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Monday, January 19, 2026
वॉरेन बफेट
अमरीका के वॉरेन बफेट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। दुनिया की कोई ऐसी कारोबारी पत्रिका या अखबार या टीवी चैनल नहीं है अमरीका के वॉरेन बफेट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। दुनिया की कोई ऐसी कारोबारी पत्रिका या अखबार या टीवी चैनल नहीं है जिस पर उनके बारे में चर्चा नहीं होती है। बिल गेट और कार्लोस स्लिम के बाद वॉरेन दुनिया के तीसरे सबसे बड़े रईस हैं। वॉरेन बफेट अगर आज दुनिया के सबसे धनी लोगों में गिने जाते हैं तो इसके कई कारण हैं। लेकिन हम यहाँ वारे बफेट के धनपति होने की वजह से उनकी चर्चा नहीं कर रहे हैं बल्कि बेतहाशा दौलत के मालिक होने के बावजूद उन्होंने जिस जीवन शैली को अपनाया है उसके बारे में बताने जा रहे हैं।
क्रेडिट कार्ड की मानसिकता से दूर रहें और अपने आप पर ही निवेश करें।
हाथवे इंकारपोरेशन के प्रमुख वारेन बफे दुनिया की सबसे अमीर शख्सियत है, इस नजर से देखें, तो उन्हे किसी चीज की कमी नहीं है, पर निजी जिंदगी में बफे बेहद सादगी पसंद इंसान है। यहां तक निजी विमान से यात्रा के दौरान भी अपना सामान वह स्वयं उठाना पसंद करते है। बफे ने अपनी नई बायोग्राफी द स्नोबॉल वारेन बफे एंड द बिजनेस ऑफ लाइफ में निजी जिंदगी के कुछ राजदार पहलुओं का खुलासा किया है। बफे से सहयोग से यह बायोग्राफी एलिस श्रोडर ने लिखी है।
नारायणमूर्ति
नारायणमूर्ति
कैरियर
अपने कैरियर की शुरुवात इन्होने पाटनी कम्प्यूटर सिस्टम्स (PCS) , पुणे से की। PCS मे काम करते हुए नारायणमूर्ति ने कई उपलब्धियां हासिल की । पूना में ही इनकी मुलाकात सुधा से हुई जो उस समय टाटा में काम करतीं थी तथा आज इनकी धर्मपत्नी है। नारायण मूर्ति अपनी खुद् की कंपनी शुरू करना चाहते थे लेकिन ऊंची सोच वाले मूर्तिजी के पास पैसे की तंगी थी।बाद में अपनी पत्नी से १०,००० रुपये उधार लेकर हिस्से के शेयर के पैसे लगाकर अपने ६ और साथियों के साथ १९८१ मे नारायणमूर्ति ने इन्फ़ोसिस कम्पनी की स्थापना की।मुम्बई के एक अपार्टमेंट में शुरू हुयी क्म्पनी की प्रगति की कहानी आज दुनिया जानती है। सभी साथियों की कड़ी मेहनत रंग लाई और १९९१ मे इन्फ़ोसिस पब्लिक लिमिटेड कम्पनी मे तब्दील हुई। १९९९ मे कम्पनी को उत्कृष्टा और गुणवत्ता का प्रतीक SEI-CMM हासिल किया। १९९९ मे वो स्वर्णिम अवसर आया, और इन्फोसिस ने इतिहार रचा, जब कम्पनी के शेयर अमरीकी शेयर बाजार NASDAQ मे रजिस्टर हुए। इन्फोसिस ऐसा कर दिखाने वाली पहली भारतीय कम्पनी थी।
नारायणमूर्ति १९८१ से लेकर २००२ तक कम्पनी मुख्य कार्यकारी निदेशक रहे। २००२ मे उन्होने कमान अपने साथी नन्दन नीलेकनी को थमा दी, लेकिन फिर भी इन्फोसिस कम्पनी के साथ वे मार्गदर्शक के दौर पर जुड़े रहे। नारायणमूर्ति १९९२ से १९९४ तक नास्काम के भी अध्यक्ष रहे। बहुत कम लोग जानते हैं कि नारायणमूर्ति जेल की भी हवा खा चुके हैं। उन्हीं के शब्दों में:-
हम लोग १९७४ में बुल्गारिया में थे।एक ल़डकी मुझसे फ़्रेंच में बात करने लगी। ट्रेन में एक नौजवान इस बात से झुंझला गया क्योंकि वह उससे बात न करके मुझसे बात कर रही थी। अगली घटना यही हुयी कि मैं तीन दिन के लिये जेल में ठूंस दिया गया ।एक अजनबी धरती पर तीन दिन बहुत लम्बा समय होता है। पहले दिन के बाद ही हालत खराब होने लगती है यह सोचकर कि कभी निकलना भी हो पायेगा क्या !लेकिन मैंने कभी आशा नहीं छोडी।
नारायण मूर्ति को २००० में भारत सरकार द्वारा उनकी उपलब्धियों के लिये पद्मश्री पुरुस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा तकनीकी क्षेत्र में तमाम पुरस्कार समय-समय पर मिलते रहे।सन २००५ में नारायण मूर्ति को विश्व का आठवां सबसे बेहतरीन प्रबंधक चुना गया। इस सूची में शामिल अन्य नाम थे-बिल गेट्स,स्टीव जाब्स तथा वारेन वैफ़े ।
हालांकि नारायण मूर्ति आज अवकाश ग्रहण कर रहे हैं लेकिन वे इन्फ़ोसिस के मानद चेयरमैन बने रहेंगे । श्री नारायण मूर्ति ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया। भारत के इतिहास मे नारायण मूर्ति का नाम हमेशा लिया जाएगा। भारत के ऐसे लाल को हमारा शत शत नमन। नारायण मूर्ति के दीर्घ ,सक्रिय,स्वस्थ जीवन के लिये मंगलकामनायें।
हर सफर का अपना मजा है
तीस साल पहले 1981 में छह मित्रों और केवल दस हजार रुपये की पूंजी से एन आर नारायण मूर्ति ने जिस इन्फोसिस कंपनी की स्थापना की थी, उसका कारोबार बीते साल करीब 30,000 करोड़ रुपये था। उन्होंने एक ऐसी कंपनी की नींव डाली, जिसे दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में गिना जाता है। 33 देशों में सवा लाख से भी ज्यादा लोग उनके साथ काम करते हैं। उनकी कंपनी को सर्वश्रेष्ठ नियोक्ता सहित अनेक सम्मान मिल चुके हैं।
एक अरब डॉलर के कारोबार का आंकड़ा छूनेवाली यह पहली सॉफ्टवेयर कंपनी रही है। नारायण मूर्ति की तारीफ अमेरिकी राष्ट्रपति सहित अनेक दिग्गज कर चुके हैं। देश-विदेश में अनेक सम्मान पा चुके नारायण मूर्ति पहले पद्मश्री और फिर पद्म भूषण से नवाजे जा चुके हैं। दुनिया भर के आईटी क्षेत्र में भारत की छवि चमकाने वाले मूर्ति की सफलता के कुछ सूत्र :
अनुभव से सीखने का महत्व
आप कोई भी बात कैसे सीखते हैं? अपने खुद के अनुभव से या फिर किसी और से? आप कहां से और किससे सीखते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आपने क्या सीखा और कैसे सीखा। अगर आप अपनी नाकामयाबी से सीखते हैं, तो यह आसान है। मगर सफलता से शिक्षा लेना आसान नहीं होता, क्योंकि हमारी हर कामयाबी हमारे कई पुराने फैसलों की पुष्टि करती है। अगर आप में नया सीखने की कला है, और आप जल्दी से नए विचार अपना लेते हैं, तभी सफल हो सकते हैं।
परिवर्तन को स्वीकारें
हमें सफल होने के लिए नए बदलावों को स्वीकारने की आदत होनी चाहिए। मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद किसी हाइड्रो पॉवर प्लांट में नौकरी की कल्पना की थी। पढ़ाई के दौरान एक वक्ता के भाषण ने मेरी जिंदगी बदल दी। उन्होंने कंप्यूटर और आईटी क्षेत्र को भविष्य बताया था। मैंने मैसूर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर आईआईटी कानपुर में पीजी किया। आईआईएम अहमदाबाद में चीफ सिस्टम्स प्रोग्रामर के नौकरी की। पेरिस में नौकरी की और पुणे में इन्फोसिस की स्थापना की और बंगलुरु में कंपनी का कारोबार बढ़ाया। जो जगह मुफीद लगे, वहीं काम में जुट जाओ।
संकट की घड़ी को समझें
कभी-कभी संकट में सौभाग्य नजर आता है। ऐसे में, धीरज न खोएं। आपकी कामयाबी इस बात में भी छिपी होती है कि संकट के वक्त आप कैसी प्रतिक्रिया देते हैं? इन्फोसिस की स्थापना हम सात लोगों ने की थी और मैं तथा मेरे सभी साथी चाहते थे कि हम यह कंपनी बेच दें, क्योंकि साल भर की मेहनत के हमें दस लाख डॉलर मिल रहे थे। यह मेरे लिए सौभाग्य नहीं, संकट था। मैं इस कंपनी का भविष्य जानता था। तब मैंने अपने साथियों को संभाला था और इन्फोसिस को बिकने से रोका।
संसाधनों से बड़ा जज्बा
इन्फोसिस से पांच साल पहले नारायण मूर्ति ने आईटी में देशी ग्राहकों को ध्यान में रखकर सफ्ट्रॉनिक्स नाम की कंपनी खोली थी, जो बंद कर देनी पड़ी। 2 जुलाई, 1981 को इन्फोसिस कंपनी रजिस्टर्ड हुई, लेकिन उस समय मूर्ति के पास कंप्यूटर तो दूर, टेलीफोन तक नहीं था। उन दिनों टेलीफोन के लिए लंबी लाइन लगती थी। जब इन्फोसिस अपना आईपीओ लेकर आई, तब बाजार से उसे अच्छा रेस्पांस नहीं मिला था। पहला इश्यू केवल एक रुपये के प्रीमियम पर यानी ग्यारह रुपये प्रति शेयर जारी हुआ था।
किसी एक के भरोसे मत रहो
1995 में इन्फोसिस के सामने एक बड़ा संकट तब पैदा हो गया था, जब एक विदेशी कंपनी ने उनकी सेवाओं का मोलभाव एकदम कम करने का फैसला किया। वह ग्राहक कंपनी इन्फोसिस को करीब 25 प्रतिशत बिजनेस देती थी। लेकिन अब जिस कीमत पर वह सेवा चाहती थी, वह बहुत ही कम थी। दूसरी तरफ उस ग्राहक को खोने का मतलब था कि अपना एक चौथाई बिजनेस खो देना। तभी तय किया गया कि बात चाहे टेक्नोलॉजी की हो या अप्लीकेशन एरिया की, कभी भी किसी एक पर निर्भर मत रहो। अपना कामकाज इतना फैला हो कि कोई भी आपको आदेश न दे सके।
आप केवल कस्टोडियन हैं
जो भी संपदा आपके पास है, वह केवल आपकी देखरेख के लिए है। आप उसके अभिरक्षक हैं। वह भी अस्थायी तौर पर। बस। यह न मानें कि वह सारी संपदा केवल आप ही भोगेंगे। किसी भी संपदा का असली आनंद आप तभी उठा सकते हैं, जब उसका उपभोग पूरा समाज करे। यदि आपने बहुत दौलत कमा भी ली और उसका मजा लेना चाहते हैं, तो उसे किसी के साथ शेयर करें। यही हमारा दर्शन है।
कुर्सी से न चिपके रहें
साठ साल के होते ही नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया और नन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बन गए। आम तौर पर कर्मचारियों को तो साठ साल में रिटायर कर दिया जाता है, लेकिन डायरेक्टर अपने पद पर डटे रहते हैं। नारायण मूर्ति ने सभी को यह संदेश दिया कि अगर किसी भी कंपनी को लगातार आगे बढ़ाना है, तो उसमें नए खून की निर्णायक भूमिका रहनी चाहिए। क्योंकि नए विचार अपनाने में युवाओं को कोई हिचक नहीं होती।
मंजिल से ज्यादा मजा सफर में
जीवन में कोई भी लक्ष्य पा लेने में बहुत मजा आता है। लेकिन जीवन का असली मजा तो सफर जारी रखने में ही है। कभी भी जीवन में संतुष्ट होकर ना बैठ जाएं कि बस, बहुत हो चुका। जब आप एक मैच जीत जाते हैं, तो अगले मैच की तैयारी शुरू कर देते हैं। हर मैच जीतने की अपनी खुशी होती है और खेलने का अपना मजा है।
रबीन्द्रनाथ टैगोर
विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर
रबीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी
रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म (7 मई, 1861 – 7 अगस्त, 1941) को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। वे विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगद्रष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति है। वे एकमात्र कावि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं – भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।
जीवन
रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म देवेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के संतान के रूप में 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। टैगोर ने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1978 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन कालेज विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए। उनका 1883 में मृणालिनी देवी के साथ विवाह हुआ।
रचनाधर्मी
बचपन से ही उनकी कविता, छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र लिखी थी और 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकने वाले युगद्रष्टा टैगोर के सृजन संसार में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि उन्होंने आहरण करके अपने अन्दर सिमट लिए थे। उनके पिता ब्राह्म धर्म के होने के कारण वे भी ब्राह्म थे। पर अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया।
मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओ के अन्दर वह अलग अलग रूपों में उभर आता है। साहित्य की शायद ही ऐसी कोई शाखा है, जिनमें उनकी रचना न हो – कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला – सभी विधाओं में उन्होंने रचना की। उनकी प्रकाशित कृतियों में – गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं। उन्होने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अँग्रेज़ी अनुवाद के बाद उनकी प्रतिभा पूरे विश्व में फैली।
शान्ति निकेतन
टैगोर को बचपन से ही प्रकृति का सान्निध्य बहुत भाता था। वह हमेशा सोचा करते थे कि प्रकृति के सानिध्य में ही विद्यार्थियों को अध्ययन करना चाहिए। इसी सोच को मूर्तरूप देने के लिए वह 1901 में सियालदह छोड़कर आश्रम की स्थापना करने के लिए शांतिनिकेतन आ गए। प्रकृति के सान्निध्य में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की।
रवीन्द्र संगीत
टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं के अलग-अलग रंग प्रस्तुत करते हैं।
अलग-अलग रागों में गुरुदेव के गीत यह आभास कराते हैं मानो उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गई थी। प्रकृति के प्रति गहरा लगाव रखने वाला यह प्रकृति प्रेमी ऐसा एकमात्र व्यक्ति है जिसने दो देशों के लिए राष्ट्रगान लिखा।
दर्शन
गुरुदेव ने जीवन के अंतिम दिनों में चित्र बनाना शुरू किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लांति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी संपर्क है उनकी रचनाओं में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। टैगोर और महात्मा गांधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गांधी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे टैगोर ने गांधीजी को महात्मा का विशेषण दिया था। एक समय था जब शांतिनिकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस वक्त गांधी ने टैगोर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चेक दिया था।
जीवन के अंतिम समय 7 अगस्त 1941 के कुछ समय पहले इलाज के लिए जब उन्हें शांतिनिकेतन से कोलकाता ले जाया जा रहा था तो उनकी नातिन ने कहा कि आपको मालूम है हमारे यहां नया पावर हाउस बन रहा है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हां पुराना आलोक चला जाएगा नए का आगमन होगा।
सम्मान
उनकी काव्यरचना गीतांजलि के लिये उन्हे सन 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला।
नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने साहित्य, शिक्षा, संगीत, कला, रंगमंच और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अनूठी प्रतिभा का परिचय दिया। अपने मानवतावादी दृष्टिकोण के कारण वह सही मायनों में विश्वकवि थे।
टैगोर दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपूर्व योगदान दिया और उनकी रचना गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। गुरुदेव सही मायनों में विश्वकवि होने की पूरी योग्यता रखते हैं। उनके काव्य के मानवतावाद ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। दुनिया की तमाम भाषाओं में आज भी टैगोर की रचनाओं को पसंद किया जाता है।
टैगोर की रचनाएँ बांग्ला साहित्य में एक नयी बहार लेकर आई। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इन रचनाओं में चोखेर बाली, घरे बाहिरे, गोरा आदि शामिल हैं। उनके उपन्यासों में मध्यमवर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया है। टैगोर का कथा साहित्य एवं उपन्यास भले ही बंकिमचन्द्र और शरतचन्द्र की तरह लोकप्रिय नहीं हो लेकिन साहित्य के मापदंडों पर उनका कथा साहित्य बहुत उच्च स्थान रखता है। उन्होंने भारतीय साहित्य में नये मानक रचे। समीक्षकों के अनुसार उनकी कृति ‘गोरा’ कई मायनों में अलग रचना है।
इस उपन्यास में ब्रिटिश कालीन भारत का जिक्र है। राष्ट्रीयता और मानवता की चर्चा के साथ पारंपरिक हिन्दू समाज और ब्रह्म समाज पर बहस के साथ विभिन्न प्रचलित समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ ही उसमें स्वतंत्रता संग्राम का भी जिक्र आया है। इतना समय बीत जाने के बाद भी बहुत हद तक उसकी प्रासंगिकता कायम है।
रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं में उनकी रचनात्मक प्रतिभा सबसे मुखर हुई है। उनकी कविताओं में नदी और बादल की अठखेलियों से लेकर आध्यात्मवाद तक के विभिन्न विषयों को बखूबी उकेरा गया है। इसके साथ ही उनकी कविताओं में उपनिषद जैसी भावनाएँ महसूस होती हैं।
साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएँ नहीं हों। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में रचना की। उनकी कई कृतियों का अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया है। अंग्रेजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। सात मई 1861 को जोड़ासाँको में पैदा हुए रवींद्रनाथ के नाटक भी अनोखे हैं। वे नाटक सांकेतिक हैं। उनके नाटकों में डाकघर, राजा, विसर्जन आदि शामिल हैं। बचपन से ही रवींद्रनाथ की विलक्षण प्रतिभा का आभास लोगों को होने लगा था। उन्होंने पहली कविता सिर्फ आठ साल में लिखी और केवल 16 साल की उम्र में उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी।
रवींद्रनाथ की रचनाओं में मानव और ईश्वर के बीच का स्थायी संपर्क कई रूपों में उभरता है। इसके अलावा उन्हें बचपन से ही प्रकृति का साथ काफी पसंद था। रवींद्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थियों को प्रकृति के सानिध्य में अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने इसी सोच को मूर्त रूप देने के लिए शांतिनिकेतन की स्थापना की।
उन्होंने दो हजार से अधिक गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित उनके गीत मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंग पेश करते हैं। गुरूदेव बाद के दिनों में चित्र भी बनाने लगे थे। रवींद्रनाथ ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएँ की थी। 7 अगस्त 1941 को देश की इस महान विभूति का देहावसान हो गया।
सुंदर पिचाई
सुंदर पिचाई की जीवनी
सुंदर पिचाई
“कोई इंसान इसलिए खुश नहीं है कि उसके जीवन में सबकुछ सही है, वह खुश है क्योंकि उसका अपने जीवन की सभी चीजों के प्रति दृष्टिकोण सही है।” ये कहना है, अपनी बुद्धि, योग्यता, परिश्रम और सकारात्मक दृष्टिकोण के दम पर गूगल जैसे शीर्षस्थ अंतरराष्ट्रीय कंपनी के सर्वोच्च पद CEO (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) पर शोभित होने वाले युवा भारतीय टेक्नोलॉजी एग्जीक्यूटिव सुंदर पिचाई का। एक साधारण परिवार में जन्मे, साधारण परिवेश में पले-बढ़े शांत-सौम्य सुंदर पिचाई ने असाधारण सफलता प्राप्त कर भारत का नाम पूरे विश्व में गौरवान्वित कर दिया है। आइये जानते है कि उन्होंने सफलता का ये सफ़र किस प्रकार तय किया?
जन्म और प्रारंभिक जीवन:-
सुंदर पिचाई का जन्म 12 जुलाई 1972 को मदुरई, तमिलनाडू में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम “सुंदर राजन पिचाई” है। उनके पिता रघुनाथ पिचाई General Electric Co. में Senior Electrical Engineer थे। उनकी माँ लक्ष्मी पिचाई Stenographer का काम किया करती थी। लेकिन उन्होंने यह नौकरी पिचाई के छोटे भाई के जन्म के उपरांत छोड़ दी। उनका बचपन चेन्नई के अशोक नगर इलाके में बीता। चार लोगों का उनका परिवार वहाँ दो कमरे के एक छोटे से मकान में रहा करता था। उनके पिता की आय सीमित थी, जिसके कारण उनका जीवन स्तर साधारण था। टी।वी।, फ्रिज, कार जैसे ऐशो-आराम के साधन उनके पास उपलब्ध नहीं थे। उनके पिता सुख-सुविधाओं के साधनों से अधिक अपने बच्चों की शिक्षा पर बल दिया करते थे। जब पिचाई 12 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने पहला dialer phone अपने घर पर लगवाया। ये पहली technology से संबंधित वस्तु थी, जो पिचाई ने अपने घर पर देखी थी। घर पर फ़ोन लगने के बाद पिचाई को स्वयं की एक विलक्षण प्रतिभा का पता चला। वे जो भी नंबर dial करते, वह उनके दिमाग में छप जाता। वे उस नंबर को कभी नहीं भूलते थे। आज भी कई वर्षों पुराने नंबर उन्हें याद हैं।
प्रारंभिक व उच्च शिक्षा:-
सुंदर पिचाई शांत स्वभाव के होनहार छात्र थे। पढ़ाई के अतिरिक्त उनकी खेलों में भी रूचि थी। अपने स्कूल के क्रिकेट टीम के वे कप्तान थे। 10 वीं कक्षा तक उन्होंने चेन्नई के अशोक नगर में स्थित “जवाहर विद्यालय” से पढ़ाई की। उसके बाद 12 वीं की पढाई IIT, Chennai स्थित वाना वाणी स्कूल से की। 17 वर्ष की उम्र में IIT प्रवेश परीक्षा पास कर उन्होंने IIT, खड़गपुर में दाखिला ले लिया। वहाँ उनकी ब्रांच “Metallurgical & Material Science” थी। अपनी इंजीनियरिंग के दौरान (1989-1993) वे हमेशा अपने बैच के Topper रहे। वर्ष 1993 में उन्होंने फाइनल परीक्षा में अपने बैच में टॉप किया और रजत पदक हासिल किया।
अमरीका में शिक्षा और प्रारंभिक जॉब:-
IIT, खड़गपुर से इंजीनियरिंग की degree लेने के बाद सुंदर पिचाई scholarship पर अमरीका के Stanford University में पढ़ने चले गए। वहाँ “Material Science & Engg.” में उन्होंने “Master of Science” किया। MBA की ओर रूझान होने के कारण उन्होंने Pennsylvania University के Wharton School से MBA की डिग्री प्राप्त की। MBA करने के उपरांत उन्होंने “Applied Material” में Project Management एवं Engineering का कार्य किया। फिर McKinsey & Company में management consultant का कार्य किया।
गूगल में प्रवेश:-
1 अप्रेल 2004 को सुंदर पिचाई गूगल में अपना Interview देने गए। उसी दिन कंपनी ने जीमेल का Testing Version Launch किया था। Interviewer ने उनसे जीमेल के संबंध में कुछ प्रश्न पूछे। प्रारंभ में पिचाई उन प्रश्नों का ठीक से कुछ उत्तर नहीं दे सके। उन्हें लग रहा था कि शायद Interviewers उनसे अप्रेल फूल का मजाक कर रहे है। लेकिन जब उन्हें जीमेल का Use करने के लिए कहा गया, तब कहीं वे अपने विचार खुलकर उनके सामने रख सके। उनके विचारों से Interviewers इतने प्रभावित हुए कि उन्हें तुरंत जॉब पर रख लिया गया। गूगल में उनकी प्रारंभिक जिम्मेदारी गूगल Toolbar और सर्च से संबंधित थी।
गूगल क्रोम का Project:-
सुंदर पिचाई ने जब गूगल में काम करना प्रारंभ किया था, उस समय गूगल Toolbar और सर्च इंजन माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्स्प्लोरर में default option हुआ करता था। एक दिन उन्हें विचार आया कि गूगल को अपना खुद का web browser बनाना चाहिए क्योंकि यदि किसी दिन माइक्रोसॉफ्ट ने अपना खुद का सर्च इंजन develop कर उसे इंटरनेट एक्स्प्लोरर में default option set कर दिया, तो गूगल वहाँ से permanently हट जायेगा। जब उन्होंने CEO Eric Schmidt के समक्ष अपना यह proposal रखा, तो उन्होंने इसे मँहगा प्रोजेक्ट करार देकर इसे approve करने से मना कर दिया। लेकिन पिचाई अपनी इस बात पर अड़े रहे और गूगल के सह-निर्माताओं लार्री पेज और सेर्गे ब्रिन को राज़ी कर लिया और 2006 में गूगल क्रोम का project approve करवा लिया। गूगल क्रोम का project approve करवाने के 6 बाद वही हुआ, जिसकी पिचाई को शंका थी। 18 अक्टूबर 2006 को अचानक ही माइक्रोसॉफ्ट ने इंटरनेट एक्स्प्लोरर से गूगल को हटाकर Bing को अपना default सर्च इंजन set कर लिया। गूगल को इंटरनेट एक्स्प्लोरर से प्रतिदिन लाखों का Traffic मिलता था और प्रतिदिन लाखों की कमाई होती थी। यह गूगल के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। लेकिन इस स्थिति को पिचाई ने पहले से ही भांप लिया था। इसलिए अपनी टीम के साथ मिलकर 24 घंटे में उन्होंने इंटरनेट एक्स्प्लोरर का loop-hole खोज के निकाला। जिसके कारण Bing पर जो लोग move हुए थे, उनके सामने एक pop-up window में गूगल को फिर से अपना default सर्च इंजन सेट करने का option आने लगा। इस तरह उन्होंने गूगल के 60 प्रतिशत users को वापस retain कर लिया। माइक्रोसॉफ्ट के द्वारा मिले इस झटके के बाद गूगल ने Strategic Move लेते हुए HP और सभी बड़े computer distributors से ये deal sign कर ली कि वे अपने PC पर गूगल Toolbar और उसकी सर्च से संबंधित option default दिया करेंगे।
Senior Voice President के पद पर Promotion:-
सुंदर पिचाई की दूरदर्शिता ने गूगल को एक बड़े नुकसान से बचा लिया था। उनकी कार्यशैली और प्रतिभा को देखते हुए गूगल में उन्हें Senior Voice President के पद पर promote कर दिया गया। गूगल क्रोम परियोजना में पिचाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब 2008 में गूगल क्रोम Launch हुआ, तो यह गूगल की उस समय तक की सबसे बड़ी सफलता थी। आज गूगल क्रोम विश्व में सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला web browser है।
Vice President का पद:-
गूगल क्रोम की सफलता के बाद पिचाई को 2008 में Vice President Of Project Development बना दिया गया। 2012 में उन्हें गूगल App और क्रोम का Vice president बना दिया गया। 2013 में Android बनाने वाले एंडी रुबिन के द्वारा यह प्रोजेक्ट छोड़ देने के बाद पिचाई ने इसकी कमान भी संभाल ली और अपना उत्कृष्ट योगदान दिया। आज जैसे Computer System में OS का सबसे बड़ा हिस्सा माइक्रोसॉफ्ट विंडोज के पास है, वैसे ही आज की तारिख में personal phone में OS का सबसे बड़ा हिस्सा गूगल के पास है। इस सफलता के पीछे सुन्दर पिचाई के कुशल नेतृत्व का हाथ है। उनकी योग्यता को देखते हुए 2014 में उन्हें गूगल के सभी products का overall head बना दिया गया। जिसमें गूगल सर्च, गूगल मैप, गूगल प्लस, गूगल कॉमर्स व गूगल एड जैसे प्रोडक्ट्स शामिल हैं। गूगल की सफलता का बहुत बड़ा श्रेय गूगल में लगातार हो रही नई innovations को जाता है और इन innovations के पीछे जो नेतृत्वकर्ता कार्य कर रहा है, वो है – सुंदर पिचाई।
गूगल का CEO:-
उनकी उपलब्धियों को देखते हुए गूगल ने उन्हें 10 अगस्त 2015 को कंपनी का CEO घोषित कर दिया। इसके साथ ही सुंदर पिचाई भारतीय मूल के उन लोगों में शामिल हो गए है, जो 400 अरब डॉलर कमी करने वाली कंपनी के शीर्ष अधिकारी है। आज उनकी सालाना आय 335 करोड़ रुपये है। गूगल जैसी कंपनी जहाँ जॉब प्राप्त कर लेना ही बहुत बड़ी बात है। उस कंपनी में एक भारतीय मूल के व्यक्ति का सर्वोच्च स्थान पर पहुँचना हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है।
राईट बंधु
राईट बंधु की जीवनी
राईट बंधु
ईश्वर द्वारा बनाई गयी सृष्टि में अनेक जीव जन्तुओ ने इस संसार में जन्म लिया , जिसमें पशुपक्षियों को मानव की तुलना में कुछ विशिष्ठ प्राकृतिक गुण प्राप्त हुए है। पक्षियों को मुक्त आकाश में विचरण करते हुए मनुष्य यही सोचा करता होगा कि काश। वह भी उनकी तरह उड़ पाता। आकाश से ऊँची उड़ान भरने की इसी आकांशा ने विल्बर राईट एवं ओरविल राईट नामक राईट बंधुओ (Wright Brothers) को हवाई जहाज की खोज की प्रेरणा दी होगी और उन्होंने इसी से प्रेरित होकर आकाश में उड़ने वाले हवाई जहाज का आविष्कार कर डाला।
अमेरिका निवासी विल्बर राईट और ओरविल राईट दोनों ही सगे भाई थे। विल्बर का जन्म 16 अप्रैल 1867 को इंडियाना में जबकि ओरविल राईट का जन्म डेटन ओहियो में 19 अगस्त 1871 में हुआ था। उनके पिता मिल्टन राईट चर्च में काम करते थे जो 1878 में पादरी भी बने। उनकी माँ भी चर्च संबधी कामों में पिता का हाथ बंटाया करती थी। बचपन से राईट बंधुओं की रूचि कुछ ऐसे मशीन संबंधी कामों में लगी रहती थी, जो ऊँचाई तक जा सके। एक बार उपहार में उन्हें खिलौने के रूप में हेलीकाप्टर मिला था। बस फिर क्या था दोनों भाइयों (Wright Brothers) ने इस तरह हेलीकाप्टर बना डाले जो कार्क, बांस और कागज के द्वारा बने थे।
दोनों भाई स्वभाव से एक-दुसरे के विपरीत थे। विल्बर एकांतप्रिय, मितभाषी थे तो ओरविल बातूनी सामाजिक थे। ओरविल को पैसा कमाने का काफी शौक था। उन्होंने तो गर्मी की छुट्टियों में छापेखाने में काम करते हुए न केवल हाई स्कूल परीक्षा पूरी की बल्कि टाइपसेटर बनने के साथ-साथ समाचार पत्र का भी प्रकाशन किया। विल्बर माँ की बीमारी की वजह से हाई स्कूल की पढ़ाई पुरी नही कर पाए थे। उनके पिता उन्हें चर्च संबंधी कामों में लगाना चाहते थे जबकि दोनों भाइयों की रूचि उसमें नही थी।
चर्च जाना छोडकर दोनों साथ रहते ,साथ खेलते और एक जैसा सोचते तथा कार्य में लगे रहते थे। माँ की मृत्यु के बाद दोनों ने छापाखाना खोलकर साहित्य संबधी प्रकाशन आरम्भ कर दिया। साथ ही साइकिल बेचने ,किराए देने, मरम्मत करने की दुकाने खोल रखी थी। उन्हें न तो किसी प्रकार का व्यसन था और न ही लडकियों के साथ घुमने का शौक था। इसी बीच उन्हें ज्ञात हुआ कि 9 अगस्त 1896 को जर्मनी के ओटो लिलिन्थाल नामक यांत्रिक इंजिनियर द्वारा बनाये गये Hang Glider के माध्यम से आकाशीय उड़ान में उनकी मृत्यु हो गयी।
बस फिर क्या था ,राईट बंधुओ (Wright Brothers) ने एक ऐसा हवाई जहाज बनाने का प्रयास शुरू कर दिया जो कि हवा से भारी हो। उसमें इंजन प्रोपेलर लगे हो। वह आदमी सहित आकाश में उड़ सके। उन्होंने पहले ग्लाइडर बनाया और उसका परीक्षण करने के लिए पहाडी स्थान पर चल दिए जो 12 सैंकड़ तक हवा में रहने के बाद पृथ्वी पर आ गिरा। सन 1900 में उन्होंने दो तख्ते वाला वायुयान बनाया, जिसको शक्ति देने वाला पेट्रोल इंजन भी लगाया था। एक भाई निचले हिस्से में बैठकर नियन्त्रण का प्रयास करता था। उड़ान भरते समय उन्हें पता लगा कि पंखो का आकार ठीक नही। उन्हें विंडटनेल का सिद्धांत भी समझ में आ गया था। अनेक असफलताओ के बाद Wright Brothers ने फ्लायर जहाज बनाया, जिसके पंखो का आकार 400 वर्गफ़ीट था और उसके संतुलन के लिए मशीन बना रखी थी। 8 दिसम्बर 1903 को पहली उड़ान भरी जो कि असफल रही। फिर इसमें आवश्यक संशोधन कर जब इसे उड़ाया तो यह अपनी ताकत से 10 फीट उपर उठा और 12 सैकंड बाद नीचे आ गया। जहाज से उड़ने और उतरने के बीच 100 फीट की कुल उड़ान नापी गयी। इस एतेहासिक उड़ान को देखने के लिए बुलाने पर भी सिर्फ 5 वयस्क , दो बच्चे और एक कुत्ता था। पत्रकार आ रहे थे कि रास्ता भटक गये।
इसके बाद फ्लायर जहाज ने 4 बार सफल उड़ान भरी लेकिन हवा के झोंके ने आकर ऐसा उलटा कि किसी काम का नही रहा। 1904 में एक ऐसा हवाई जहाज बनाया जो न केवल मुड़ सकता था बल्कि वह 3 मील यात्रा भी तय कर चूका था। इसके बाद वह 85 किमी दूरी तक भी चला था। 1908 में परीक्षण के दौरान दुर्घटना का सामना करते हुए उन्होंने परीक्षण जारी रखा। 1909 तक हवाई जहाज की फैक्ट्रियां अमेरिका में स्थापित कर ली। उनके इस नवनिर्मित वायुयान इ इंग्लिश चैनल, अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर के साथ साथ लगभग 23 हजार किमी की यात्रा तय की। बायर्ड ने तो उत्तरी और दक्षिण ध्रुव की यात्राएं वायुयान द्वारा ही तय करके क्षमता का परिचय दे दिया। वायुयान की खोज के बाद एक नये युग की शुरुआत हो चुकी थी। विश्व में एक क्रान्ति आ चुकी थी। राईट बन्धु घर गृहस्थी में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे कि छोटा भाई विल्बर टाइफाइड का शिकार हो गया। 29 मई 1912 को उसका असमय प्राणांत हो गया। बूढ़े पिता मिल्टन राइट ने विल्बर की अंतिम क्रिया करते हुए उसकी विलक्षण प्रतिभा, परिश्रमशीलता पर गर्व करते हुए बड़ा दुःख जताया। इसे बीच ओरविले अकेले रहकर अपनी प्रयोगशाला में हवाई जहाज में लगातार सुधार कार्य करते रहे।
विल्बर के देहांत के बाद वो भी भीतर से टूट चुके थे। ओरविल जहां हवाई जहाज के आविष्कार से जितने प्रस्सन थे उतने ही वह दुखी हो गये जब प्रथम विश्वयुद्ध में हवाई जहाज़ों ने विनाशकारी बम ले जाकर मानव के विरुद्ध ही उसका इस्तेमाल होने लगा था। अंतिम समय तक कार्य करते हुए ओरविल को प्रयोगशाला में दिल का ऐसा दौरा पड़ा कि 30 जनवरी 1948 को उनके प्राण पखेरू उड़ गये। उनकी शवयात्रा पुरे सैनिक सम्मान के साथ 4 जेट विमानों की गड़गड़ाहट के साथ निकाली गयी। उनके द्वारा बनाये गये पहले फ्लायर जहाज को अमेरिका के स्मिथ सोनियन संग्रहालय में आज भी देखा जा सकता है। राईट बंधुओ (Wright Brothers) द्वारा वायुयान के अभूतपूर्व आविष्कार ने आज जहां दुनिया की मीलो दूरी जो चंद मिनटों और सैकंडो में तय कर दिया है वही सुख सुविधा प्रदान करने वाले अत्याधुनिक वायुयानों ने मानव के आकाश में उड़ने की लालसा को भी पूरा कर दिखाया है लेकिन सर्वाधिक दुखद पहलू यह है कि मानव ने अत्यंत तेज गति वाले युद्धक विमानों को बनाकर अपने ही अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है। जो भी हो इन अमेरिकी भाइयों (Wright Brothers) की कल्पनाशीलता एवं परिश्रम ने दुनिया को महान देन दी है।
लैरी पेज
लैरी पेज
लैरी पेज की जीवनी
दुनिया की सबसे बड़े सर्च गूगल ने 2005 में आधिकारिक तौर पर अपना जन्मदिन 27 सितंबर को मनाने की घोषणा की थी। इसके पहले गूगल ने अपने बर्थडे की तारीख कई बार बदली है। 4 सितंबर, 1998 को बनी इस कंपनी ने सितंबर महीने के कई दिनों को अपने बर्थडे के तौर पर चुना था। 4, फिर 7, और 15, व 26 सितंबर के बाद आखिरकार 2005 में गूगल ने 27 सितंबर को अपना जन्मदिन तय कर लिया। 2005 के बाद से हर 27 सितंबर को गूगल अपने होम पेज पर आकर्षक डूडल बनाता आया है। “ब्रांड गूगल” की चमत्कारिक सफलता की कहानी कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दो छात्रों के बीच दोस्ती के साथ शुरू हुई। शुरुआत में इन दोस्तों ने गूगल कंपनी एक कार गैराज से शुरू की थी, जो आज बहुत ही अधिक लोकप्रिय बन चुकी है। इंटरनेट सर्च मशीन से शुरू कर गूगल अब ई-मेल, फोटो और वीडियो, भूसर्वेक्षण नक्शों और मोबाइल फोन जैसी सेवाएं देने वाली ऑलराउंडर कंपनी बन गई है। सभी सेवाएं मुफ्त हैं। कमाई होती है व्यावसायिक कंपनियों से मिलने वाले विज्ञापनों से। गूगल की शुरुआत गैराज में बनाए गए ऑफिस से हुई थी। आज गूगल के हेडक्वार्टर 'गूगलप्लेक्स' समेत गूगल के 40 देशों में 70 से ज्यादा ऑफिस हैं।
दो मालिक हैं आपस में नहीं पटती थी दोनों की:-
सर्जि ब्रिन और लैरी पेज 22-23 साल के थे, जब 1995 में वे पहली बार मिले। उस समय दोनों के बीच बिल्कुल नहीं पटती थी। हर बात पर बहस हो जाया करती थी। दोनों के माता-पिता बेहद पढ़े-लिखे टैक्नोक्रेट्स थे।
मिलकर बनाई सर्च मशीन:-
लैरी और सर्जि को दोस्त बनाया एक समस्या ने। वह थी इंटरनेट जैसे सूचनाओं के महासागर में से किसी खा़स सूचना को कैसे ढूंढ़ा जाए? दोनों ने मिल कर एक सर्च-मशीन बनाई, एक ऐसा कम्प्यूटर, जो कुछ निश्चित सिद्धांतों और नियमों के अनुसार किसी सूचना भंडार में से ठीक वही जानकारी ढूंढकर निकाले, जो हम चाहते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही किए परीक्षण- बुनियादी सिद्धांत ये था कि हाइपर लिंकिंग की मदद से किसी वेबसाइट को सर्च किए टर्म के हिसाब से इंटरनेट से खोजकर एक समझने योग्य सूची बनानी है। यूजर जिस भी शब्द, प्रश्न या आर्टिकल को सर्च करे, कम्प्यूटर उसके बारे में जितनी हो सके, संबंधित जानकारी यूजर्स के सामने पेश कर दे। ये एक ऐसी गुत्थी थी जिसे लैरी पेज और सर्जि ब्रिन ने मिलकर सुलझाया। दोनों ही प्रोफेशनल दोस्तों ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में ही आरंभिक परीक्षण किए। इसके लिए 11 लाख डॉलर धन जुटाया। लैरी पेज ने सबसे पहले वर्ल्ड वाइड वेब की मैथेमैटिकल प्रॉपर्टीज को समझने की कोशिश की। लैरी पेज ने इंटरनेट का हाइपरलिंक स्ट्रक्चर एक ग्राफ की मदद से समझा। इसके बाद लैरी पेज ने सर्जि ब्रिन के साथ एक रिसर्च प्रोजेक्ट 'BackRub' के साथ जुड़कर काम करना शुरू किया। दोनों दोस्तों ने एक साथ कई प्रोजेक्ट किए और अंत में 4 सितंबर, 1998 में इन दोनों ने मिलकर कंपनी की नींव रखी।
कार-गैरेज में बनी गूगल इनकॉपरेटेड:-
दोनों ने 7 सितंबर 1998 को, गूगल इनकॉपरेटेड के नाम से मेनलो पार्क, कैलिफोर्निया के एक कार गैरेज में अपनी कंपनी बनाई और काम शुरू कर दिया। दो ही वर्षों में गूगल का नाम सबकी जुबान पर था। जर्मनी में कम्प्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर डिर्क लेवान्दोस्की का मत है कि याहू जैसे अपने अन्य प्रतियोगियों की तुलना में गूगल शायद ही बेहतर है, लेकिन उसकी सार्वजनिक छवि कहीं अच्छी बन गई है।
सितंबर 2007 में गूगल ने पूरा किया अपना पहला दशक:-
यही उसकी चमत्कारिक सफलता का रहस्य है। इंटरनेट को दुनिया में आए दो दशक से ज्यादा समय हो गए हैं, जबकि गूगल ने सितंबर 2007 को अपना पहला दशक पूरा किया, तब भी दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं।
इस्तेमाल बढ़ने के साथ-साथ बढ़ते चले गए शेयर के दाम:-
इंटरनेट का इस्तेमाल जितना बढ़ रहा है, गूगल के शेयर भी उतने ही चढ़ रहे हैं। अगस्त 2004 में गूगल ने जब पहली बार शेयर बाज़ार में पैर रखा, तब उसके शेयर 85 डॉलर में बिक रहे थे। तीन वर्ष बाद, नवंबर 2007 में इसके शेयर उछलकर 747 डॉलर पर पहुंच गए थे।
जैक मा
जैक मा की जीवनी
जैक मा
अगर देखा जाए तो दुनिया में रोज बहुत सारे लोग नौकरी से निकाले जाते हैं या नौकरी पाने के लिए कंपनियों के दरवाजे खटखटाते हैं। उनमें से कुछ लोगों को नौकरी मिलती है और कुछ को नहीं। लेकिन दुनिया में कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो नौकरी न मिलने पर खुद की कंपनी खोलने के बारे में सोचते हैं। इन्हीं लोगों में से एक जुनूनी, मेहनती, काम करने के लिए एक हद तक पागल व्यक्ति का नाम जैक मा है जो चीन के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। जिन्होने चीन की सबसे बड़ी ई कॉमर्स साइट(E Commerce Site) अलीबाबा का निर्माण किया। एक बार KFC में नौकरी के लिए जब KFC पहली बार जैक मा का शहर में आया था। इस नौकरी के लिए 24 लोगों ने आवेदन किया था जिसमें से 23 लोगों को चयन हो गया लेकिन एकमात्र जैक मा का चयन नही हुआ। आप इसी बात से अंदाज़ा लगा सकते की उन्होने अपने जीवन में कितनी ठोकरे खाई हैं। आइए जानते हैं जैक मा का अर्श से पर्श तक जाने की कहानी।
प्रारंभिक जीवन:-
जैक मा का जन्म 10 सितंबर 1964 को चीन के ज़ेजिआंग प्रान्त के हन्हाजु गाँव में हुआ था। जैक मा के माता-पिता का पारम्परिक नाटक और कहानिया सुनाने का काम किया करते थे इसी से इनकी जीविका चलती थी। जैक मा को बचपन से ही अंग्रेजी सीखने की इच्छा थी। अंग्रेजी सीखने के लिए उन्होंने किसी शिक्षक का सहारा नहीं लिया। वे प्रतिदिन सुबह साइकिल से घर के पास की होटल पर जाते थे जहाँ अक्सर विदेशी नागरिक ठहरते थे। जैक मा शुरवात में उनके साथ टूटी फूटी अंग्रेजी में बात करते थे क्योंकि चीन में चीनी मुख्य भाषा थी और अंग्रेजी सीखना जरुरी नही माना जाता था। अब वो अपने खाली समय में विदेशी लोगों को मुफ्त में शहर का गाइड करते थे। जिससे उनकी प्रेक्टिस भी होती थी और उनकी अंग्रेजी में भी सुधार होता गया। उन्होंने नौ सालो तक यही काम किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि इस दौरान उन्होंने ना केवल अंग्रेजी सीखी बल्कि पश्चिमी लोगों के तकनीक और स्टाइल को भी सीखा। इन विदेशियों को गाइड करते समय एक विदेशी मित्र से उनकी गहरी मित्रता हो गयी। जो जाने के बाद उन्हें पत्र लिखा करता था और उसी विदेशी मित्र ने उन्हें “जैक” नाम दिया क्योंकि चीनी में उनका नाम बोलना और लिखना बड़ा कठिन था। तब से उनको जैक के नाम से ही जाना जाता है। हालांकि जैक मा पढ़ाई में बिलकुल अच्छे नहीं थे वो पांचवीं कक्षा में ही दो बार फेल हो गए थे। और आठवीं कक्षा में भी वो तीन बार फेल हो गए थे। बाद में बड़े होने पर जब उन्होंने विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा दी तो तीन बार इस परीक्षा में फेल हो गये। प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें 10 बार रिजेक्ट किया। उसके बाद जैक ने हंजाऊ टीचर्स इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया, जहां से 1988 में उन्होंने अंगरेजी में स्नातक परीक्षा उतीर्ण की। स्कूल के दौरान जैक को विद्यार्थी परिषद का अध्यक्ष चुना गया था। स्नातक के बाद में वो हंजाऊ यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी और अन्तराष्ट्रीय व्यापार के लेक्चरर बन गये।
करियर की शुरुवात:-
जैक मा ने करियर की शुरुवात काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण रहा। जैक मा ने 30 अलग अलग जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन किये लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जैक मा सबसे पहले एक पुलिस की नौकरी के लिए आवेदन किया था लेकिन ढीला-ढाला देखकर उन्हें साफ मना कर दिया। इसके बाद उन्हे केएफसी(KFC) ने भी रिजेक्ट कर दिया। जैक इंटरनेट की दुनिया में बिजनेस करने से पहले एक ट्रांसलेशन कंपनी चलाते थे। 1994 में जैक मा ने पहली बार इन्टरनेट का नाम सूना। जिसके बाद वे अमेरिका गए और वहां उन्होंने इंटरनेट देखा और उन्होंने सबसे पहला शब्द इंटरनेट पर Beer (भालू) टाइप किया। उनके सामने कई देशों के बीयर ऑप्शन दिखे लेकिन चाइनीज बीयर नहीं दिखा। अगले बार उन्होंने चीन के बारे में सामान्य जानकारी ढूंढने की कोशिश की लेकिन फिर वो चौंक गये कि चीन को कोई जानकारी इन्टनेट पर उपलब्ध नही थी। अपने देश की जानकारी इंटरनेट पर ना होने से जैक को काफी दुःख हुआ। क्योंकि इससे उन्हें लग गया था कि चीन तकनीकी क्षेत्र में अन्य देशों से काफी पीछे है। इसी वजह से उन्होंने अपने दोस्तो के साथ मिलकर चीन की जानकारी देने वाली पहली वेबसाइट “अग्ली” (Ugly) बनाई। इस वेबसाइट के बनाने के महज पांच घंटो के अंदर उन्हें कुछ चीनी लोगों के ईमेल आये जो जैक के बारे में जानना चाहते थे। तब जैक मा को एहसास हुआ कि इन्टरनेट से बहुत कुछ किया जा सकता। 1995 में जैक मा ,उनकी पत्नी और दोस्तों ने मिलकर 20,000 डॉलर इकट्ठे किये और एक कम्पनी की शुरुवात की। इस कम्पनी का मुख्य काम था दुसरी कंपनियों के लिए वेबसाइट बनाना। उन्होंने अपनी कम्पनी का नाम “चयना येल्लो पेजस” (China Yellow Pages) रखा था। इस कंपनी को शुरू करने के लिए जैक ने अपनी बहन से पैसे उधार लिए थे। लेकिन यह कंपनी फेल हो गई। इसके बाद उन्होंने चीन की कॉमर्स मिनिस्ट्री में काम किया जिसमें वे अध्यक्ष पद में थे। कुछ दिनों के बाद नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद वे अपने घर हैंग्जू चले गए और जहां उन्होंने अपने 17 दोस्तों के साथ मिलकर अलीबाबा (Alibaba) की शुरुआत की। अलीबाबा कंपनी की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस कंपनी ने अपना आईपीओ 4080 रुपए (68 डॉलर) पर पेश किया था और मार्केट खत्म होने पर इसकी कीमत 5711 रुपए (93.89 डॉलर) हो गई थी। इसे अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बताया जा रहा है। उनकी निजी संपत्ति की कीमत करीब 130800 करोड़ रुपए है। Global e-commerce system को सुधारने के लिए 2003 में जैक मा ने Taobao Marketplace की स्थापना की। जिसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए eBay ने इसे खरीदने का ऑफर दिया। लेकिन जैक मा ने eBay का प्रस्ताव ठुकरा दिया और इसकी बजाय उसने याहू (Yahoo) के को-फाउंडर जेरी से 1 बिलियन डॉलर की सहायता ली। चीन के सबसे अमीर इस व्यक्ति ने एक वक्त ऐसा भी देखा था जब उन्हें केएफसी (KFC) ने नौकरी देने से मना कर दिया था अभी की हकीकत यह है कि अलीबाबा.कॉम (Alibaba.com) के नाम से मशहूर यह कंपनी दुनिया भर के 190 कंपनियों से जुड़ी हुई है। अलीबाबा.कॉम वेबसाइट के अलावा तओबाओ.कॉम (Taobao.com) चलाती है जो चीन की सबसे बड़ी शॉपिंग वेबसाइट है। इसके अलावे चीन की बड़ी जनसंख्या को इनकी वेबसाइट टीमॉल.कॉम (Tmall.com) ब्रांडेड चीजें मुहैया कराती हैं। यही नहीं, चीन में ट्विटर जैसी सोशल मीडिया सिना वाइबो (Sina Weibo) में भी इस कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके साथ ही यूट्यूब जैसी वीडियो शेयरिंग वेबसाइट यौकू टुदौऊ (Youku Tudou) में भी इसकी अहम हिस्सेदारी है। ये कंपनियां मार्केटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और लोजिस्ट सेवाएं देती हैं। अलीबाबा कंपनी के शुरुआती दिनों में सिर्फ 18 लोग काम करते थे और अभी करीब 22 हजार लोग काम करते हैं।
निजी जीवन / शादी:-
जैकमा ने जेंगयिंग (Zhang Ying) से शादी की थी और उनके एक पुत्र एवं एक पुत्री है। जैक अपनी पत्नी से पहली बार तब मिले जब वो Hangzhou Normal University में पढ़ रहे थे। स्नातक होने के बाद तुरंत 1980 के दशक में दोनों ने शादी कर ली और दोनों ने ही अध्यापक का काम शूरू कर दिया था जैक के बारे में उनकी पत्नी जैंग यिंग का मानना है “जैक हैंडसम नहीं है, लेकिन मुझे उनसे इसलिए प्यार हो गया, क्योंकि वे ऐसे कई काम कर सकते हैं जो हैंडसम पुरुष भी नहीं कर सकते”।
सम्मान और पुरूस्कार:-
2004 में जैक मा को China Central Television द्वारा Top 10 Business Leaders of the Year चुना गया। 2005 में जैक मा को वर्ल्ड इकनोमिक फोरम द्वारा Young Global Leader चुना गया और फार्च्यून पत्रिका में 25 Most Powerful Business people in Asia में नाम दिया गया। 2007 में बिज़नस वीक पर उन्हें Businessperson of the Year चुना गया। 2008 में जैक मा को World”s Best CEOs की 30 लोगों की लिस्ट में चुना गया। 2009 में टाइम मैगज़ीन द्वारा जैक को विश्व के “100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों” की सूची में रखा गया और इसी साल उन्हें फ़ोर्ब्स चीन की तरफ से Top 10 Most Respected Entrepreneurs in China चुना गया। 2010 में जैक मा को फ़ोर्ब्स एशिया द्वारा प्राकुतिक आपदा प्रबधन और गरीबी उन्मूलन कार्यो के लिए Asia”s Heroes of Philanthropy में से एक चुना गया। 2013 में जैक मा को Hong Kong University of Science and Technology द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि दी गयी। 2014 में फ़ोर्ब्स द्वारा विश्व के पशक्तिशाली व्यक्तियों की सूची में 30वा स्थान दिया गया। 2015 में जैक को The Asian Awards में Entrepreneur of the Year से नवाजा गया।
मदर टेरेसा
मदर टेरेसा
मदर टेरेसा की जीवनी
तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित करने वाली मदर टेरेसा ऐसे महान लोगों में से एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीती थीं। संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा का असली नाम “अगनेस गोंझा बोयाजिजू”था।
मदर टेरेसा का जन्म:-
अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में एक अल्बेनीयाई परिवार में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे।
मदर टेरेसा के पिता का निधन:-
जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेंदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।
समाजसेवी मदर टेरेसा:-
18 साल की उम्र में उन्होंने “सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो” में शामिल होने का फैसला लिया और फिर वह आयरलैंड चली गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी क्योंकि “लोरेटो”की सिस्टर्स के लिए ये जरुरी था। आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को वह कोलकाता में “लोरेटो कॉन्वेंट पहुंची। 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रधानाचार्या बन गईं।
एक कैथोलिक नन:-
मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं। मदर टेरेसा ने “निर्मल हृदय” और “निर्मला शिशु भवन”के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व ग़रीबों की स्वयं सेवा करती थीं। 1946 में गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1948 में स्वेच्छा से उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली थी।
मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना:-
7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से “मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी”की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य समाज से असहाय और बीमार गरीब लोगों की सहायता करना था। मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिए विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया था।पद्मश्री से सम्मानित:-
भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री से सम्मानित किया। इन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा ने नोबेल पुरस्कार की 1,92,000 डॉलर की धन-राशि गरीबों को फंड कर दी। 1985 में अमेरिका ने उन्हें मेडल आफ़ फ्रीडम से नवाजा।अंतिम समय में रहीं परेशान:-
अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा ने शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक कष्ट भी झेले क्योंकि उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगाए गए थे। उन पर ग़रीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा। भारत में भी पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई। उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था।मदर टेरेसा का निधन:-
मदर टेरेसा की बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी गिरता चला गया। 1983 में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के दौरान उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। 1989 में उन्हें दूसरा दिल का दौरा पड़ा और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया।उनका निधन:-
उनका निधन साल 1991 में मैक्सिको में उन्हें न्यूमोनिया और ह्रदय की परेशानी हो गयी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने “मिशनरीज ऑफ चैरिटी” के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई।सचिन तेंदुलकर
सचिन तेंदुलकर की जीवनी
सचिन तेंदुलकर
सचिन तेंदुलकर ने समय के साथ रनों का अम्बार लगा दिया है। उन्होंने 29 जून, 2007 को दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध बेलाफास्ट (आयरलैंड) में खेलते हुए एक दिवसीय मैचों में 15000 रन पूरे कर लिए। इतने रन बनाने के बाद सचिन। विश्व के ऐसे प्रथम खिलाड़ी बन गए, जिंन्होंने इतने बड़े आंकड़े को छुआ है। विश्व के श्रेष्ठतम बल्लेबाज माने जाने वाले आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन ने एक बार सचिन के बारे में कहा था- ”मैंने उसे टीवी पर खेलते हुए देखा और उसकी खेल तकनीक देखकर दंग रह गया। तब मैंने अपनी पत्नी को अपने पास बुला कर उसे देखने को कहा। हालांकि मैंने स्वयं को खेलते हुए कभी नही देखा, लेकिन मुझे महसूस होता है कि यह खिलाड़ी ठीक वैसा ही खेलता है जैसा मैं खेलता था।” वास्तव में सचिन क्रिकेट का हीरो और एक ऐसा रोल मॉडल है जिसे सभी भारतीय पसन्द करते हैं। कल की सी बात लगती है जब सचिन तेंदुलकर क्रिकेट क्षेत्र में उतरा-एक घुंघराले बालों वाला 15 वर्षीय सचिन, जिसकी भर्राई सी आवाज ने लोगों के दिल में स्थान बना लिया।
वह लगभग 15 वर्ष का ही था जब उसने 1988 में स्कूल के क्रिकेट मैच में काम्बली के साथ 664 रन बनाए थे। लोग उसके खेल का करिश्माई अंदाज़ देखते ही रह गए थे। इसके बाद उसका क्रिकेट के मैदान में अन्तरराष्ट्रीय मैचों में प्रदर्शन इतना अच्छा रहा है कि लोग कहते हैं कि वह वाकई लाजवाब है। सचिन तेंदुलकर ने 1989-90 में कराची में पाकिस्तान के विरुद्ध अपना पहला टैस्ट मैच खेल कर अपने क्रिकेट कैरियर की शुरुआत की थी। तब से अब तक के कैरियर में सचिन ने उन ऊंचाइयों को छू लिया है, जिसे छूना किसी अन्य क्रिकेट खिलाड़ी के लिए शायद ही सम्भव हो सके। आक्रामक बल्लेबाजी उसका अंदाज है। उसका बल्ला यूं घूमता है कि दर्शकों को अचम्भित कर देता है। यदि वह जल्दी आउट भी हो जाता है तो भी अक्सर अपना करिश्मा दिखा ही जाता है। गेंदबाजी में भी वह अपना करिश्मा कभी-कभी दिखा देता है। एक दिवसीय मैचों में दस हजार से अधिक रन बनाने वाला वह पहला बल्लेबाज है। उसने सौ से अधिक विकेट लेने का करिश्मा भी दर्शकों को दिखाया है। सचिन ने दर्शकों के मानस पटल पर अपने खेल की अविस्मरणीय छाप छोड़ी है।
उसने 20 टैस्टों और एक दिवसीय मैचों में अनेकों शतक व हजारों रन बना डाले हैं जितने आज तक कोई नहीं बना सका है। जब सचिन केवल 11 वर्ष का था, तब वह बेहद शैतान था। मां-बाप को वह अपनी शैतानियों से परेशान करता रहता था। एक बार वह शैतानी करते हुए पेड़ से गिर गया। तब सचिन के बड़े भाई अजीत के दिमाग में विचार आया कि उसे क्रिकेट की कोचिंग क्लास के लिए भेज दिया जाए ताकि उसकी अतिरिक्त ऊर्जा खेलों में खर्च हो सके। कहा जा सकता है कि यह सचिन की अतिविशिष्ट जिन्दगी की शुरुआत थी। आज सचिन 100 टैस्ट मैच खेलने वाला विश्व का 17वां खिलाड़ी बन चुका है। सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मैच खेला था। तब सचिन केवल 16 वर्ष का था और प्रथम पारी में वह बहुत ही नर्वस व घबराया हुआ था। सचिन को तब यूं महसूस हुआ था कि शायद वह जिन्दगी में आगे अन्तरराष्ट्रीय मैच और नहीं खेल सकेगा। अकरम और वकार की तेज गेंदों के सामने वह केवल 15 रन ही बना सका था। लेकिन दूसरे टेस्ट में जब उसे खेलने का मौका मिला तब उसने 59 रन बना लिए और उसके भीतर आत्मविश्वास जाग उठा। सचिन देखने में सीधा-सादा इंसान है। वह अति प्रसिद्ध हो जाने पर भी नम्र स्वभाव का है। वह अपने अच्छे व्यवहार का श्रेय अपने पिता को देता है। उसका कहना है- ”मैं जो कुछ भी हूं अपने पिता के कारण हूँ। उन्होंने मुझ में सादगी और ईमानदारी के गुण भर दिए हैं। वह मराठी साहित्य के शिक्षक थे और हमेशा समझाते थे कि जिन्दगी को बहुत गम्भीरता से जीना चाहिए। जब उन्हें अहसास हुआ कि शिक्षा नहीं, क्रिकेट मेंरे जीवन का हिस्सा बनने वाली है, उन्होंने उस बात का बुरा नहीं माना। उन्होंने मुझसे कहा कि ईमानदारी से खेलो और अपना स्तर अच्छे से अच्छा बनाए रखो। मेहनत से कभी मत घबराओ।” सचिन को भारतीय क्रिकेट टीम का कैप्टन बनाया गया था, परन्तु 2000 में उन्होंने मोहम्मद अजहरूद्दीन के आने के बाद वह पद छोड़ दिया।
सचिन, जिसे सुपर स्टार कहा जाता है, जीनियस कहा जाता है, जिसका एह-एक स्ट्रोक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, अपने पुराने मित्रों को आज भी नहीं भूला है चाहे वह विनोद काम्बली हो या संजय मांजरेकर। जब मुम्बई की टीम में सचिन ने खेलना आरम्भ किया था तो संजय ने राष्ट्रीय टीम की ओर से खेला था। ये दोनों पुराने मित्र हैं। क्रिकेट के अतिरिक्त सचिन को संगीत सुनना और फिल्में देखना पसन्द है। सचिन क्रिकेट को अपनी जिन्दगी और अपना खून मानते हैं। क्रिकेट के कारण प्रसिद्धि पा जाने पर वह किस चीज का आनन्द नहीं ले पाते-यह पूछने पर वह कहते हैं कि दोस्तों के साथ टेनिस की गेंद से क्रिकेट खेलना याद आता है। 29 वर्ष और 134 दिन की उम्र में सचिन ने अपना 100वां टैस्ट इंग्लैण्ड के खिलाफ खेला। 5 सितम्बर, 2002 को ओवल में खेले गए इस मैच से सचिन 100वां टैस्ट खेलने वाला सबसे कम उम्र का खिलाड़ी बन गया। सचिन के क्रिकेट खेल की औपचारिक शुरुआत तभी हो गई जब 12 वर्ष की उम्र में क्लब क्रिकेट (कांगा लीग) के लिए उसने खेला। सचिन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का ब्रांड एम्बेसडर बना है। एम. आर. एफ. टायर, पेप्सी, एडिडास, वीजा मास्टर कार्ड, फिएट पैलियो जैसी नामी कम्पनियों ने उसे अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया। बड़ी कम्पनियों में विज्ञापन के लिए उसकी सबसे ज्यादा मांग है। 1995 में सचिन ने 70 लाख पचास हजार (7.5 मिलियन) डालर का वर्ल्ड टेल कम्पनी के साथ 5 वर्षीय अनुबंध किया। इससे सचिन विश्व का सबसे धनी क्रिकेट खिलाड़ी बन गया। इसके पूर्व ब्रायनलारा ने ब्रिटेन की कम्पनी के साथ सर्वाधिक 10 लाख 20 हजार डॉलर का अनुबंध किया था। सचिन ने 2002 में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।
अन्तरराष्ट्रीय मैचों में 20000 रन बनाने वाला वह एकमात्र खिलाड़ी बन गया है। उसने 102 टेस्ट मैचों में खेली गई 162 पारी में 8461 रन बनाने के अतिरिक्त 300 एक दिवसीय मैचों में 11544 रन बनाने का रिकार्ड स्थापित किया है। उसके बारे में कहा जाता है वह विवियन रिचर्ड, मार्क वा, ब्रायन लारा सब को मिलाकर एक है। तेंदुलकर मानो एक आदमी की सेना है। वह शतक बनाता है, उसे गेंद दे दो, वह विकेट ले लेता है, वह टीम के अच्छे फील्डरों में से एक है। हम भाग्यशाली हैं कि वह भारतीय हैं। 25 मई, 1995 को सचिन ने डाक्टर अंजलि मेहता से विवाह कर लिया। उनके दो बच्चे हैं। बड़ी बच्ची का नाम “सराह” है जिसका अर्थ है किमती। एक छोटा बेटा है। सचिन की अंजलि से 1990 में मुलाकात हुई। सचिन ने एक बार इंटरव्यू में कहा था- ”मुझे उससे प्यार इसलिए हो गया क्योंकि उसके गाल गुलाबी हो उठते हैं।” सचिन का पूरा नाम सचिन रमेश तेंदुलकर है। उसका नाम उसके माता-पिता ने अपने पंसदीदा संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा। सचिन ने अपना पहला साक्षात्कार दादर के एक ईरानी रेस्टोरेंट में अपने बड़े भाई से दिलवाया था क्योंकि तब उसमें अधिक आत्मविश्वास नहीं था। सचिन को बचपन में क्रिकेट से कोई विशेष लगाव न था। क्रिकेट में शामिल होने पर वह तेज गेंदबाज बनना चाहता था, इसलिए डेनिस लिली से प्रशिक्षण के लिए एम. आर. एफ. पेस एकेडमी में गया। तब उसे बताया गया कि उसे बल्लेबाजी पर ध्यान लगाना चाहिए। सचिन को अपनी मां के हाथ का भोजन बहुत पसन्द है विशेषकर सी-फूड। इस कारण उसके आने पर वह विशेष रूप से मछली मंगवाती है।
सचिन के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य:-
मात्र बारह वर्ष की उम्र में सचिन ने क्लब क्रिक्रेट (कांगा लीग) में खेलना शुरू किया।
बाम्बे स्कूल क्रिकेट टूर्नामेंट में अपना पहला शतक 1936 में बनाया। फिर अगले वर्ष स्कूल क्रिकेट में 1200 रन बनाए जिनमें दो तिहरे शतक भी शामिल थे।
1988-89 में सचिन ने रणजी ट्राफी में बम्बई की तरफ से खेला और शतक बनाया। वह बम्बई की तरफ से खेलने वाला अब तक का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी था। अगले वर्ष वह ईरानी ट्राफी के लिए टीम में शामिल हुआ और 103 रन बनाए। उसके पश्चात् दलीप ट्राफी में शामिल होने पर पश्चिमी जोन की ओर पूर्वी जोन के विरुद्ध 151 रन बनाए। इस प्रकार तीनों देशीय टूर्नामेंट में प्रथम बार भाग लेने पर शतक लगाने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी बन गया।
जब सचिन और विनोद काम्बली ने मिल कर सेट जेवियर्स के विरुद्ध शारदाश्रम के 664 रन बनाए तब किसी भी क्रिकेट खेल के लिए यह विश्व रिकार्ड बन गया। इसमें सचिन ने 326 नाट आउट का स्कोर बनाया। फिर बाम्बे क्रिकेट की ओर से उसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी घोषित किया गया।
1991 में 18 वर्ष की आयु में सचिन यार्कशायर का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रथम खिलाड़ी बना। उस वर्ष उसे “वर्ष का क्रिकेटर” चुना गया।
1992 में वह पहला खिलाड़ी बना जिसे तीसरे अम्पायर द्वारा आउट करार दिया गया।
सचिन ने अपने खेल की शुरुआत से लगातार हर टैस्ट मैच खेला और लगातार 84 टैस्ट खेले।
सचिन 29 वर्ष 134 दिन की आयु में 100वां टैस्ट मैच खेलने वाला सबसे कम आयु का खिलाड़ी बना।
सचिन का पहला टैस्ट 1989 में कराची में हुआ जो कपिल का 100 वां टैस्ट मैच था।
जिन खिलाड़ियों ने 100 या अधिक टैस्ट मैच खेले हैं, उनमें सचिन का औसत सर्वाधिक है यानी 57.99 जब कि उसके बाद मियादाद का 57.57 है और गावस्कर का (51.12)।
“राजीव गाधी खेल रत्न” पुरस्कार पाने वाला वर्ष 2006 तक सचिन एकमात्र क्रिकेटर हैं।
1992 में 19 वर्ष की आयु में टैस्ट मैच में 1000 रन बनाने वाला सचिन विश्व का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी है।
20 वर्ष की आयु से पूर्व टैस्ट मैच में 5 शतक बनाने वाला सचिन प्रथम व एकमात्र खिलाड़ी है।
सचिन ने अपना पहला टैस्ट शतक इंग्लैंड के विरुद्ध बनाया। तब उसने 119 रन बनाए और नॉट आउट रहा। पाकिस्तान के मुश्ताक मोहम्मद के बाद सचिन सबसे कम आयु का दूसरा खिलाड़ी है।
अक्टूबर 2002 में सचिन 20000 रन बना कर अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इतने रन बनाने वाला विश्व का प्रथम बल्लेबाज बन गया।
जुलाई, 2002 में “विजडन” (लन्दन) द्वारा सचिन को “पीपुल्स च्वाइस” अवार्ड दिया गया।
सचिन दुनियां का सफलतम बल्लेबाज है। 10 दिसम्बर, 2005 को सचिन 38 शतकों के साथ वन डे में सर्वाधिक 13909 रन बनाने वाला खिलाड़ी बना।
अगस्त 2004 तक सचिन ने 69 अर्द्धशतक बनाकर पाकिस्तान के कप्तान इंजमाम उल-हक के एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक अर्द्धशतक की बराबरी कर ली। सचिन ने 339 मैचों में 69 अर्द्धशतक लगाए। जबकि इंजमाम ने 317 मैचों में 69 अर्धशतकशतक बनाए।
सचिन 38 शतक बनाकर विश्व रिकार्ड बना चुका है।
सचिन ने 339 मैचों में 13415 रन बना लिए और विश्व में एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी बने, तब तक इजंमाम 317 मैचों में 9897 रन बनाकर रन बनाने के मामले में दूसरे नम्बर पर थे।
सचिन से पूर्व अजहरुद्दीन ने सर्वाधिक 334 एक दिवसीय मैच खेले थे। सचिन ने अगस्त 2004 तक 339 मैच खेल कर अजहरुद्दीन के रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया और भारत का सर्वाधिक मैच खेलने वाला खिलाड़ी बन गया।
339 मैच खेलने के बाद भी सचिन विश्व में दूसरे नम्बर का खिलाड़ी है। विश्व का सर्वाधिक एक दिवसीय मैच खेलने वाला खिलाड़ी पाकिस्तान का पूर्व कप्तान वसीम अकरम है जिसने 356 मैच खेले।
50 बार वह “मैन ऑफ द मैच” का पुरस्कार जीत चुका है। यह एक रिकार्ड है।
10 दिसम्बर 2005 को सचिन ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटल मैदान पर टैस्ट मैचों में सर्वाधिक शतक (34 शतक) बनाने का सुनील गावस्कर का रिकार्ड तोड़ दिया और अपना 35वां शतक श्रीलंका के खिलाफ बनाया। इस टेस्ट मैच में उसने गावस्कर के 125 टैस्ट खेलने के रिकार्ड की भी बराबरी की।
टेस्ट मैच में दस हजार से अधिक रन बनाने वाले सचिन सबसे युवा खिलाड़ी हैं।
विज्ञापनों की दुनिया का उन्हें बादशाह कहा जाता है। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 2006 में उन्होंने आइकोनिक्स से 6 वर्ष के लिए 180 करोड़ का अनुबंध किया। इससे पूर्व उन्होंने वर्ल्ड टेल के साथ 5 वर्ष का 100 करोड़ का अनुबंध किया था।
वह वन डे में सर्वाधिक 13909 रन (दिसम्बर-2005 तक) बना चुके थे।
हीरो होंडा स्पोर्ट्स अकादमी ने वर्ष 2004 के लिए सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का श्रेष्ठतम खिलाड़ी नामांकित किया।
मई 2006 तक सचिन 132 टैस्ट मैचों में 19469 रन और 362 वन डे मैचों में 14146 रन बना चुके थे।
सचिन को अक्सर क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। सचिन से यह पूछे जाने पर कि उन्हें यह सुनकर कैसा लगता है, उनका कहना था- ”मैं देवता नहीं हूं। लेकिन खुशी मिलती है जब मेरे देश के लोग मुझ पर इतना भरोसा जताते हैं। मैं देश के भाई-बहनों के चेहरे पर मुस्कान ला सकूं इससे बड़ी बात क्या होगी। भगवान ने यह वरदान दिया है।
35वां शतक बनाने पर सचिन ने कहा- ”वैसे तो सभी शतक महत्त्वपूर्ण रहे हैं। मैने पहला शतक 17 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड के खिलाफ ओल्ड ट्रेफर्ड में जमाया था। पहला होने के कारण वह भी यादगार है और यह 35वां शतक भी सबसे यादगार रहेगा।” सचिन को भगवान में पूरा विश्वास है। साईं बाबा और गणपति के वह अनन्य भक्त हैं।
अमिताभ बच्चन
अमिताभ बच्चन की जीवनी
अमिताभ बच्चन
अमिताभ बच्चन का जन्म अक्टूबर 11, 1942 को उतरप्रदेश के जिले इलाहबाद में हिन्दू परिवार में हुआ और इनके बचपन का नाम “इन्कलाब” था जो बाद में बदल कर अमिताभ रख दिया गया। “इन्कलाब” नाम जो है वो आजादी की लड़ाई में इस्तेमाल होने वाले नारे “इन्कलाब जिंदाबाद“ से प्रेरित था। अमिताभ नाम का मतलब होता है “ऐसा दीपक जो कभी नहीं बुझे“। अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन जो खुद एक महशूर हिन्दी के कवि थे और उनकी माता तेजी बच्चन जो कराची से वास्ता रखती है ने ही उन्हें स्टेज की दुनिया में आने के प्रेरित किया। वैसे आपके जानने लायक एक दिलचस्प बात और भी है कि अमिताभ का उपनाम श्रीवास्तव है लेकिन इनके पिता ने अपनी रचनाओं को बच्चन नाम से प्रकाशित करवाया जिसके कारण उसके बाद पूरे परिवार के साथ यह नाम जुड़ गया।
करियर और फिल्म इंडस्ट्री:-
शुरू में अमिताभ के लिए चीजे आसान थी क्योंकि इन्हें फिल्मों की दुनिया में आने के लिए किसी भी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा और इसकी वजह है अमिताभ बच्चन की राजीव गाँधी से मित्रता होना क्योंकि इसी वजह से इंदिरा गाँधी के हाथ का लिखा सिफारिशी ख़त की वजह से उन्हें के ए अब्बास की फिल्म “सात हिन्दुस्तानी“ में आराम से काम करने का मौका मिल गया। वैसे हम यह कह सकते है कि ऐसा तो है कि अमिताभ ने अपने टैलेंट और अभिनय के दम पर इंडस्ट्री में बादशाह का मुकाम हासिल किया हो या किसी और भी पैमाने पर अमिताभ बच्चन को हम महान कह सकते है लेकिन एक बात तो है जितनी आसानी से अमिताभ को बॉलीवुड में काम मिला वो भी इंदिरा गाँधी के सिफारिशी ख़त की वजह से तो मेरे गले से अमिताभ को महान कहने की बात गले नहीं उतरती है क्योंकि अगर हम रणवीर सिंह (Ranveer singh) जैसे सितारों की बात करें तो मुझे तो उनके सरीखें सितारे ही महान लगते है आज के समय में जिन्होंने एक संघर्ष के बाद सितारा बनने का मुकाम हासिल किया है। हालाँकि अमिताभ ने फिल्मों में दुनिया में अपना हाथ अजमाने से पहले एक शिपिंग कम्पनी में नौकरी की थी और बाद में इनके माँ के द्वारा उत्साहित करने के बाद ये नौकरी छोड के मुंबई आ गये थे। वंहा इन्हें काम करने के लिए 800/- रूपये महीना वेतन मिलता था।
शिक्षा:-
अमिताभ बॉलीवुड के उन अभिनेताओं में भी है जिन्होंने अच्छी खासी पढ़ाई करी है क्योंकि बॉयज हाई स्कूल में पढ़ाई के बाद इन्होने शेरवूड कॉलेज जो नैनीताल में है से आर्ट में अपनी ग्रेजुएशन की हुई है साथ ही इसके बाद विज्ञानं में स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए दिल्ली के प्रसिद्द KMC कॉलेज से पढ़ाई की और इसके बाद MA के लिए ज्ञान प्रबोधिनी कॉलेज जो इलाहाबाद में है से की।
सफलता के लिए संघर्ष:-
वैसे अमिताभ को भले ही फिल्मों में आने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा लेकिन बाद के दिनों में चीजे इनके लिए मुश्किल थी और यही वजह है कि न केवल अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म ने कोई अच्छा प्रदर्शन कमाई के हिसाब से नहीं किया लेकिन इस फिल्म में इनकी भूमिका के लिए इन्हें “सर्वश्रेष्ठ नवागन्तुक अभिनेता“ के लिए पुरस्कार मिला और इसके बाद करीब सात साल तक के अपने संघर्ष में इन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली और तब तक ऐसा कहा जाता है कि वो निर्माता और निर्देशक महमूद साहब के घर में रुके।
स्टार बनने:-
स्टार बनने:-अमिताभ बच्चन की जिन्दगी में स्टार बनने के लिए महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 1973 में आई प्रकाश मेहरा की एक फिल्म में इन्हें एक इंस्पेक्टर का रोल मिला जिसमें इनके किरदार का नाम “इंस्पेक्टर खन्ना“ था और उस किरदार में अमिताभ बच्चन एकदम अलग तरह के रोल में थे और साथ ही इनकी भारी आवाज जिसके लिए इन्हें आल इंडिया रेडियो में बोलने वाले के पद के लिए निकाल दिया गया था वही इनकी खासियत भी बनी ऐसे में जनता के लिए अमिताभ का यह रूप बहुत पसंद आने वाला था और इसके बाद बॉलीवुड के एक्शन हीरो और “अंगरी यंगमैन“ की रूप में एक नई छवि अमिताभ की जनता के बीच में बनी जिसने इन्हें बेहद लोकप्रिय बना दिया। यह वही साल था जिसमें अमिताभ ने जय भादुड़ी से शादी करी और कह सकते है कि अमिताभ के साथ अब उनका “लेडी लक” भी था क्योंकि इसी साल अमिताभ बच्चन ने जया के साथ 3 जून को बंगाली संस्कार से विवाह भी किया था।
लाइफ चेंजिंग इवेंट्स:-
लाइफ चेंजिंग इवेंट्स:-1976 से लेकर 1984 तक अमिताभ को अपनी कई सारी कामयाब फिल्मों की वजह से बहुत सारे पुरस्कार भी मिले जिसमें उनकी बेहद कामयाब दीवार और शोले जैसी फिल्म भी है शोले तो बॉलीवुड के इतिहास में सबसे कामयाब फिल्मों में से एक है। यही एक वजह है कि अमिताभ फिल्म इंडस्ट्री के सबसे कामयाब और पहचान वाले अभिनेता और सबसे अधिक फिल्मफेयर अवार्ड्स पाने वाले अभिनेताओं में से एक है और साथ ही आपको बता दें कि अमिताभ ने अब तक तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और बारह सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल है और एक तरह से यह रिकॉर्ड है। 1984-1987 तक संसद के निर्वाचित सदस्य के रूप में भी इन्होने अपनी भूमिका दी है असल में 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद अपने दोस्त राजीव गाँधी की सलाह पर वो राजनीती में उतरे और इलाहाबाद की लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और राजनीती के चाणक्य कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा को हरा दिया लेकिन कुछ समय बाद ही यानि राजनीति में आने के तीन साल बाद ही अमिताभ बच्चन ने राजनीती को अलविदा कह दिया। अमिताभ बच्चन ने एक्टिंग के अलावा भी पार्श्वगायक के रूप में भी अपना योगदान दिया है साथ ही एक अच्छे विज्ञापन करता के रूप में भी अमिताभ की पहचान बनी हुई है और उम्र के इस दौर में भी जब वो 73 साल के हो चुके है अभी भी सक्रिय है। “कौन बनेगा करोडपति“ शो में भी इन्होने होस्ट के तौर पर काम किया है और अमिताभ बच्चन को पसंद करने वाले करोडो में है। अमिताभ ने 12 से अधिक फिल्मों में डबल रोल किया है और एक फिल्म “महान“ के लिए तो उन्होंने triple role भी किया है। आज के दिन में अमिताभ के पास एक खास मुकाम है और इसी वजह से इन्हें फ़्रांस के एक शहर द्युविले की मानद नागरिकता भी इनके योगदान को देखकर मिली है जो किसी भी विदेशी नागरिक के लिए न केवल सम्मान की बात है बल्कि बहुत ही दुर्लभ लोगों के पास ये है क्योंकि यह केवल ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के पास और पहली बार अंतरिक्ष में प्रवेश करने वाले रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गागारिन तथा पोप जॉन पॉल द्वितीय को ही दिया गया है।
बच्चों और परिवार:-
बच्चों और परिवार:-अमिताभ बच्चन की दो संताने है अभिषेक बच्चन और श्वेता नंदा बच्चन जिसमें से अभिषेक बच्चन भी खुद अभिनेता है और अभिषेक का विवाह ऐश्वर्या राय के साथ हुआ है जो बेहद खूबसूरत अभिनेत्री रह चुकी है और सलमान खान की एक्स – गर्लफ्रेंड भी रह चुकी है। हालाँकि एक्टिंग की दुनिया में अभिषेक का सिक्का जरुर नहीं चला लेकिन अगर लड़की के मामले में बात करें तो करोड़ो दिलो को धड़कन रह चुकी ऐश्वर्या को अपने हमसफ़र के रूप में पाने वाले अभिषेक बच्चन बेइंतिहा लकी है।
लव लाइफ और अफेयर्स:-
अमिताभ के अफेयर्स की बात करें तो सन 1978 में अमिताभ और रेखा की बीच बढती नजदीकियों को लेकर न केवल अमिताभ के घर में बहुत हंगामा हुआ बल्कि देशभर के अख़बारों में भी यह सुर्खियाँ बनती जा रही थी इस बारे में सुना गया है कि रेखा दिल ही दिल में अमिताभ बच्चन को बहुत पसंद करती थी लेकिन उन्होंने सही तरीके से कभी इसे जाहिर नहीं किया और न ही अमिताभ ने इस रिश्ते के बारे में कभी कुछ कहा जिसकी वजह से मामला रहस्मयी होता गया और शायद इसी वजह से जय ने रेखा को इस बारे में बात करने के लिए डिनर पर बुलाया था।
सामाजिक रूप से सक्रिय:-
अमिताभ बच्चन सोशल साइट्स पर भी काफी एक्टिव रहते है और अपने फेंस के साथ जुड़े रहने के लिए ब्लॉग और फेसबुक और ट्विटर पर भी काफी सक्रिय रहते है। अमिताभ बच्चन के बारे में शिवसेना प्रमुख रह चुके स्वर्गीय बाल ठाकरे यहाँ तक कह चुके है कि अमिताभ के योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न देना तो बनता है क्योंकि ऐसे भी देश है जहाँ लोग भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बारे में नहीं जानते लेकिन वो अमिताभ बच्चन को जानते है ऐसे में उन्हें भारत रत्न दिया जाना सही है साथ ही यह बात भी गौर करने लायक है कि उन्होंने यह बात ऐसे समय में कही थी जब महाराष्ट्र में मराठी बनाम उतर भारतीय विवाद चल रहा था।
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