वस्थ्य होने की प्रार्थना की गई और आखिरकार मलाला वहां से स्वस्थ होकर अपने देश लौट गईं।
पूरी दुनिया ने दिया सम्मान
मलाला जब स्वस्थ होकर स्वदेश पहुंची तबतक उन्हें पूरी दुनिया जानने लगी थी। उन्हें कई तरह से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 19 दिसम्बर 2011 को पाकिस्तानी सरकार द्वारा 'पाकिस्तान का पहला युवाओं के लिए राष्ट्रीय शांति पुरस्कार मलाला युसुफजई को मिला। नीदरलैंड के किड्स राइट्स संगठन ने भी अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। 2013 में उन्हें वूमन ऑफ द ईयर अवार्ड से भी नवाजा गया था। इसके अलावा भी कई देशों ने मलाला को सम्मानित किया।
यूएन ने मलाला के जन्मदिन को बनाया मलाला दिवस।
लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ने वाली मलाला के नाम पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके 16वें जन्मदिन पर 12 जुलाई को मलाला दिवस घोषित कर दिया। मलाला ने वर्ष 2013 में एक किताब 'आय एम मलाला' भी लिखी थी।
2014 में मिला दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान
10 दिसंबर 2014 के दिन मलाला को दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नॉर्वे में आयोजित इस कार्यक्रम में भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रुप से नोबले पुरस्कार प्रदान किया गया। इस तरह मलाला सबसे कम 17 वर्ष की उम्र में नोबेल प्राप्त करने वाली विजेता बन गईं।
Conclusion:-
Never Forever, Give Up..!!!
अब्राहम लिंकन
अब्राहम थॉमस लिंकन
Who is अब्राहम लिंकन?
अमेरिका के 16 वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को केंटकी (अमेरिका) में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम थॉमस लिंकन था उनके पिता एक किसान थे। वह एक साल तक स्कूल भी नहीं गए लेकिन खुद ही पढ़ना लिखना सिखा और वकील बने। एक सफल वकील बनने से पहले उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियां की और धीरे – धीरे राजनीति की ओर मुड़े। उस समय देश में गुलामी की प्रथा की समस्या चल रही थी। गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे, और वह अफ्रीका से काले लोगों को अपने खेत में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था। उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के खिलाफ थे और इसे समाप्त करना चाहते हैं अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है। इस मुश्किल समय में, अब्राहम लिंकन 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे।
वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे। दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के खिलाफ थे। इससे देश की एकता में खतरे आ सकता है। दक्षिणी राज्य एक नए देश बनाने की तैयार कर रहा था। परन्तु अब्राहम लिंकन चाहता था कि सभी राज्यों एकजुट हो कर रहे। अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे। अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक नागरिक युद्ध छिड़ गया। उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, “एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नहीं रह सकता” वह युद्ध जीत गए और देश एकजुट रहा। 4 मार्च 1865 को अब्राहम लिंकन इनका दुसरी बार शपथ समारोह हुआ। शपथ समारोह होने के बाद लिंकन इन्होंने किया हुआ भाषण बहुत मशहूर हुआ। उस भाषण से बहुत लोगों के आँख में आंसू आ गये। वह किसी के भी खिलाफ नहीं थे और चाहते थे कि सब लोग शांति से जीवन बिताये।
1862 में लिंकन की घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगें। इसी से ही लिंकन लोगों के बीच लोकप्रिय रहा। अपनी जिंदगी में कई बार असफलताओं का सामना करने वाले अब्राहम लिंकन आख़िरकार अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति बने थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने देश और समाज की भलाई के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा। लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था “जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ”। यही मेंरा धर्म है”।
मृत्यु:-
14 अप्रैल 1865 को वॉशिंग्टन के एक नाट्यशाला में नाटक देख रहे थे तभी ज़ॉन विल्किज बुथ नाम के युवक ने उनको गोली मारी। इस घटना के बाद दुसरे दिन मतलब 15 अप्रैल के सुबह अब्राहम लिंकन की मौत हुई।
एक बार लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई। मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला। सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया। सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा। तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो।”
Lessons to take:-
"भीड़ हमेशा उस रास्ते पर चलती है जो रास्ता आसान लगता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की भीड़ हमेशा सही रास्ते पर चलती है| अपने रास्ते खुद चुनिए क्योंकि आपको आपसे बेहतर और कोई नहीं जानता|"
जेफ बेजोस
जेफ बेजोस
Who Is जेफ बेजोस ?
अमेरिकी उद्यमी जेफ बेजोस Amazon.com के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी और ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के मालिक हैं। उनके सफल व्यापारिक उपक्रमों ने उन्हें दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बना दिया है।
उनकी Net Worth 125+ Billion Dollar है| जबसे अमेजन कंपनी अस्तित्व आई है पूरी दुनिया का Shopping करने का तरीका ही बदल दिया। Amazon कंपनी अमेरिका की है और इसका Head Office भी USA में ही है तो दोस्तों चलिए Amazon की Success Story को शरू से जानते हैं
Early Life
उद्यमी और ई-कॉमर्स की दुनीया में अपनी धाक जमा चुके जेफ बेजोस का जन्म 1964 में न्यू मैक्सिको में हुआ था। बेजोस को कंप्यूटर से शुरुआती लगाव था और उन्होंने Princeton university में कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद उन्होंने वॉल स्ट्रीट पर काम किया और 1990 में वे निवेश फर्म D.E.Shaw में सबसे कम उम्र के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बने। चार साल बाद, उन्होंने Amazon.com खोलने के लिए अपनी आकर्षक नौकरी छोड़ दी, एक ऑनलाइन किताबों की दुकान शुरू की जो इंटरनेट की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में से एक बन गई।
2013 में बेजोस ने 250 मिलियन डॉलर के सौदे में The Washington Post को खरीद लिया। उनके सफल व्यापारिक उपक्रमों ने उन्हें दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बना दिया है।
जेफ बेजोस का जन्म 12 जनवरी, 1964 को अल्बुकर्क, न्यू मैक्सिको में एक किशोर मां, जैकलीन गिज जोर्गेनसेन और उनके जैविक पिता टेड जोर्गेनसेन के घर हुआ था। जॉर्गेन्स की शादी एक साल से कम समय में हुई थी, और जब बेजोस 4 साल के थे, तो उनकी मां ने क्यूबा के अप्रवासी माइक बेजोस से दोबारा शादी कर ली।
एक बच्चे के रूप में, जेफ बेजोस ने इस बात में एक प्रारंभिक रुचि दिखाई कि चीजें कैसे काम करती हैं, अपने माता-पिता के गैरेज को प्रयोगशाला में बदल दिया। वह एक किशोर के रूप में अपने परिवार के साथ मियामी चले गए, जहां उन्होंने कंप्यूटर के लिए एक प्रेम विकसित किया और अपने हाई स्कूल के वेलेडिक्टोरियन स्नातक किया। यह हाई स्कूल के दौरान था कि उन्होंने अपना पहला व्यवसाय शुरू किया, ड्रीम इंस्टीट्यूट, चौथे, पांचवें और छठे ग्रेडर के लिए एक शैक्षिक ग्रीष्मकालीन शिविर।
बेजोस ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में कंप्यूटर में अपनी रुचि पर कार्य किया, जहां उन्होंने 1986 में कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, उन्होंने वॉल स्ट्रीट पर कई फर्मों में काम पाया, जिसमें फिटेल, बैंकर्स ट्रस्ट और निवेश फर्म डी.ई. शॉ आदि थे।
Starting of Amazon.com
बेजोस ने अपने गैरेज में अपनी नवेली कंपनी के लिए कार्यालय स्थापित किया, जहां कुछ कर्मचारियों के साथ, उन्होंने सॉफ्टवेयर विकसित करना शुरू किया। उन्होंने दो बेडरूम वाले घर में ऑपरेशनों का विस्तार किया, जो तीन सन माइक्रोस्ट्रेशन से सुसज्जित था, और अंततः वहीँ एक परीक्षण स्थल विकसित किया।
साइट को बीटा परीक्षण के लिए 300 दोस्तों को आमंत्रित करने के बाद, बेजोस ने 16 जुलाई, 1995 को दक्षिण अमेरिकी नदी के नाम पर Amazon.com का नाम चुना।
कंपनी की प्रारंभिक सफलता काफी अच्छी थी। बिना किसी प्रेस प्रचार के, Amazon.com ने 30 दिनों के भीतर संयुक्त राज्य अमेरिका और 45 विदेशी देशों में किताबें बेच दीं। दो महीनों में, बिक्री $ 20,000 प्रति सप्ताह तक पहुंच गई, यह कम्पनी उनकी अपेक्षाओं से की तुलना में काफी तेजी से बढ़ रहा था।
Amazon.com 1997 में सार्वजनिक हुआ, कई बाजार विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया कि क्या पारंपरिक खुदरा विक्रेताओं ने अपने ई-कॉमर्स साइटों को लॉन्च किया है या नहीं। दो साल बाद, स्टार्ट-अप न केवल बना रहा, बल्कि प्रतियोगियों से आगे निकल कर ई-कॉमर्स लीडर बन गया।
बेजोस ने 1998 में सीडी और वीडियो की बिक्री के साथ अमेज़ॅन में विविधता जारी रखी, और बाद में कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौने और प्रमुख खुदरा साझेदारी का सामान भी अपनी इस वेबसाइट पर बेचना शुरू किया। 90 के दशक की शुरुआत में कई डॉट.कॉम धमाकेदार रहे, लेकिन अमेज़न की बिक्री में तेजी आई, जो 1995 में 510,000 डॉलर से उछलकर 2011 में 17 बिलियन डॉलर से अधिक हो गई।
2006 में, Amazon.com ने अपनी वीडियो-ऑन-डिमांड सेवा शुरू की; शुरुआत में यह TiVo पर Amazon Unbox के रूप में जाना जाता था, अंततः इसे Amazon Instant वीडियो के रूप में रीब्रांड किया गया।
Kindle E-Reader
2007 में, कंपनी ने एक हैंड हेल्ड डिजिटल बुक रीडर किंडल को जारी किया, जिसने उपयोगकर्ताओं को अपनी पुस्तक चयनों को खरीदने, डाउनलोड करने, पढ़ने और संग्रहीत करने में सक्षम बनाया।
बेजोस ने 2011 में किंडल फायर के अनावरण के साथ टैबलेट मार्केटप्लेस में अमेज़ॅन में प्रवेश किया। अगले सितंबर में, उन्होंने नए किंडल फायर एचडी की घोषणा की, जो कंपनी की अगली पीढ़ी का टैबलेट है जो ऐप्पल के आईपैड को अपने पैसे के लिए चलाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
The Washington Post
बेजोस ने 5 अगस्त 2013 को दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने अपनी मूल कंपनी द वाशिंगटन पोस्ट कंपनी से जुड़े द वाशिंगटन पोस्ट और अन्य प्रकाशनों को $ 250 मिलियन में खरीदा। इस सौदे ने ग्राहम परिवार द्वारा द पोस्ट कंपनी पर चार पीढ़ी के शासनकाल के अंत को चिह्नित किया, जिसमें कंपनी के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डोनाल्ड ई. ग्राहम और उनकी भतीजी, पोस्ट प्रकाशक केथरीन ग्राहम शामिल थे।
Amazon Drones
दिसंबर 2013 की शुरुआत में, बेजोस ने सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने अमेज़ॅन द्वारा एक नई, प्रयोगात्मक पहल का खुलासा किया, जिसे “अमेज़ॅन प्राइम एयर” कहा गया, ग्राहकों को डिलीवरी सेवाएं प्रदान करने के लिए ड्रोन का उपयोग किया।
बेजोस के अनुसार, ये ड्रोन पांच पाउंड तक वजन वाली वस्तुओं को ले जाने में सक्षम हैं, और कंपनी के वितरण केंद्र से 10 मील की दूरी के भीतर यात्रा करने में सक्षम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्राइम एयर चार या पांच साल के भीतर वास्तविकता बन सकती है।
जब कंपनी ने 2014 में फायर फोन लॉन्च किया, तो बेजोस ने अमेज़ॅन के कुछ बड़े मिसयूज़ में से एक का निरीक्षण किया; हालांकि इसकी काफी आलोचना की गई, जिसकी वजह से इसे अगले वर्ष बंद कर दिया गया।
Blue Origin
2000 में, बेजोस ने ब्लू ओरिजिन की स्थापना की, जो एक एयरोस्पेस कंपनी है, जो ग्राहकों को भुगतान करने के लिए इसे सुलभ बनाने के लिए अंतरिक्ष यात्रा की लागत को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करती है।
डेढ़ दशक तक, कंपनी ने चुपचाप काम किया। फिर, 2016 में, बेजोस ने पत्रकारों को केंट, वाशिंगटन से मुख्यालय, सिएटल के दक्षिण में जाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने मनुष्यों की दृष्टि का न केवल दौरा किया, बल्कि अंततः अंतरिक्ष का उपनिवेशण किया। 2017 में, बेजोस ने ब्लू ओरिजिन को फंड करने के लिए सालाना अमेजन स्टॉक में लगभग 1 बिलियन डॉलर बेचने का वादा किया था।
दो साल बाद, उन्होंने ब्लू ओरिजिन मून लैंडर का खुलासा किया और कहा कि कंपनी अपने सबऑर्बिटल न्यू शेपर्ड रॉकेट की परीक्षण उड़ानों का संचालन कर रही है, जो पर्यटकों को कुछ मिनटों के लिए अंतरिक्ष में ले जाएगा।
“हम अंतरिक्ष के लिए एक सड़क बनाने जा रहे हैं। और फिर आश्चर्यजनक चीजें होंगी, ”बेजोस ने कहा। अगस्त 2019 में, नासा ने घोषणा की कि ब्लू ओरिजिन उन 13 कंपनियों में से है जिन्हें 19 प्रौद्योगिकी परियोजनाओं पर सहयोग करने के लिए चुना गया था, जो चंद्रमा और मंगल पर पहुंचने के लिए थीं। ब्लू ओरिजिन चंद्रमा के लिए एक सुरक्षित और सटीक लैंडिंग सिस्टम विकसित कर रहा है और साथ ही तरल प्रणोदक वाले रॉकेट के लिए इंजन नोजल भी। नासा के केनेडी स्पेस सेंटर के ठीक बाहर एक पुनर्निर्मित परिसर से पुन: प्रयोज्य रॉकेट बनाने और लॉन्च करने के लिए कंपनी नासा के साथ भी काम कर रही है।
Amazon Prime Video
7 सितंबर, 2006 को USA में अमेज़ॅन अनबॉक्स के रूप में लॉन्च किया गया, यह सेवा अपने विस्तारित पुस्तकालय के साथ बढ़ी, और प्राइम के विकास के साथ प्राइम वीडियो सदस्यता को जोड़ा गया प्राइम वीडियो, जिसे अमेजन प्राइम वीडियो के रूप में भी विपणन किया जाता है, एक अमेरिकी इंटरनेट वीडियो है जो डिमांड सेवा पर विकसित, स्वामित्व और अमेज़न द्वारा संचालित है। यह किराए या खरीद और प्राइम वीडियो के लिए टेलीविज़न शो और फिल्में प्रदान करता है, अमेज़ॅन स्टूडियो की मूल सामग्री का चयन और अमेज़ॅन की प्रमुख सदस्यता में शामिल लाइसेंस प्राप्त अधिग्रहण। 14 दिसंबर 2016 को प्राइम वीडियो को दुनिया भर में लॉन्च किया गया
Net Worth
जुलाई 2017 में, बेज़ोस नंबर 2 पर वापस जाने से पहले, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनने के लिए उनहोने Microsoft के संस्थापक Bill Gates को पीछे छोड़ दिया। Amazon के प्रमुख ने फिर अक्टूबर में शीर्ष स्थान हासिल किया, और जनवरी 2018 में,ब्लूमबर्ग ने उनकी कुल संपत्ति $ 105.1 बिलियन आंकी, जिससे वह इतिहास के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए। 2019 में उनकी कुल संपत्ति 153 बिलियन है और वह अब दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।
Lessons to take:-
जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते|
व्लादमीर पुतिन
व्लादमीर पुतिन
परिचय
व्लादमीर पुतिन रुस के वर्तमान राष्ट्रपति है।पुतिन पहली बार 1999 मे रूस के प्रधानमंत्री बने। उसके बाद साल 2000 मे पहली बार राष्ट्रपति बने और 2008 तक राष्ट्रपति रहे। 2008 से 2012 तक फिर प्रधानमंत्री चुने गये। और 7 मई 2012 से अभी तक रूस के राष्ट्रपति है। पुतिन अपने देश के ही नहीं पूरी दुनिया सबसे ताकतवर नेता है।
पुतिन रूस पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए कभी राष्ट्पति बनते है तो कभी प्रधानमंत्री। रूस का मुख्य कार्यकारी नेता राष्ट्पति होता है। जैसा भारत मे प्रधानमंत्री होता है। लेकिन पुतिन दो दशक से रूस का नेतृत्व कर रहे है चाहे राष्ट्पति बनकर करें या प्रधानमंत्री बनकर करें।
व्लादिमीर पुतिन का प्रारम्भिक जीवन :-
व्लादमीर पुतिन का जन्म 7 अक्टूबर 1952 मे सेन्ट पीटर्सबर्ग, रूस मे हुआ था। उनके पिता का नाम स्पीरीदोनोविच पुतिन था , और माँ का नाम मरिया सेलोमोवा था। उनके तीन बच्चे थे जिसमे पुतिन तीसरे पुत्र थे। पुतिन दोनो बड़े भाई( विक्टर और अल्बर्ट ) का बचपन मे देहांत होगया था। पुतिन के पिता नेवी मे थे, और माँ फैक्टरी मे काम करती थी।
द्वितीय विश्व युद्ध मे पुतिन के पिता पनडुब्बी के हमलावर दस्ते मे थे। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद पुतिन के पिता सेवा निवित्त होगए और लेनिनगार्द (आज का पीटर्सबर्ग) मे एक कारखाने मे काम करने लगे। पुतिन की शुरुआती शिक्षा सेंट पीटर्सबर्ग के लोकल स्कूल से प्राप्त की थी। पुतिन पढ़ने मे बहुत अच्छे थे और वह बचपन से ही गंभीर स्वाभाव के थे। उन्होंने बचपन से ही जुडो और सेम्बो की ट्रेनिंग शुरु कर दी थी। जुडो मे इन्हें ब्लैक बेल्ट मिला है।
उनके पिता चाहते थे पुतिन भी आर्मी मे जाये, पर उनकी माँ ऐसा नहीं चाहती थी। पुतिन अभी आगे पढ़ना चाहते थे, उनकी माँ भी चाहती थी पुतिन और पढ़े इसलिए उन्होंने लेनिनग्राद राजकीय विश्विविद्यालय मे एडमिशन लिया। और 1975 मे लॉ डिग्री हासिल की। 28 जुलाई 1983 मे पुतिन ने ल्यूडमिला शकरेबनेवा से सादी कर ली। इनकी दो बच्चिया है जिनके नाम मारिया पुतिन और एकातेरिना पुतिन है।
पुतिन ने केजीबी मे कैसे ज्वाइन किया:-
डिग्री हासिल करने के कुछ दिन बाद ही उन्होने केजीबी ज्वाइन कर ली। पुतिन का केजीबी ज्वाइन करने की कहानी भी फिल्म जैसी है पुतिन जब छोटे थे तब वह फिल्म देखना बहुत पसंद था। उन्हें जासूसी फिल्म देखने का बहुत शौक था। वह इन फिल्मों से इतने प्रभावित हुये की 16 साल की उम्र मे वह रूस की गुप्तचर संस्थान केजीबी के ऑफिस पहुंच गये।
वहां के अफसरों से उन्होंने बोला मुझे ज्वाइन करना है। केजीबी के अफसरों ने मजाक समझ कर उन्हें बोला बच्चे जब आप बड़े होजाए तब आना। तब तो पुतिन वापस चले गये, लेकिन इस बात को वह नहीं भुले। सात साल बाद जब उन्होंने 1975 मे अपना स्नातक पूरा किया उसके कुछ दिनों बाद ही उन्होंने केजीबी ज्वाइन कर ली। उन्होंने 16 साल तक केजीबी मे अधिकारी के रूप मे काम किया। जहाँ वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से 1991 मे सेवा निवित्त हुये।
पुतिन का प्रधानमंत्री के रूप मे पहला कार्यकाल :-
पुतिन ने 1996 मे राजनीती मे कदम रखा। बोरिस येल्तसिन रूस के तत्कालीन राष्ट्पति के साथ उनके प्रसासन मे शामिल होगए। और पहली बार प्रधानमंत्री बने।
येल्तसिन बहुत जय्दा करप्ट नेता थे, 1999 मे उनका बहुत जय्दा विरोध होने लगा। विरोध के कारण उन्होंने 1999 मे इस्तीफा दे दिया। उसके बाद उन्होंने अपना पद 31 दिसंबर 1999 मे पुतिन को दे दिया। पुतिन प्रधानमंत्री थे अब उन्हें प्रधानमंत्री के साथ कार्यवाहक राष्ट्पति भी बना दिया गया।
राष्ट्रपति के रूप पहला कार्यकाल :-
पुतिन ने साल 2000 मे अपना पहला राष्ट्पति चुनाव जीता, तब वह पहली बार पूर्ण कलिक राष्ट्पति बने। इस चुनाव मे पुतिन को 53% वोट मिले थे। पुतिन ने अपने पहले कार्यकाल मे बहतरीन काम किया रूस की गिरती अर्थ व्यवस्था और गिरती साख को पुनः ऊपर पहुंचाया। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को कमजोर समझा जाने लगा था। लेकिन पुतिन ने पुनः रूस को बुलंदियों मे पहुंचाया।
पुतिन का राष्ट्रपति के रूप मे दूसरा कार्यकाल :-
जिससे रूस की जनता ने उन्हें फिर से 2004 मे राष्ट्रपति चुनाव जिताया। इस चुनाव मे तो पुतिन को पहले चुनाव से ज्यादा 72% वोट मिले थे। पुतिन ने अपने दूसरे कार्यकाल मे भी बेहतरीन काम किया। लेकिन रूस के संविधान के अनुसार कोई भी राष्ट्पति लगातार तीन बार राष्ट्पति नहीं बन सकता था। इसलिए उन्होंने 2008 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपने विस्वास पात्र सहायक दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्पति पद के लिए चुना।
पुतिन प्रधानमंत्री के रूप मे दूसरा कार्यकाल :-
पुतिन का सहायक होने के कारण दिमित्री मेदवेदेव को जनता का भारी समर्थन मिल रहा था। वह बड़ी आसानी से चुनाव जीत गये। और उन्होंने पुतिन को अपना प्रधानमंत्री चुना। पुतिन भले ही राष्ट्पति नहीं थे लेकिन सरकार मे उनकी ही चलती थी। दिमित्री मेदवेदेव के कार्यकाल के खत्म होने से पहले साल 2011 मे पुतिन के कहने पर मेदवेदेव ने रूस के संविधान मे कई बदलाव किये।
जिसके परिणाम स्वरुप रूस मे राष्ट्रपति के कार्यकाल चार साल से बढ़ाकर छः साल कर दिया गया। लेकिन इस तरह संविधान मे किये गये। सभी जानते थे पुतिन करवा रहे है और अगली बार फिर से राष्ट्रपति बनने के लिये वह यह सब कर रहे है। बदलाव से जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। शहर-शहर मे इस बदलाव के विरोध मे प्रदर्शन किये गये। लेकिन पुतिन विरोध मे कोई बड़ा राजनेता खड़ा नहीं हो सका जिससे यह विरोध कुछ दिन मे ही खत्म होगया।
पुतिन का राष्ट्रपति के रूप मे तीसरा कर्यकाल :-
2012 मे पुतिन राष्ट्रपति पद के तीसरे चुनाव के लिये फिर खड़े हुये। और मार्च 2012 मे उन्होंने यह चुनाव जीत कर तीसरी बार राष्ट्रपति बने। लेकिन इस बार उनकी लोकप्रियता मे कमी आई और पिछली बार से कम 64% वोट प्राप्त हुये। अब वह 4 साल की जगह 6 साल तक राष्ट्रपति रह सकते थे। इस कार्यकाल मे उनपर कई घोटालों के आरोप लगे, और उन्हें दुनिया का सबसे अमीर नेता कहाँ जाने लगा, लेकिन पुतिन ने कभी यह बात नहीं स्वीकारा की उन्होंने घोटाले किये है।
इस बार पुतिन को अपने देश से ही नहीं दूसरे देशों से भी चुनौती मिल रही थी। सीरिया मे अमेरिका और रूस कोल्ड वॉर के बाद पहली बार सामने आगये थे। क्योंकी अमेरिका 'बशर अल असद' की सरकार गिरना चाहता था और रूस ऐसा नहीं होने देना चाहता था। अमेरिका रूस से तो सीधे नहीं भिड़ सकता था।
ऐसे मे अमेरिका सीरिया के विद्रोहीयों को हथियार और पैसे देने लगा तो रूस भी बशर अल असद की सरकार को बचाने के लिए सीरिया की आर्मी को पैसे और हथियार देने लगा। पुतिन की रड़नीति काम कर गई और अमेरिका बशर अल असद की सरकार नहीं गिरा पाया। इससे पुतिन की छवि पूरी दुनिया मे मजबूत हुई और रूस मे वह और भी अधिक माने जाने लगे।
पुतिन का राष्ट्रपति के रूप मे चौथा कार्यकाल :-
इस बात का अंदाजा तब लगा जब पुतिन 2018 मे के चुनाव मे खड़े थे। पुतिन अपने राष्ट्पति के चौथे कार्यकाल के लिये 2018 मे फिर चुनाव मे खड़े हुये। इस बार तो उनके सामने कोई नहीं टिक पाया और उन्होंने इतिहास बनाते हुये 81% मत के साथ चुनाव जीता। और पुतिन चौथी बार रूस के राष्ट्रपति बने। और वह 2020 मे भी रूस के राष्ट्पति है। और 2024 तक वह राष्ट्रपति रहने वाले है।
ऐसा नहीं है की रूस मे पुतिन ने सब अच्छा ही किया है। उनके साथ कई विवाद भी जुड़े है। उन्हें रूस का सबसे करप्ट नेता और दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति कहाँ जाता है। लेकिन कोई साबित नहीं कर पाया। कर भी कैसे पाता है कहाँ जाता है जो भी उनके वरोध मे खड़ा होता है उन्हें गायब कर दिया जाता है या फिर मार ही दिया जाता है। फिर भी रूस की जनता पुतिन को चुनती है क्योंकी उन्होंने रूस को जिन हालतों से निकाला है वह बहुत मुश्किल काम था।
पुतिन की अमीरी का अंदाजा आप उनकी लग्जरी लाइफ स्टाइल से लगा सकते है। पुतिन के पास एक या दो नहीं 43 ऐरोप्लेन , 5 सुपर यॉट, 15 हेलीकाप्टर, 83 कार (जिनमे से जय्दातर सुपर कार है), 20 पैलेसे है। एक पैलेस तो इनके पास ऐसा है जिसके सामने बड़े-बड़े होटल भी कही नहीं टिकते। हलाकि पुतिन बोलते है ऐसा कुछ नहीं है ये सब गलत है। मुझे फसाने के लिये मेरे विरोधी यह सब फैलाते है। पुतिन ने 2014 मे यह बताया की उनके पास सिर्फ 1 एकड़ जमीन है, 900 फिट का घर है, और 200 फिट का एक गरज है, जिसमे उनकी एक कार है। बांकी सब जो आप देखते है वह मुझे राष्ट्रपति के तौर पर मिला है।
नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी
परिचय
मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म 'स्वतंत्र भारत' में हुआ था, यानी 15 अगस्त, 1947 के बाद। वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री भी हैं, जिनकी माँ पद संभालने के समय जीवित थीं। उनके पास सर्वाधिक मार्जिन (लगभग 5.70 लाख वोट ) द्वारा लोकसभा सीट जीतने का रिकॉर्ड है।
नरेंद्र दामोदरदास मोदी भारत के 14वें प्रधानमंत्री हैं। जिन्होंने 2014 में और फिर 2019 में भारतीय जनता पार्टी की प्रभावशाली जीत का नेतृत्व किया। मोदी के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि वह पहली बार विधायक के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री बने। इसी तरह वह पहली बार सांसद के रूप में सीधे भारत के प्रधानमंत्री बने। 2014 में बीजेपी की बहुमत से जीत के लिये मोदी को श्रेय दिया जाता है और यह साल 1984 के बाद पहली बार हुआ था।
नरेंद्र मोदी का शुरुआती जीवन
नरेन्द्र मोदी का जन्म 17 सितम्बर 1950 को वडनगर मेहसाणा जिले मे हुआ था । नरेंद्र मोदी के पिता का नाम दामोदरदास मूलचंद मोदी एवं माता का नाम हीराबेन मोदी है।
नरेंद्र मोदी के पिता एक साधारण तेली जाति के व्यक्ति थे। जिनकी 6 संताने थी जिनमें तीसरें नरेंद्र मोदी थे। नरेंद्र मोदी अपने पिता के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय का स्टॉल लगाते थे। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था और उनके शिक्षक के अनुसार वे कुशल वक्ता थे।
वाद-विवाद में नरेंद्र मोदी को कोई पकड़ नहीं सकता था। मोदी जी ने वडनगर के एक स्कूल से पढ़ाई पूरी की थी और सन् 1980 में गुजरात के विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। उस समय वो RSS के प्रचारक भी थे। नरेंद्र मोदी जी का बचपन बड़ी ही गरीबी में गुजरा। उनके पिता की चाय की दुकान थी और उनकी माँ दूसरों के घरों में बर्तन साफ किया करती थीं। दो वक्त का खाना भी बहुत मुश्किल से मिलता था। यह सब बाते मोदी ने अमेरिका मे फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से बात करते वक्त खुद भी बताई थी यह बताते-बताते उनकी आंखे भर आई थी।
मोदी जी का बहुत छोटे एवं कच्चे घर में उनका बचपन बीता। उनका जीवन बहुत संघर्ष वाला था उन्होंने अपने बचपन में ही बहुत उतार चढ़ाव देखे थे।
नरेन्द्र मोदी बचपन से ही साधु-संतों से काफी प्रभावित हुआ करते थे। और वह स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते थे । वे बचपन से ही संन्यासी बनना चाहते थे।
संन्यासी बनने के लिए मोदी स्कूल की पढ़ाई के बाद 1967 में 17 वर्ष की आयु मे घर छोड़ दिया था । इस दौरान वह पश्चिम बंगाल के रामकृष्ण आश्रम सहित कई जगहों पर घूमते रहे। और कई वर्ष हिमालय मे बिताये.
हिमालय से लौटने के बाद उन्होने ने अपने भाई के साथ मिलकर अहमदाबाद मे चाय की दुकान भी लगाईं। और कई महीनों तक वहाँ पर काम किया। उन्होंने हर कठिनाई को सहते हुए चाय बेची।
18 साल की उम्र में नरेन्द्र मोदी का विवाह उनकी मां ने बांसकाठा जिले के राजोसाना गांव में रहने वाली जसोदा बेन से कर दिया था। पर वह पारिवारिक बंधन मे बंध कर नही रहना चाहते थे इसलिए मोदी ने विवाह के कुछ दिन बाद दुबारा घर छोड़ दिया था।
और कुछ दिनों बाद नरेन्द्र मोदी में संघ के प्रचारक बन गए। नरेन्द्र मोदी अहमदाबाद संघ मुख्यालय में रहते थे तो वहां सारे छोटे काम करते जैसे साफ-सफाई, चाय बनाना,खाना बनाना और बुर्जुग नेताओं के कपड़े धोना शामिल है। आप इस बात से भारत के महान लोकतंत्र का अंदाजा लगा सकते है की कोई भी व्यक्ति चाहे जितना भी गरीब हो या किसी भी जाती का हो प्रधानमंत्री अथवा किसी भी उच्च स्थान पर पहुंच सकता है।
राजनैतिक जीवन
नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री के रूप मे कार्यकाल:-
2001 में गुजरात में भयानक भूकंप आया और पूरे गुजरात में भारी विनाश हुआ. गुजरात सरकार के राहत कार्य से ना खुश होकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने नरेन्द्र मोदी जी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया. मोदी ने काफी कुशलता से राहत कार्य संभाला और गुजरात को फिर से मज़बूत किया। मोदी जी ने गुजरात को भारत का सबसे बेहतरीन राज्य बना दिया। उन्होंने गुजरात के हर गाँव तक बिजली पहुँचाई।
मोदी जब मुख्यमंत्री बने थे तब गुजरात मे पानी की बहुत कमी थी कई इलाकों मे सूखा पड़ता था। मोदी ने यह जल समस्या खत्म करने के लिए बहुत सराहनीय काम किया उन्होंने गुजरात की सभी नदियों को एक दूसरे से जोड़ दिया इससे यह हुआ की जो नदिया जल्दी सुख जाया करती थी उनमे साल भर पानी रहने लगा। देश मे पहली बार किसी राज्य की सभी नदियों को जोड़ा गया जिससे पूरे राज्य में पानी की कमी दूर हुई।
एशिया के सबसे बड़े सोलर पार्क का निर्माण गुजरात में हुआ। गुजरात के सभी गाँवों को इंटरनेट से जोड़ा गया और टूरिज़्म को भी बढ़ावा दिया गया। मोदी के कार्यकाल में गुजरात में बेरोज़गारी काफी कम हुई और महिलाओं की सुरक्षा में काफी मज़बूती आई। इन्ही कारणों की वजह से गुजरात की जनता ने मोदी को 2001 से 2014 तक चार बार लगातार अपना मुख्यमंत्री नियुक्त किया।
प्रधानमंत्री के रूप मे नरेन्द्र मोदी का कार्यकाल
पहला कार्यकाल (2014-2019)
21 मई 2014 मे नरेंद्र मोदी भारत के 14वें प्रधान मंत्री के रूप में चुने गए। मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली थी। वह ब्रिटिश साम्राज्य से भारत की आजादी के बाद पैदा हुए पहले प्रधान मंत्री बने। पहले कार्यकाल मे मोदी ने कई बड़े फैसले किए जिनकी बहुत चर्चा हुई जैसे नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, जी एस टी,
दूसरा कार्यकाल (2014--- )
23 मई 2019 को नरेंद्र मोदी एक बार फिर वाराणसी से सांसद चुने गये। उन्होंने लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट पर कांग्रेस के नेता अजय राय को हराया। इसी जीत के साथ उन्हें फिर से भारत का प्रधानमंत्री चुना गया।
30 मई 2019 को नरेंद्र मोदी ने फिर से प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 31 मई को कैबिनेट का विस्तार किया। पीएमओ के अलावा डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी, मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल, पब्लिक ग्रिएवांसेस एंड पेंशन, डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस और वो सभी मंत्रालय स्वयं के पास रखे, जो किसी अन्य मंत्री को आवंटित नहीं हुए। दूसरा कार्यकाल अभी चल ही रहा है ज्यादा समय नही हुआ है पर इस कम समय मे काफी बड़े काम किए है जैसे धारा 370, 35A को हटाना, जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाना, लद्दाख को अलग करना आदि।
नरेंद्र मोदी की योजनाएं
सन 2014 से लेकर अब तक के कार्यकाल में मोदी जी ने कई महत्वपूर्ण योजनाओ की शुरुआत की। जिनमें से कुछ के बारे में जानकारी इस प्रकार है –
1: मेक इन इंडिया( Make in India)-
मेक इन इंडिया की शुरुआत 25 सितंबर 2014 मे की गई थी। प्रधानमंत्री मोदी जी ने सत्ता में आने के बाद कुछ बहुत ही अहम अभियान चलाये, उन्हीं में से एक ‘मेक इन इंडिया’ अभियान था। जिसके तहत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को प्रोत्साहित कर उनके विकास के लिए कार्य किये गये।
2: प्रधानमंत्री जन-धन योजना-
प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत 15 अगस्त 2014 मे की गई थी। इस योजना को दो चरणों मे पूरा किया गया। पहला चरण 15 अगस्त 2014 से 14 अगस्त 2015 तक चला, और दूसरा चरण 15 अगस्त 2015 से 14 अगस्त 2018 तक चला। यह योजना देश के हर व्यक्ति के बैंकों में खाते खुलवाने के लिए शुरू की गई थी। जिसके तहत सभी के मुफ्त में खाते खोले गए। गरीबों और किसानों को दी जाने वाली सहायता राशि सीधे उनके बैंक खाते में जमा की गई। जिससे बिच मे गरीबों का पैसा खाने वालों का सफाया होगया।
3:प्रधानमंत्री उज्जवाला योजना-
प्रधानमंत्री उज्जवाला योजना की शुरुआत 1 मई 2016 मे की गई थी। इस योजना के तहत गरीब परिवार की महिलाओं को एलपीजी गैस सिलिंडर प्रदान किये गये। इस योजना को काफी सफल माना जा सकता है क्योंकि आज पुरे भारत मे घर - घर तक सिलेंडर पहोच गये है। जिससे हमारी माताओ बहनों को पहले जैसे धुएँ मे परेशान नही होना पड़ता।
4: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-
इस योजना की शुरुआत 1 जुलाई 2015 को की गई थी। इस योजना के तहत फसलों की अच्छी तरह से सिंचाई हो सकें एवं कृषि कार्य को बेहतर दिशा मिल सके. इसलिए इस योजना की शुरुआत की गई।
5: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना -
इस योजना की शुरुआत 13 जनवरी 2016 मे की गई थी। इस योजना में फसल के लिए किसानों को बीमा प्रदान किया गया। ताकि यदि उनकी फसलें प्राकृतिक आपदाओं के कारण ख़राब हो जाती है तो उन्हें बीमा का पैसा मिल सके।
6: स्वच्छ भारत अभियान-
स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत 2अक्टूबर 2014 मे की गई थी। इस अभियान को भारत मे बड़े स्तर पर शुरू किया गया था , जिसके अंतर्गत देश में स्वच्छता और ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों शौचालय का निर्माण किया गया।
7: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना-
इस योजना की शुरुआत 15 जुलाई 2015 मे की गई थी। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत युवाओं के कौशल के विकास के लिए उन्हें प्रशिक्षण देने की सुविधा दी गई।
8: सुकन्या समृद्धि योजना -
इस योजना को 4 दिसम्बर 2014 मे की गई थी। इस योजना को शुरू करने का प्रधानमंत्री जी का उद्देश्य छोटी बच्चियों के सशक्तिकरण के लिए उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करना था। इस योजना मे 10 साल से कम बच्चियों के खाता खुलवाया जा सकता है।
9: डिजिटल इंडिया प्रोग्राम-
इस योजना की शुरुआत 1 जुलाई 2015 मे की गई थी। प्रधानमंत्री जी ने इस प्रोग्राम को शुरू कर देश में अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही उन्होंने लोगों से भी डिजिटल टेक्नोलॉजी का उपयोग करने के लिए अपील की थी। तब से अब तक मे भारत का डिजिटल मे बहोत तेजी से विकास कर रहा है। और इस प्रोग्राम मे आम जनता के साथ रिलायंस जिओ का बहोत बड़ा योगदान है क्योंकि जिओ के आने से पहले तक डाटा बहोत महगा था तो आम जनता इंटरनेट का इस्तमाल जादा नही कर पाती थी।
10: प्रधानमंत्री आवास योजना-
प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत 25 जून 2015 मे की गई थी। इस योजना के तहत गरीबों को किस्तों मे 260,000रूपये दिए जाते है खुद का घर बनने के लिए। इससे आज देश के गांव हो या शहर जहाँ पहले कच्चे घर थे आज उनके पक्के घर दीखते है।
इस तरह से नरेंद्र मोदी जी ने अपने अब तक के कार्यकाल में और भी कई अन्य महत्वपूर्ण योजनायें एवं अभियान जैसे नमामि गंगे, बेटी बचाओ बेटी पढाओ योजना, सर्व शिक्षा अभियान, आदि चलाये जोकि पूरी तरह से देश के विकास के लिए थे.
नरेंद्र मोदी के द्वारा किए मुख्य कार्य-
गुजरात के मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री दोनों के रूप में मोदी जी ने कई सारे महत्वपूर्ण फैसले लिए, एवं इनके कार्यकाल में लिए गये कुछ फैसलों की जानकारी इस प्रकार है–
1: भूमिजल संरक्षण प्रोजेक्ट -
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके शासन के दौरान सरकार ने भूमिजल संरक्षण प्रोजेक्ट के निर्माण का समर्थन किया। इससे कॉटन की खेती में मदद मिली, जिससे नल कूपों से सिंचाई की जा सकती थी। इस तरह से गुजरात कॉटन का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया।
2: नोटबंदी-
प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान नोटबंदी जैसा बहुत ही अहम फैसला लिया। जिसके तहत मोदी जी ने 500 एवं 1000 के पुराने नोट बंद कर दिये एवं इसके स्थान पर 2000 एवं 500 के नये नोट जारी किये। यह मोदी जी द्वारा लिया गया एक ऐतिहासिक फैसला था।
3: जीएसटी-
नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी करने के कुछ समय बाद देश में जितने भी टैक्स लगाये जाते थे उन्हें एक साथ सम्मिलित कर दिया और एक टैक्स जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विस टैक्स लागू किया। इस टैक्स सिस्टम को शुरुआत मे समझने मे काफी दिक्कते हुई पर अब यह फैसला देश के लिए लाभ दायक सिद्ध हो रहा है। जी एस टी मे पट्रोलियम उत्पादों को भी जोड़ने की मांग होती रहती है जिससे पेट्रोल डीज़ल के भी दाम कम होजाए।
4: सर्जिकल स्ट्राइक-
प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2016 में उरी हमले के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारतीय सेना के साथ मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक करने के फैसला लिया। तो सेना ने बिना किसी नुकसान के पाकिस्तान मे घुसकर वहां के कई आतंकीओ और उनके कैम्पों को खत्म कर सुरछित अपनी सीमा पर वापस आगए।
5: एयर स्ट्राइक (Air strike)-
मोदी जी ने 2019 में हुए पुलवामा हमले के बाद देश के सभी सुरक्षा बलों को पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी प्रकार का एक्शन लेने के लिए खुली छूट दे दी, जोकि बहुत ही बड़ा ऐलान था। इसके बाद वायुसेना द्वारा एयर स्ट्राइक की गई थी।
6: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत
7: गुजरात में स्टेचू ऑफ़ यूनिटी का निर्माण
8: राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण
9: जापान के साथ मिलकर भारत में बुलेट ट्रेन लाने जैसे कार्यों में भी मोदी जी ने अपनी अहम भूमिका निभाई है।
इन सभी के साथ ही मोदी जी ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने और दुनिया के अन्य देशों के साथ संबंधों को सुधारने के लिए बहुत बड़ा संकल्प भी दिखाया है।
नरेंद्र मोदी की उपलब्धियां
नरेंद्र मोदी जी ने अपने अभी तक के जीवन में निम्न उपलब्धियां हासिल की हैं –
1: सन 2007 में इंडिया टुडे मैगज़ीन द्वारा किये गये एक सर्वे में मोदी जी को देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया था।
2: 2009 में एफडी मैगज़ीन में उन्हें एफडीआई पर्सनालिटी ऑफ़ द ईयर पुरस्कार के एशियाई विजेता के रूप में सम्मानित किया गया।
3: इसके बाद मार्च 2012 में जारी टाइम्स एशियाई एडिशन के कवर पेज पर मोदी जी की फोटो छापी गई थी।
4: 2014 में मोदी जी का नाम फोर्ब्स मैगज़ीन में दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों की सूची में 15 वें स्थान पर था।
5: 2015 में ब्लूमबर्ग मार्केट मैगज़ीन में मोदी जी का नाम दुनिया के 13 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में था। और साथ ही इन्हें इसी साल टाइम मैगज़ीन द्वारा जारी इन्टरनेट सूची में ट्विटर और फेसबुक पर 30 सबसे प्रभावशाली लोगों में दूसरे सबसे अधिक फॉलो किये जाने वाले राजनेता के रूप में इन्हें नामित किया गया था।
6: 2014 एवं 2016 में मोदी जी का नाम टाइम मैगज़ीन के पाठक सर्वे के विजेता के रूप में घोषित किया गया था।
7: 3 अप्रैल 2016 को मोदी जी को सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार अब्दुलाज़िज़ – अल – सऊद दिया गया था। और 4 जून 2016 को ही अफ़ग़ानिस्तान के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार 'घाज़ी आमिर अमानुल्लाह खान' दिया गया था।
8: 2014, 2015 एवं 2017 में भी मोदी जी का नाम टाइम मैगज़ीन में दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल था। और 2015, 2016 एवं 2018 को फोर्ब्स मैगज़ीन में दुनिया के 9 सबसे शक्तिशाली लोगों में मोदी जी का नाम शामिल था।
9: 10 फरवरी 2018 में मोदी जी को विदेशी डिग्निटरीस के लिए पलेस्टाइन का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पलेस्टाइन राज्य के ग्रैंड कोलार’ के साथ सम्मानित किया गया था।
10: 27 सितंबर 2018 को नरेंद्र मोदी जी को चैंपियंस ऑफ़ अर्थ अवार्ड प्रदान किया गया था। जोकि यूनाइटेड नेशन का सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान है और यह अवार्ड 5 अन्य व्यक्तियों और संगठनों को भी प्रदान किया गया था। जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस की लीडरशिप के लिए और सन 2022 तक प्लास्टिक के उपयोग को खत्म करने के लिए संकल्प लिया था।
11: 2018 में 24 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ग्लोबल आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए मोदी जी के योगदान के लिए उन्हें सीओल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
12: पिछले साल 22 फरवरी 2019 को मोदी जी ने प्रतिष्ठित सीओल शांति पुरस्कार प्राप्त किया। और साथ ही मोदी जी का नाम दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना शुरू करने के लिए पिछले साल के ‘नॉबेल शांति पुरस्कार’ के लिए भी नामंकित किया गया था।
13: नरेंद्र मोदी सोसल मीडिआ मे सबसे जय्दा फॉलो किये जाने वाले राजनेता है।
नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखी गई किताबें
1: एग्जाम वारियर्स इन इंग्लिश एंड हिन्दी
2: अ जर्नी : पोयम्स बाई नरेन्द्र मोदी
3: ज्योतिपुंज अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषा में
4: वक्त की मांग
5: प्रेमतीर्थ
6: सोशल हारमनी
7: सामाजिक समरसता
8: सेतुबंध
9: भवयात्रा
10: आपात काल मे गुजरात;
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य
2024 तक भारत की 'जी डी पी' को 5 ट्रिलियन तक पहुंचाना।
2024 तक भारत के हर घर मे बिजली, पानी पहुँचाना।
2024 तक भारत के मेगा प्रोजेक्ट जैसे सागरमाला, मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रैन, गिफ्ट सिटी, स्मार्ट सिटी, ट्रेन रुट को पूरी तरह इलेक्ट्रिफाइड करना।
यह कुछ मेगा प्रोजेक्ट है जिन्हे प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।
नरेन्द्र मोदी की संपत्ति
नरेंद्र मोदी के पास 1.34Crore रुपए है, और गुजरात मे एक छोटा सा मकान जिसमे उनकी माँ रहती है। इनके पास कोई निजी कार नहीं है। इनके ऊपर कोई लोन नहीं है। इनके पास 4 सोने की अँगूठिया है जिनकी कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपए है।
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री के रूप मे चुने गये थे तो उन्होंने साथ काम करने वाले गरीब व्यक्तियों को 40 लाख रुपए उनकी बेटियों की शादी के लिए देदीये थे।
नरेंद्र मोदी जी की पसंद और नापसंद
खाने में पसंद:- खिचड़ी , दाल चावल, गुजराती व्यंजन|
पसंदीदा राजनेता:- स्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, मोहनदास करमचंद गांधी एवं स्वामी विवेकानंद
हेनरी फोर्ड
हेनरी फोर्ड की जीवनी
हेनरी फोर्ड एक अमेंरिकन उद्योगपति, फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक और मास (Mass) उत्पादन असेंबली लाइन के स्पोंसर भी थे। फोर्ड ने पहली ऑटोमोबाइल कंपनी विकसित की और निर्मित भी की जिसे अमेरिका के मध्यम वर्गीय लोग भी आसानी से ले सकते थे। उनके द्वारा निर्मित ऑटोमोबाइल कंपनी को उन्ही के उपनाम पर रखा गया था और जल्द ही इस कंपनी ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना ली और साधारण ऑटोमोबाइल कंपनी ने जल्द ही बहुमूल्य कार बनाना शुरू किया और 20 वी शताब्दी में अपनी एक प्रभावशाली छाप छोड़ी। इसके बाद उन्होंने मॉडल टी नामक गाड़ी निकाली जिसने यातायात और अमेरिकी उद्योग में क्रांति ला दी। फोर्ड कंपनी के मालक होने के साथ ही दुनिया के सबसे धनि और समृद्ध लोगों में से एक थे।
उन्हें “फोर्डीजम” की संज्ञा भी दी गयी थी। फोर्ड अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी व्यापकता को बढ़ाना चाहती थी इसीलिए उन्होंने अपनी गाडियों की कीमतों में कमी कर बहुत से ग्राहकों को आकर्षित भी किया था। इसके बाद फोर्ड की फ्रेंचाईसी भी उत्तरी अमेरिका के बहुत से भागो में खोली गयी। उन्होंने अपनी अधिकांश संपत्ति भी फोर्ड फाउंडेशन के नाम पर कर दी थी और ऐसी व्यवस्था भी करा दी थी कि वह स्थायी रूप से उनके ही परिवार के नियंत्रण में बनी रहे।
प्रारंभिक जीवन:-
हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई 1863 को मिशिगन के ग्रीनफ़ील्ड फार्म में हुआ था। असल में उनका परिवार इंग्लैंड के सॉमरसेट से था। फोर्ड के 15 साल की आयु में ही उनके माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी। हेनरी फोर्ड के भाई-बहनों में मार्गरेट फोर्ड (1867-1938), जेन फोर्ड (1868-1945), विलियम फोर्ड (1871-1917) और रोबर्ट फोर्ड (1873-1934) शामिल है। किशोरावस्था में उनके पिताजी ने उन्हें एक जेब घडी दी थी। 15 साल की आयु में फोर्ड पूरी तरह गिर चुके थे लेकिन दोस्त और पड़ोसियों की सहायता से वे फिर उठकर खड़े हुए और घडी ठीक करने वाले के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनायी। परिस्थिति को देखकर उनके पिता उन्हें पारिवारिक फार्म देना चाहते थे लेकिन फोर्ड को फार्म पर काम करना पसंद नही था। बाद में उन्होंने लिखा की, “मुझे कभी भी फार्म से प्यार ही नही था – बल्कि फार्म में काम करने वाली मेरी माँ से मुझे प्यार था।” 1879 में जेम्स एफ. फ्लावर & ब्रदर्स और बाद में 1882 में ड्राई डॉक कंपनी के साथ काम करने के लिये उन्होंने घर छोड़ दिया था। बाद में उन्होंने वेस्टिंगहाउस में भी स्टीम इंजन पर काम किया। इस समय में फोर्ड ने गोल्डस्मिथ, ब्रायंट & स्ट्रेटन बिज़नस कॉलेज में बुक कीपिंग का भी अभ्यास किया था।
विवाह और परिवार:-
फोर्ड ने क्लारा जेन ब्रायंट (1866-1950) से 11 अप्रैल 1888 को शादी हुई थी और उनकी पत्नी की सहायता से ही वे एक सॉमिल भी चलाते थे। उनका एक बेटा भी है : एड्सेल फोर्ड (1893-1943)।
करियर:-
1891 में फोर्ड एडिसन ज्ञानवर्धन कंपनी के इंजिनियर बने। 1893 में मुख्य इंजिनियर के रूप में उनका प्रमोशन होने के बाद उनके पास पर्याप्त समय और पैसे दोनों थे। और तभी उन्होंने गैसोलीन इंजन पर खोज करना भी शुरू किया। उनकी यह खोज 1896 में पूरी हुई और उन्होंने एक गाड़ी का भी निर्माण किया जिसका नाम फोर्ड क्वैडसाइकिल रखा गया था। उन्होंने 4 जून को इसका सफल प्रशिक्षण भी किया था। बहुत सी टेस्ट ड्राइव के बाद फोर्ड ने अपनी क्वैडसाइकिल में बहुत से सुधार भी किये।
1896 फोर्ड ने एडिसन के एग्जीक्यूटिव की मीटिंग भी अटेंड की, वहाँ उनका परिचय थॉमस एडिसन से हुआ था। वहाँ उन्होंने फोर्ड ऑटोमोबाइल के प्रोजेक्ट को सभी के सामने रखा। एडिसन ने उनके इस प्रोजेक्ट को सराहना भी की और फोर्ड के आकार और गाड़ी बनाने का काम भी 1898 में पूरा हुआ। डेट्रॉइट लंबर बैरन विलियम एच. मर्फी की पूँजी के समर्थन से चलने वाले फोर्ड ने एडिसन कंपनी से इस्तीफा भी दे दिया था और 5 अगस्त 1899 को नयी डेट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी की स्थापना भी की थी। उस समय पहले कम गुणवत्ता वाली गाडियों के निर्माण में भी बहुत लागत लगती थी इसी वजह से उनकी कीमत भी ज्यादा होती थी। इसी वजह से इस कंपनी को सफलता नही मिल सकी और जनवरी 1901 में कंपनी खत्म हो गयी थी। बाद में सी. हेरोल्ड विल्स की सहायता से फोर्ड को फिर से डिजाईन किया गया, इसे पुनर्निर्मित किया गया और सफलतापूर्वक अक्टूबर 1901 में 26 हॉर्सपावर के साथ चलाया गया था। इसी सफलता के साथ मर्फी और दुसरे सहकर्मियों ने डेट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी को बदलकर हेनरी फोर्ड कंपनी की स्थापना 30 नवम्बर 1901 को की थी, जिसके फोर्ड मुख्य इंजिनियर थे।
1902 में फोर्ड के कंपनी छोड़कर चले जाने के बाद मर्फी ने फिर से कंपनी का नाम बदलकर किडिलैक ऑटोमोबाइल कंपनी रखा। 1902 में ही 8+ हॉर्सपावर के साथ फोर्ड ने साइकिलिस्ट कूपर के साथ मिलकर रेस “999” में जीत भी हासिल की। इसके बाद फोर्ड को एलेग्जेंडर व्हाय. मलकोम्सों का समर्थन मिला जो डेट्रॉइट के ही कोल्-डीलर थे। उन्होंने पार्टनरशिप में फोर्ड & मलकोम्सों लिमिटेड की स्थापना भी की जो ऑटोमोबाइल का उत्पादन करती थी। इसके बाद फोर्ड बहुमूल्य गाडियों के निर्माण और उन्हें डिजाईन करने में लग गये।
रोचक बाते:-
अल्दौस हक्सले के ब्रेव न्यू वर्ल्ड (1932) में फोर्डीस्ट का आयोजन किया। और तभी फोर्ड ने अपने पहले मॉडल टी का भी अनावरण किया।
ओप्टन सिंक्लैर ने 1937 में फोर्ड की काल्पनिक कहानी का वर्णन अपने नॉवेल दी फ्लिवर किंग में किया था।
बहुत से इतिहासिक नॉवेल में फोर्ड का उपयोग किसी व्यक्तिगत चरित्र को दर्शाने के लिये भी किया गया था, जिसने मुख्य रूप से इ.एल. डोक्टोरो का रागटाइम (1975) और रिचर्ड पॉवर का नॉवेल थ्री फार्मर ऑन दी वे ऑफ़ डांस (1985) शामिल है।
1986 में रोबर्ट लकी की बायोग्राफी में फोर्ड, उनके परिवार और उनकी कंपनी तीनो का ही वर्णन था और उसका शीर्षक था, “फोर्ड : दी मैन एंड दी मशीन” इस किताब को 1987 में अपनाया गया था।
2005 में इतिहासिक उपन्यास दी प्लाट अगेंस्ट अमेरिका में फिलिप रोथ ने फोर्ड को एक बहुदिमागी व्यक्तित्व भी बताया था।
ब्रिटिश लेखक डगलस गालब्रेथ ने फोर्ड के शांति जहाज का उपयोग उपन्यास किंग हेनरी (2007) के मौत की जगह के रूप में किया था।
2008 में ही फोर्ड ने दुनिया में अपनी पहचान बनवा ली थी और दुनिया की सबसे कीमती और बहुमूल्य गाड़िया बनाने वाली कंपनियों में भी शामिल हो गयी।
1946 में वे ऑटोमेंटिव हॉल ऑफ़ फेम भी रह चुके है।
समस्वर संगीतकार फेर्ड़े ग्रोफ़ ने हेनरी फोर्ड के सम्मान में एक टोन कविता की रचना भी की थी।
Never Forever, Give Up..
स्टीफन हॉकिंग
स्टीफन हॉकिंग की जीवनी
स्टीफन हॉकिंग
मशहूर साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग ने विज्ञान क्षेत्र में काफी योगदान दिया है। स्टीफन हॉकिंग का जीवन शुरू से ही काफी कठिनाइयों से भरा हुआ था, लेकिन फिर भी उन्होंने वैज्ञानिक बनने के अपने सपने को पूरा किया और विज्ञान के क्षेत्र में अपना अनगिनत योगदान दिया। उनके योगदान के चलते कई ऐसी चीजों के बारे में खोज की गई जिसकी कल्पना शायद ही पहले किसी ने की हो।
स्टीफन हॉकिंग का जन्म और परिवार:-
स्टीफन हॉकिंग का जन्म इंग्लैंड देश में सन् 1942 में हुआ था। जिस वक्त हॉकिंग का जन्म हुआ था उस वक्त दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। स्टीफन हॉकिंग के माता और पिता का घर नॉर्थ लंदन में हुआ करता था। लेकिन इस युद्ध के कारण उन्हें अपना घर बदलना पड़ा और वो लंदन की एक सुरक्षित जगह पर आकर रहने लगे।
स्टीफन के पिता एक चिकित्सा शोधकर्ता के रूप में कार्य करते थे, जिनका नाम फ्रेंक था। वहीं इनकी माता का नाम इसोबेल था और जो चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में बतौर एक सचिव के रूप में काम करती थी। हॉकिंग के माता-पिता की मुलाकात चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में कार्य करने के दौरान ही हुई थी। जिसके बाद इन्होंने शादी कर ली थी और इनके कुल चार बच्चे थे। जिनका नाम स्टीफन, फिलिपा, मैरी और एडवर्ड था। एडवर्ड इनका गोद लिया हुआ बेटा था।
स्टीफन हॉकिंग की शिक्षा:-
स्टीफन जब आठ वर्ष के थे तब उनके परिवार वाले सेंट अल्बान में आकर रहने लगे और यहाँ के ही एक स्कूल में स्टीफन का दाखिला करवा दिया गया। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद स्टीफन ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और यहाँ पर इन्होंने भौतिकी (Physics) विषय पर अध्ययन किया। जिस वक्त इन्होंने इस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था, उस वक्त इनकी आयु महज 17 वर्ष की थी।
कहा जाता है कि स्टीफन को गणित विषय में रुचि थी और वो इसी विषय में अपनी पढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन उस वक्त ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ये विषय नहीं हुआ करता था। जिसके कारण उन्हें भौतिकी विषय को चुनना पड़ा। भौतिकी विषय में प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल करने बाद इन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी आगे की पढ़ाई की। साल 1962 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मैथेमैटिक्स एंड थ्योरिटिकल फिजिकल (डीएएमटीपी) में इन्होंने ब्रह्माण्ड विज्ञान पर अनुसंधान किया।
साल 1963 में खराब हुई सेहत:-
स्टीफन हाकिंग आम लोगों के जैसे ही अपना जीवन जी रहे थे लेकिन साल 1963 में इनकी सेहत खराब होने लगी। 21 वर्ष स्टीफन की बिगड़ती हालत देख उनके पिता उन्हें अस्पताल ले गए जहाँ पर उनकी जांच की गई और जांच में पाया गया कि स्टीफन को एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (amyotrophic lateral sclerosis (ALS) ) नामक बीमारी है। इस बीमारी के कारण शरीर के हिस्से धीरे-धीरे कार्य करना बंद कर देते हैं और इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं है। जिस वक्त स्टीफन को इस बीमारी का पता चला था उस वक्त वो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन उन्होंने अपनी इस बीमारी को अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। बीमार होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई को पूरा किया और साल 1965 में उन्होंने अपनी पीएचडी की डिग्री हासिल की। पीएचडी में इनके थीसिस का शीर्षक “प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपांडिंग यूनिवर्स“ था।
स्टीफन हॉकिंग की पत्नी:-
जिस साल स्टीफन को अपनी बीमारी के बारे में पता चला उसी साल उनकी मुलाकात अपनी पहली पत्नी यानी जेन वाइल्ड हुई थी। हॉकिंग के इस बुरे वक्त में जेन ने उनका साथ दिया और साल 1965 में इन्होंने शादी कर ली। जेन और हॉंकिग के कुल तीन बच्चे थे और इनके नाम रॉबर्ट, लुसी और तीमुथियस है। हॉकिंग की ये शादी 30 सालों तक चली थी और साल 1995 में जेन और हॉकिंग ने तलाक ले लिया था। तलाक लेने के बाद हॉकिंग ने ऐलेन मेंसन(Elaine Mason) से विवाह कर लिया था और साल 1995 में हुई ये शादी साल 2016 तक ही चली थी।
स्टीफन हॉकिंग का करियर :-
कैम्ब्रिज से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी हॉकिंग इस कॉलेज से जुड़े रहे और इन्होंने एक शोधकर्ता के रूप में यहाँ कार्य किया। इन्होंने साल 1972 में डीएएमटीपी में बतौर एक सहायक शोधकर्ता अपनी सेवाएं दी और इसी दौरान इन्होंने अपनी पहली अकादमिक पुस्तक, “द लाज स्केल स्ट्रक्चर ऑफ स्पेस-टाइम” लिखी थी। यहाँ पर कुछ समय तक कार्य करने के बाद साल 1974 में इन्हें रॉयल सोसायटी (फैलोशिप) में शामिल किया गया। जिसके बाद इन्होंने साल 1975 में डीएएमटीपी में बतौर गुरुत्वाकर्षण भौतिकी रीडर के तौर पर भी कार्य किया और साल 1977 में गुरुत्वाकर्षण भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में भी यहाँ पर अपनी सेवाएं दी। वहीं इनके कार्य को देखते हुए साल 1979 में इन्हें कैम्ब्रिज में गणित के लुकासियन प्रोफेसर (Lucasian Professor) नियुक्त किया गया था, जो कि दुनिया में सबसे प्रसिद्ध अकादमी पद है और इस पद पर इन्होंने साल 2006 तक कार्य किया।
स्टीफन हॉकिंग को मिले पुरस्कार और उपलब्धियां:-
प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग के पास कुल तेरह (13) मानद डिग्रियां हैं। वहीं उनके योगदान के लिए इन्हें कई अवार्ड भी दिए गए हैं और इन्हें अभी तक दिए गए पुरस्कारों की जानकारी नीचे दी गई है-
•साल 1966 में स्टीफन हॉकिंग को एडम्स पुरस्कार दिया गया था। इस पुरस्कार के बाद इन्होंने साल 1975 में एडिंगटन पदक और साल 1976 में मैक्सवेल मेंडल एंड प्राइज मिला था।
•हेइनीमान पुरस्कार (Heineman Prize) हॉकिंग को साल 1976 में दिया गया था। इस पुरस्कार को पाने के बाद इन्हें साल 1978 में एक ओर पुरस्कार से नवाजा गया था और इस पुरस्कार का नाम अल्बर्ट आइंस्टीन मेंडल था।
•साल 1985 में हॉकिंग को आरएएस गोल्ड मेंडल और साल 1987 डिराक मेंडल ऑफ द इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल भी दिया गया था। इसके बाद सन् 1988 में इस महान वैज्ञानिक को वुल्फ पुरस्कार भी दिया गया था।
•प्रिंस ऑफ अस्टुरियस अवार्ड भी हॉकिंग ने साल 1989 में अपने नाम किया था। इस अवार्ड को मिलने के कुछ समय बाद इन्होंने एंड्रयू जेमेंट अवार्ड (1998), नायलोर पुरस्कार और लेक्चरशिप (1999) भी दिया गया था।
•साल 1999 में जो अगला पुरस्कार इन्हें मिला था उसका नाम लिलाइनफेल्ड पुरस्कार (Lilienfeld Prize) था और रॉयल सोसाइटी ऑफ आर्ट की तरफ से इसी साल इन्हें अल्बर्ट मेंडल भी दिया गया था।
•ऊपर बताए गए अवार्ड के अलावा इन्होंने कोप्ले मेंडल (2006), प्रेसिडेंटियल मेंडल ऑफ फ्रीडम (2009), फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज (2012) और बीबीवीए फाउंडेशन फ्रंटियर्स ऑफ नॉलेज अवार्ड (2015) भी दिया गया हैं।
स्टीफन हॉकिंग द्वारा किए गए कार्य:-
•प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने ब्रह्मांड को नियंत्रित करने वाले बुनियादी लॉ पर कई शोध किए हैं। हॉकिंग ने अपने साथी रोजर पेनरोस के साथ मिलकर एक शोध किया था और दुनिया को बताया था अंतरिक्ष और समय, ब्रह्मांड के जन्म के साथ शुरू हुए हैं और ब्लैक होल के भीतर समाप्त होंगे।
•आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी और क्वांटम थ्योरी का प्रयोग करके, हॉकिंग ने ये भी निर्धारित किया कि ब्लैक होल पूरी तरह से शांत नहीं हैं बल्कि उत्सर्जन विकिरण (emit radiation) करता है।
•इसके अलावा हॉकिंग ने ये भी प्रस्ताव किया था कि ब्रह्मांड की कोई सीमा नहीं है और विज्ञान की मदद से ये भी पता किया जा सकता है कि ब्रह्माण्ड की शुरूआत कब हुई थी और कैसे हुई थी।
स्टीफन हॉकिंग द्वारा लिखी गई किताबें:-
स्टीफन हॉकिंग ने अपने जीवन काल में कई किताबें भी लिखी हैं और उनकी ये किताब अंतरिक्ष के विषय में ही लिखी गई है। उनके द्वारा लिखी गई कुछ किताबों की जानकारी दी है-
•“ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम”– हॉकिंग द्वारा लिखी गई सबसे पहली किताब का नाम “ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” था। ये किताब बिग बैंग और ब्लैक होल के विषय पर आधारित थी और साल 1988 में प्रकाशित हुई ये किताब 40 भाषाओं में उपलब्ध है।
•“द यूनिवर्स इन ए नटशेल” – ये किताब साल 2001 में प्रकाशित की गई थी और हॉकिंग द्वारा लिखी गई इस किताब को साल 2002 में एवेंटिस प्राइस ऑफ साइंस बुक्स मिला था।
•“द ग्रैंड डिज़ाइन”- हॉकिंग द्वारा लिखी गई “द ग्रैंड डिज़ाइन” किताब साल 2010 में प्रकाशित हुई थी और इस किताब में भी अंतरिक्ष से जुड़ी जानकारी दी गई थी। ये किताब भी काफी सफल किताब साबित हुई थी।
•“ब्लैक होल और बेबी यूनिवर्स” – ये किताब साल 1993 में आई थी और इस पुस्तक में हॉकिंग द्वारा ब्लैक होल से संबंधित लिखे गए निबंधों और व्याख्यानों का जिक्र था। इसके अलावा हॉकिंग ने बच्चों के लिए भी एक किताब लिखी थी। जिसका नाम ”जॉर्ज और द बिग बैंग” था और ये किताब साल 2011 में आई थी।
स्टीफन हॉकिंग के उद्धरण :-
•जीवन दुर्भाग्यपूर्ण होगा यदि ये अजीब और रोचक भरा ना हो तो।
•अगर आप हमेशा नाराज़ रहेंगे एवं कोसते ही रहेंगे तो किसी के पास आपके लिए टाइम नहीं होगा।
•मेंरे जीवन का लक्ष्य बहुत ही आसान है और ये लक्ष्य इस ब्रह्मांड को समझना है और ये पता लगाना है कि ये ऐसा क्यों है और ये क्यों हैं।
•अज्ञानता दुश्मन नहीं हैं, जबकि दुश्मन वो भ्रम हैं जो ये कहे कि आपको सब कुछ आता हैं।
स्टीफन हॉकिंग के जीवन पर बनीं फिल्म:-
साल 2014 में इन पर एक मूवी बनाई गई, जिसका नाम नाम “द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग” हैं । इस फिल्म में उनकी जिंदगी के संघर्ष को दिखाया गया था और बताया गया था कि किस तरह से इन्होंने अपने सपनों के पूरा किया था।
स्टीफन हॉकिंग की कुल संपत्ति:-
इंग्लैंड के कैम्ब्रिज शहर में स्टीफन हॉकिंग का खुद का एक घर है और इस वक्त उनके पास कुल $ 20 मिलियन की संपत्ति है। उन्होंने ये संपत्ति अपने कार्य, पुरस्कारों और किताबों के जरिए कमाई हैं।
स्टीफन हॉकिंग की मृत्यु:-
हॉकिंग लंबे समय से बीमार चल रहे थे। एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस बीमारी के कारण इन्होंने अपने जीवन के लगभग 53 साल व्हील चेयर पर बताए हैं। वहीं 14 मार्च 2018 को इस महान वैज्ञानिक ने अपनी अंतिम सांस इग्लैंड में ली है और इस दुनिया से विदाई ले ली। लेकिन वैज्ञानिक में इनके द्वारा दिए गए योगदानों को कभी भी भुला नहीं जा सकेगा।
अल्बर्ट आइन्स्टाइन
अल्बर्ट आइन्स्टाइन
अल्बर्ट आइन्स्टाइन की जीवनी की जीवनी
आधुनिक भौतिक विज्ञान के जन्मदाता अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने भौतिक विश्व को उसके यतार्थ स्वरूपों में ही समझने का प्रयास किया था। इस सम्बन्ध में उन्होंने कहा था कि “शब्दों का भाषा को जिस रूप में लिखा या बोला जाता है मेरी विचार पद्दति में उनकी उस रूप में कोई भूमिका नही है। पारम्परिक शब्दों अथवा अन्य चिन्हों के लिए दुसरे चरण में मात्र तब परिश्रम करना चाहिए जब सम्बंधिकरण का खेल फिर से दोहराया जा सके ”।
अल्बर्ट आइन्स्टाइन का प्रारम्भिक जीवन:-
अल्बर्ट आइन्स्टाइन का जन्म 14 मार्च 1879 को जर्मनी के उल्क नामक छोटे से कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम हर्मन आइन्स्टाइन और माता का नाम पौलिन था। पौलीन को अपने पुत्र से बहुत प्यार था और कभी वो उसको अपने से दूर नही करती थी। एल्बर्ट तीन वर्ष का हुआ तो उसकी माता के लिए एक समस्या खड़ी हो गयी कि वो बोलता नही था। सामान्यत: तीन वर्ष के बालक तुतलाकर बोलना सीख जाते है। फिर भी माँ ने उम्मीद नही छोड़ी और उसे पियानो बजाना सिखाया। बचपन में एल्बर्ट शांत स्वाभाव का और शर्मीला बच्चा था और उसका कोई मित्र नही था। वह अपने पडोस में रहने वाले बच्चो के साथ भी खेलना पसंद नही करता था। एल्बर्ट के माता -पिता म्यूनिख रहने लगे थे। बच्चे म्यूनिख की सड़को पर सेना की परेड को देखकर उनकी नकल उतारा करते थे जबकि [Albert Einstein] अल्बर्ट सिपाहियों को देखते ही रोने लगता था।
उस समय दुसरे सभी बच्चे बड़ा होकर सिपाही बनने की बात करते थे लेकिन उसकी सिपाही बनने में कोई रूचि नही थी। अब एल्बर्ट पांच वर्ष का हो गया था और उसके जन्मदिन पर उसके माता-पिता ने मैग्नेटिक कम्पस उपहार में दिया जिसे देखकर वो बहुत प्रसन्न हुआ था। जब उस मैग्नेटिक कम्पस की सुई हमेशा उत्तर दिशा की तरफ रहती तो उसके दिमाग में प्रश्न आते थे कि ऐसा कैसे और क्यों होता है। अल्बर्ट बचपन से ही पढने लिखने में होशियार था लेकिन शिक्षको के साथ उसका तालमेंल नही बैठता था क्योंकि वो रटंत विद्या सीखाते थे। अल्बर्ट इसाई नही यहूदी था जिसके कारण स्कूल में इसाई लडके उसे परेशान करते थे इसी वजह से उसके दिमाग में अकेलेपन की भावना आ गयी थी। उसका बचपन में एक ही मित्र बना था जिसका नाम मैक्स टेमले था जिससे वो अपने मन की बाते करता था और तर्कसंगत प्रश्न करता रहता था। एक दिन अल्बर्ट ने मैक्स से पूछा कि “ये ब्रह्मांड कैसे काम करता है ” इसका उत्तर मैक्स के पास नहीं था। इस तरह बचपन से उसका भौतिकी में बहुत रूचि रही थी। एल्बर्ट के चाचा जैकब एक इंजिनियर थे जिन्होंने अल्बर्ट के मन में गणित के प्रति रूचि दिखाई थी। उन्होंने उसे सिखाया था कि जब भी बीजगणित में कुछ अज्ञात वस्तु को ढूँढना चाहते है तो उसे बीजगणित में X मान लेते है और तब तक ढूंढते रहते है जब तक कि पता नही लगा लेते है।
एल्बर्ट जब 15 वर्ष का हुआ तो उसके पिता के कारोबार में समस्याए आ गयी जिसके कारण उन्हें कारोबार बंद करना पड़ा। अब उसके माता पिता उसको जिम्नेजियम स्कूल में दाखिला दिलाकर नौकरी की तलाश में दुसरे शहर चले गये। अब माता पिता के जाने के बाद अल्बर्ट उदास रहने लगा और उसका पढ़ाई में ध्यान नही लगा इसलिए वो भी अपने परिवार के पास इटली चला गया। इटली में उसने बहुत सुखद समय बिताया उसके बाद सोलह वर्ष की उम्र में अल्बर्ट को स्विट्ज़रलैंड के एक स्कूल में पढने के लिए रखा गया। यहाँ पर उसने भौतिकी में गहरी रूचि दिखाना शुरू कर दिया और उसे योग्य अध्यापक भी मिले। यही पर उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत का पता लगाया था। एल्बर्ट ने ज्यूरिख से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी।
अल्बर्ट आइन्स्टाइन अध्यापक के रूप में :-
स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने विद्यार्थियों को पढ़ाने के बारे में विचार किया लेकिन अल्बर्ट के अधिक ज्ञान की वजह से प्रारम्भ में उन्हें नौकरी नही मिली। सन 1902 में अल्बर्ट आइन्स्टाइन को स्विज़रलैंड के बर्न शहर में एक अस्थाई नौकरी मिल गयी। अब उन्हें अपने शोध लेखो को लिखने और प्रकाशित कराने का बहुत समय मिला। उन्होंने डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के लिए मेहनत करना शुरू कर दिया और अंत में उन्हें डाक्टरेट की उपाधि मिल ही गयी।
अल्बर्ट आइन्स्टाइन वैज्ञानिक के रूप में:-
ज्यूरिख विश्वविद्यालय में उनको प्रोफेसर की नियुक्ति मिली और लोगों ने उन्हें महान वैज्ञानिक मानना शुरू कर दिया। सं 1905 में 26 वर्ष की आयु में उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसने उन्हें विश्वविख्यात कर दिया। इस विषय पर उन्होंने केवल चार लेख लिखे थे जिन्होंने भौतिकी का चेहरा बदल दिया। इस सिद्धांत का प्रसिद्ध समीकरण E=mc2 है जिसके कारण ही परमाणु शक्ति प्राप्त हो सकी। इसी के कारण इलेक्ट्रिक ऑय की बुनियाद रखी गयी। इसी के कारण ध्वनि चलचित्र और टीवी पर शोध हो सके। आइन्स्टाइन को अपनी इसी खोज के लिए विश्व प्रसिद्ध नोबल पुरुस्कार मिला था। सारा संसार आइन्स्टाइन की प्रशंसा करने लगा और जगह-जगह पर समारोह आयोजित किये जाने लगे। इतना सब कुछ होने के बाद भी वो हमेशा नम्रता से रहते थे। आइन्स्टाइन विश्व शान्ति और समानता में विश्वास रखते थे इसी कारण उन्हें गांधीजी की तरह महान पुरुष कहा जाता था। आइन्स्टाइन को अपने जीवन में सबसे ज्यादा दुःख तब हुआ जब उनके वैज्ञानिक अविष्कारों के कारण बाद में परमाणु शक्ति का आविष्कार हुआ था जिससे हिरोशिमा और नागासाकी जैसे नगर ध्वस्त हो गये थे।
आइन्स्टाइन का परिवार:-
1903 में अल्बर्ट आइन्स्टाइन का विवाह मिलवा मैरिक से हुआ था। उनके यहाँ दो पुत्रों एल्बर्ट और एडूआई ने जन्म लिया था। आइन्स्टाइन के विवाह से पहले भी पुत्री थी जिसे आइन्स्टाइन ने गोद लिया था लेकिन उसकी बचपन में ही मौत हो गयी थी। 14 फरवरी 1919 ने उनका मैरिक से तलाक हो गया और इसी वर्ष में उन्होंने दुसरी शादी कर ली थी। उनकी दुसरी पत्नी का नाम एलसा था लेकिन वो भी 1936 में चल बसी। वैसे भी उनकी पारिवारिक जीवन में रूचि कम थी और अपना ज्यादातर समय अपनी वैज्ञानिक खोजों में लगाते थे।
आइन्स्टाइन की मृत्यु:-
18 अप्रैल 1955 में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन की अमेरिका के न्यू जर्सी शहर में मृत्यु हो गयी। वह अपने जीवन एक अंत तक कार्य करते रहे और मानवता की भलाई में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इतना सब होने के बाद भी वो किसी के घनिष्ट मित्र नही बन सके क्योंकि उनका लक्ष्य हमेशा सृष्टि को जानने का रहा था। आइन्स्टाइन की प्रतिभा से प्रभावित होने के कारण मृत्यु के बाद उनके दिमाग का अध्ययन किया गया लेकिन कुछ विशेष तथ्य हाथ नही आये।
Lessons to take:-
"बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है|"
निकोला टेस्ला