Monday, January 19, 2026

वी.वी. गिरि

 

वी.वी. गिरि

 

★★★ जन्म :

10 अगस्त 1894, बहरामपुर, ब्रिटिश इंडिया

★★★ स्वर्गवास :

23 जून 1980, मद्रास, तमिल नाडु

★★★ कार्य क्षेत्र: श्रम आंदोलन के नेता, भारत के चौथे राष्ट्रपति :

भारतीय उद्योगों और अन्य क्षेत्रों में आज श्रमिकों के अधिकारों की जो बढ़ी हुई ताकत दिखाई देती है उसका श्रेय करिश्माई कार्यकर्ता और सामाज सुधारक वी.वी. गिरि को जाता है. हमें उनको धन्यवाद देना चाहिए कि उनके संघर्ष और नेतृत्व में श्रम-शक्ति ने एक नई दिशा और ताकत पायी, जिसके परिणामश्वरूप श्रमिकों के अधिकारों को आज कुचला नहीं जा सकता है. ब्रिटिश काल में सामाजिक  पतन कमजोर वर्गों के लिए चिंता का विषय था, परन्तु वी.वी. गिरि को यह विश्वास था कि सभी समस्याओं का व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण से समाधान किया जा सकता है.

उनका सपना था कि वे कानून के विशेषज्ञ बनें, परन्तु जब उन्हें आयरिश (आयरलैंड) राष्ट्रवादियों के प्रभाव में आने और गांधी के संपर्क में आने का मौका मिला, तो उन्होंने अपने देश के लिए काम करने का फैसला किया। उन्होंने महसूस किया कि अगर भारत की श्रम-शक्ति को संगठित किया जाय तो न केवल उनके हालत में सुधार किया जा सकता है बल्कि वे ब्रिटिश शासन से भारत की आजादी के संघर्ष में एक शक्तिशाली ताकत के रूप में काम आ सकते हैं.

★★★ वी.वी. गिरि का बचपन और प्रारंभिक जीवन :

वराह गिरि वेंकट गिरि (वी.वी.गिरि) का जन्म 10 अगस्त, 1894 को ओडिशा के बेहरामपुर में एक तेलुगू भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता वराह गिरि वेंकट जोगैया पांटुलु एक प्रतिष्ठित और समृद्ध वकील थे. उन्होंने अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा गृहनगर में पूरी की. अपनी कानून की शिक्षा के लिए उन्होंने वर्ष 1913 में डबलिन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. उसी वर्ष उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, वी.वी. गिरि उनके विचारों से काफी प्रभावित हुए और उन्हें यह एहसास हुआ कि कानून की शिक्षा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है देश की आजादी की लड़ाई. वर्ष 1916 में उन्होंने आयरलैंड के सिन्न फ़ाईन आंदोलन में सक्रीय रूप से भाग लिया.

परिणामतः वे अपनी कानून की शिक्षा पूरी करने में असमर्थ हो गए और उन्हें कॉलेज से निष्काषित कर दिया गया. यह आयरलैंड की आजादी और श्रमिकों का आंदोलन था, जिसके पीछे वहां के कुछ क्रांतिकारी विचारधारा वाले लोगों जैसे- डी. वालेरा, कोलिन्स, पेअरी, डेसमंड फिजराल्ड़, मेकनेल और कोनोली का हाथ था. उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उनसे मुलाकात की. इस आन्दोलन से प्रभावित होकर वे ऐसे आंदोलनों की आवश्यकता भारत में भी महसूस करने लगे. इसके बाद वी.वी. गिरि भारत लौट आए और सक्रिय रूप से श्रमिक आंदोलनों में भाग लेना शुरू किए, बाद में वे श्रमिक संगठन के महासचिव नियुक्त किये गए. उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों में भी सक्रीय रूप से भाग लिया.

★★★ आजादी से पूर्व वी.वी. गिरि की गतिविधियां :

वर्ष 1922 तक वी.वी. गिरि श्रमिकों के हित में काम करने वाले एन.एम. जोशी के एक विश्वसनीय सहयोगी बन गए थे और अपने गुरु (जोशी) के समर्थन से उन्होंने  मजदूर वर्ग की भलाई के लिए कार्य कर रहे संगठनों के साथ खुद को जोड़ा. ट्रेड यूनियन आंदोलन के लिए अपनी प्रतिबद्धता और मेहनत के कारण वे आल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष निर्वाचित किये गए. उन्होंने दो बार क्रमशः वर्ष 1926 और 1942 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया. उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन की दिशा में विभिन्न ट्रेड यूनियनों में अपनी पहुंच के कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

वर्ष 1931-1932 में एक प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया. वे वर्ष 1934 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य के रूप में चुने गए. वे कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में वर्ष 1936 के आम चुनाव (ब्रिटिश कालीन) में खड़े हुए और इसके साथ ही राजनीति से उनका वास्ता शुरू हुआ. उन्होंने चुनाव जीता और अगले वर्ष मद्रास प्रेसीडेंसी में उन्हें श्रम और उद्योग मंत्री बना दिया. जब ब्रिटिश शासन में कांग्रेस सरकार ने वर्ष 1942 में इस्तीफा दे दिया, तो वी.वी. गिरि भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए श्रमिक आंदोलन में लौट आए. उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. इसके बाद वर्ष 1946 के आम चुनाव के बाद वे श्रम मंत्री बनाए गए.

★★★ आजादी के बाद वी.वी. गिरि की गतिविधियां :

भारत की स्वतंत्रता के बाद वी.वी. गिरि को उच्चायुक्त के रूप में सीलोन (श्रीलंका) भेजा गया था. वहाँ से अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वे भारत लौट आए और पहली लोकसभा के लिए वर्ष 1952 में चुने गए तथा वर्ष 1957 तक कार्य किया. इस दौरान गिरि को केंद्रीय मंत्रिमंडल का सदस्य बनाया गया और वे भारत के श्रम मंत्री बने. वे इस मंत्रालय में वर्ष 1952 से 1954 तक बने रहे. लोकसभा में अपना  कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्हें प्रतिष्ठित शिक्षाविदों के समूह का नेतृत्व करने, श्रम एवं औद्योगों से संबंधित मामलों के अध्ययन और प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने का कार्य सौंपा गया.

उनके प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1957 में द इंडियन सोसाइटी ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स की स्थापना की गयी. भारतीय राजनीति में सक्रियता के बाद उन्होंने वर्ष 1957-1960 तक उत्तर प्रदेश, फिर 1960-1965 तक केरल और अंत में 1965-1967 तक मैसूर के राज्यपाल के रूप कार्य किया. वर्ष 1957 में जब राज्यपाल बने, उसके बाद भी वे इंडियन कांफ्रेंस ऑफ़ सोशल वर्क के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे. उन्हें वर्ष 1967 में भारत के उप-राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित किया गया.

★★★ राष्ट्रपति के रूप में उनका योगदान :

वर्ष 1969 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन का निधन हो गया, तो उसके उपरांत वी.वी. गिरि को भारत का कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया. उसके बाद वे अपनी पार्टी के सदस्यों के मामूली विरोध के बाद भारत के चौथे राष्ट्रपति बने और वर्ष 1974 तक देश की सेवा की. जीवन पर्यंत वे अपने भाषण कौशल के लिए विख्यात रहे. वे एक निपुण लेखक भी थे, उन्होंने इंडस्ट्रियल रिलेशन और लेबर प्रॉब्लम इन इंडियन इंडस्ट्री नामक पुस्तकें भी लिखी.

★★★ सम्मान और विरासत :

भारत सरकार ने उनके योगदान और उपलब्धियों के मद्दे नजर उन्हें वर्ष 1975 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत-रत्न देकर सम्मानित किया. वर्ष 1974 में भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने श्रम से संबंधित मुद्दों पर शोध, प्रशिक्षण, शिक्षा, प्रकाशन और परामर्श के लिए एक स्वायत्त संस्था की स्थापना की. इस संस्था का नाम वर्ष 1995 में उनके सम्मान में वी.वी. गिरि नेशनल लेबर इंस्टिट्यूट रखा गया. उन्हें श्रमिकों के उत्थान और उनके अधिकारों के संरक्षण की दिशा में काम करने लिए एक मुखर कार्यकर्ता के रूप में हमेशा याद किया जाएगा.

★★★ निजी जिंदगी और निधन :

वी.वी. गिरि की विवाह अल्पायु में ही सरस्वती बाई से करा दिया गया था. 85 वर्ष की अवस्था में 23 जून 1980 को उनका निधन चेन्नई में हो गया.


राम मनोहर लोहिया

राम मनोहर लोहिया

 

★★★ जन्म :

23 मार्च, 1910, अकबरपुर, फैजाबाद

★★★ स्वर्गवास :

12 अक्टूबर, 1967, नई दिल्ली

★★★ कार्य क्षेत्र: स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता :

राम मनोहर लोहिया एक स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर समाजवादी और सम्मानित राजनीतिज्ञ थे. राम मनोहर ने हमेशा सत्य का अनुकरण किया और आजादी की लड़ाई में अद्भुत काम किया. भारत की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद ऐसे कई नेता आये जिन्होंने अपने दम पर राजनीति का रुख़ बदल दिया उन्ही नेताओं में एक थे राममनोहर लोहिया। वे अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्‍वी समाजवादी विचारों के लिए जाने गए और इन्ही गुडों के कारण अपने समर्थकों के साथ-साथ उन्होंने अपने विरोधियों से भी बहुत  सम्‍मान हासिल किया।

★★★ बचपन और प्रारंभिक जीवन :

राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में हुआ था. उनकी मां एक शिक्षिका थीं. जब वे बहुत छोटे थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था. अपने पिता से जो एक राष्ट्रभक्त थे, उन्हें युवा अवस्था में ही विभिन्न रैलियों और विरोध सभाओं के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेने की प्रेरणा मिली. उनके जीवन में नया मोड़ तब आया, जब एक बार उनके पिता, जो महात्मा गांधी के घनिष्ठ अनुयायी थे, गांधी से मिलाने के लिए राम मनोहर को अपने साथ लेकर गए. राम मनोहर गांधी के व्यक्तित्व और सोच से बहुत प्रेरित हुए तथा जीवनपर्यन्त गाँधी जी के आदर्शों का समर्थन किया.

वर्ष 1921 में वे पंडित जवाहर लाल नेहरू से पहली बार मिले और कुछ वर्षों तक उनकी देखरेख में कार्य करते रहे. लेकिन बाद में उन दोनों के बीच विभिन्न मुद्दों और राजनीतिक सिद्धांतों को लेकर टकराव हो गया. 18 साल की उम्र में वर्ष 1928 में युवा लोहिया ने ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए प्रदर्शन का आयोजन किया. उन्होंने अपनी मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद इंटरमीडिएट में दाखिला बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कराया. उसके बाद उन्होंने वर्ष 1929 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और पीएच.डी. करने के लिए बर्लिन विश्वविद्यालय, जर्मनी, चले गए, जहाँ से उन्होंने वर्ष 1932 में इसे पूरा किया. वहां उन्होंने शीघ्र ही जर्मन भाषा सीख लिया और उनको उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए वित्तीय सहायता भी मिली.

★★★ राम मनोहर लोहिया की विचारधारा :

लोहिया ने हमेशा भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में अंग्रेजी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी. उनका विश्वाश था कि अंग्रेजी शिक्षित और अशिक्षित जनता के बीच दूरी पैदा करती है. वे कहते थे कि हिन्दी के उपयोग से एकता की भावना और नए राष्ट्र के निर्माण से सम्बन्धित विचारों को बढ़ावा मिलेगा. वे जात-पात के घोर विरोधी थे. उन्होंने जाति व्यवस्था के विरोध में सुझाव दिया कि “रोटी और बेटी” के माध्यम से इसे समाप्त किया जा सकता है.

वे कहते थे कि सभी जाति के लोग एक साथ मिल-जुलकर खाना खाएं और उच्च वर्ग के लोग निम्न जाति की लड़कियों से अपने बच्चों की शादी करें. इसी प्रकार उन्होंने अपने यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी में उच्च पदों के लिए हुए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवारों को दिया और उन्हें प्रोत्साहन भी दिया. वे ये भी चाहते थे कि बेहतर सरकारी स्कूलों की स्थापना हो, जो सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान कर सकें.

★★★ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान :

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की उनकी बचपन से ही प्रबल इच्छा थी जो बड़े होने पर भी खत्म नहीं हुई। जब वे यूरोप में थे तो उन्होंने वहां एक क्लब बनाया जिसका नाम असोसिएशन ऑफ़ यूरोपियन इंडियंस रखा. जिसका उद्देश्य यूरोपीय भारतीयों के अंदर भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता पैदा करना था. उन्होंने जिनेवा में लीग ऑफ नेशन्स की सभा में भी भाग लिया, यद्यपि भारत का प्रतिनिधित्व ब्रिटिश राज्य के एक सहयोगी के रूप में बीकानेर के महाराजा द्वारा किया गया था, परन्तु लोहिया इसके अपवाद थे.

उन्होंने दर्शक गैलरी से विरोध प्रदर्शन शुरू किया और बाद में अपने विरोध के कारणों को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने समाचार-पत्र और पत्रिकाओं के संपादकों को कई पत्र लिखे. इस पूरी घटना ने रातों-रात राम मनोहर लोहिया को भारत में एक सुपर स्टार बना दिया। भारत वापस आने पर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और वर्ष 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी. वर्ष 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया.

24 मई, 1939 को लोहिया को उत्तेजक बयान देने और देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए लिए पहली बार गिरफ्तार किया गया, पर युवाओं के विद्रोह के डर से उन्हें अगले ही दिन रिहा कर दिया गया. हालांकि जून 1940 में उन्हें “सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने के आरोप में पुनः गिरफ्तार किया गया और दो वर्षों के लिए कारावास भेज दिया गया. बाद में उन्हें दिसम्बर 1941 में आज़ाद कर दिया गया. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में महात्मा गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद और वल्लभभाई पटेल जैसे कई शीर्ष नेताओं के साथ उन्हें भी कैद कर लिया गया था.

इसके बाद भी वे दो बार जेल गए, एक बार उन्हें मुंबई में गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेजा गया था और दूसरी बार पुर्तगाली सरकार के खिलाफ भाषण और सभा करने के आरोप में गोवा. जब भारत स्वतंत्र होने के करीब था तो उन्होंने दृढ़ता से अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से देश के विभाजन का विरोध किया था. वे देश का विभाजन हिंसा से करने के खिलाफ थे. आजादी के दिन जब सभी नेता 15 अगस्त, 1947 को दिल्ली में इकट्ठे हुए थे, उस समय वे भारत के अवांछित विभाजन के प्रभाव के शोक की वजह से अपने गुरु (महात्मा गाँधी) के साथ दिल्ली से बाहर थे.

★★★ स्वतंत्रता के बाद की गतिविधियाँ :

आजादी के बाद भी वे राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ही अपना योगदान देते रहे. उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील की कि वे कुओं, नहरों और सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए योगदान में भाग लें. तीन आना, पन्द्रह आना के माध्यम से राम मनोहर लोहिया ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर होने वाले खर्च की राशि “एक दिन में 25000 रुपए” के खिलाफ आवाज उठाई जो आज भी चर्चित है. उस समय भारत की अधिकांश जनता की एक दिन की आमदनी मात्र 3 आना थी जबकि भारत के योजना आयोग के आंकड़े के अनुसार प्रति व्यक्ति औसत आय 15 पन्द्रह आना था.

लोहिया ने उन मुद्दों को उठाया जो लंबे समय से राष्ट्र की सफलता में बाधा उत्पन्न कर रहे थे. उन्होंने अपने भाषण और लेखन के माध्यम से जागरूकता पैदा करने, अमीर-गरीब की खाई, जातिगत असमानताओं और स्त्री-पुरुष असमानताओं को दूर करने का प्रयास किया. उन्होंने कृषि से सम्बंधित समस्याओं के आपसी निपटारे के लिए हिन्द किसान पंचायत का गठन किया। वे सरकार की केंद्रीकृत योजनों को जनता के हाथों में देकर अधिक शक्ति प्रदान करने के पक्षधर थे. अपने अंतिम कुछ वर्षों के दौरान उन्होंने देश की युवा पीढ़ी के साथ राजनीति, भारतीय साहित्य और कला जैसे विषयों पर चर्चा किया.

★★★ निधन :

राम मनोहर लोहिया का निधन 57 साल की उम्र में 12 अक्टूबर, 1967 को नई दिल्ली में हो गया.


|

विक्रम साराभाई

विक्रम साराभाई

 

★★★ जन्म :

 

12 अगस्त, 1919, अहमदाबाद

 

★★★ स्वर्गवास :

 

30 दिसम्बर, 1971, तिरुवनंतपुरम

 

★★★ उपलब्धियां :

 

विक्रम साराभाई को भारत के 'अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक' माना जाता है। इनका पूरा नाम 'डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई' था। इन्होंने भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊँचाईयों पर पहुँचाया और अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर देश की उपस्थिति दर्ज करा दी। विक्रम साराभाई ने अन्य क्षेत्रों में भी समान रूप से पुरोगामी योगदान दिया। वे अंत तक वस्त्र, औषधीय, परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार काम करते रहे थे। डॉ. साराभाई एक रचनात्मक वैज्ञानिक, एक सफल और भविष्यदृष्टा उद्योगपति, सर्वोच्च स्तर के प्रर्वतक, एक महान संस्थान निर्माता, एक भिन्न प्रकार के शिक्षाविद, कला के पारखी, सामाजिक परिवर्तन के उद्यमी, एक अग्रणी प्रबंधन शिक्षक तथा और बहुत कुछ थे।

★★★ जन्म तथा शिक्षा :

 

डॉ. साराभाई का जन्म पश्चिमी भारत में गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में 1919 को हुआ था। साराभाई परिवार एक महत्त्वपूर्ण और संपन्न जैन व्यापारी परिवार था। उनके पिता अंबालाल साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे तथा गुजरात में कई मिलों के स्वामी थे। विक्रम साराभाई, अंबालाल और सरला देवी के आठ बच्चों में से एक थे। अपनी इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा पास करने के बाद साराभाई ने अहमदाबाद में गुजरात कॉलेज से मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की।

 

उसके बाद वे इंग्लैंड चले गए और 'केम्ब्रिज विश्वविद्यालय' के सेंट जॉन कॉलेज में भर्ती हुए। उन्होंने केम्ब्रिज से 1940 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपॉस हासिल किया। 'द्वितीय विश्वयुद्ध' के बढ़ने के साथ साराभाई भारत लौट आये और बेंगलोर के 'भारतीय विज्ञान संस्थान' में भर्ती हुए तथा नोबेल पुरस्कार विजेता सी. वी. रामन के मार्गदर्शन में ब्रह्मांडीय किरणों में अनुसंधान शुरू किया। विश्वयुद्ध के बाद 1945 में वे केम्ब्रिज लौटे और 1947 में उन्हें उष्णकटिबंधीय अक्षांश में कॉस्मिक किरणों की खोज शीर्षक वाले अपने शोध पर पी.एच.डी की डिग्री से सम्मानित किया गया।

★★★ भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक :

 

साराभाई को 'भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक' माना जाता है। वे महान संस्थान निर्माता थे और उन्होंने विविध क्षेत्रों में अनेक संस्थाओं की स्थापना की या स्थापना में मदद की थी। अहमदाबाद में 'भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला' की स्थापना में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, केम्ब्रिज से 1947 में आज़ाद भारत में वापसी के बाद उन्होंने अपने परिवार और मित्रों द्वारा नियंत्रित धर्मार्थ न्यासों को अपने निवास के पास अहमदाबाद में अनुसंधान संस्थान को धन देने के लिए राज़ी किया।

 

इस प्रकार 11 नवम्बर, 1947 को अहमदाबाद में विक्रम साराभाई ने 'भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला' (पीआरएल) की स्थापना की। उस समय उनकी उम्र केवल 28 वर्ष थी। साराभाई संस्थानों के निर्माता और संवर्धक थे और पीआरएल इस दिशा में पहला क़दम था। विक्रम साराभाई ने 1966-1971 तक पीआरएल की सेवा की।

★★★ संस्थानों की स्थापना :

 

'परमाणु ऊर्जा आयोग' के अध्यक्ष पद पर भी विक्रम साराभाई रह चुके थे। उन्होंने अहमदाबाद में स्थित अन्य उद्योगपतियों के साथ मिल कर 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट', अहमदाबाद की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. साराभाई द्वारा स्थापित कतिपय सुविख्यात संस्थान इस प्रकार हैं:

 

1. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद

 

2. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आईआईएम), अहमदाबाद

 

3. कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद

 

4. दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफ़ार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद

 

5. विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम

 

6. स्पेस अप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद

 

7. फ़ास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफ़बीटीआर), कल्पकम

 

8. वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रॉजेक्ट, कोलकाता

 

9. इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल), हैदराबाद

 

10. यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल), जादूगुडा, बिहार

★★★ 'इसरो' की स्थापना :

 

'भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन' (इसरो) की स्थापना उनकी महान उपलब्धियों में एक थी। रूसी स्पुतनिक के प्रमोचन के बाद उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सरकार को राज़ी किया। डॉ. साराभाई ने अपने उद्धरण में अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर ज़ोर दिया था :

ऐसे कुछ लोग हैं, जो विकासशील राष्ट्रों में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे सामने उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है। हम चंद्रमा या ग्रहों की गवेषणा या मानव सहित अंतरिक्ष-उड़ानों में आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्धा की कोई कल्पना नहीं कर रहें हैं, लेकिन हम आश्वस्त हैं कि अगर हमें राष्ट्रीय स्तर पर और राष्ट्रों के समुदाय में कोई सार्थक भूमिका निभानी है, तो हमें मानव और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों को लागू करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए।

★★★ परमाणु विज्ञान कार्यक्रम :

 

भारतीय परमाणु विज्ञान कार्यक्रम के जनक के रूप में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने भारत में प्रथम राकेट प्रमोचन केंद्र की स्थापना में डॉ. साराभाई का समर्थन किया। यह केंद्र मुख्यतः भूमध्य रेखा से उसकी निकटता की दृष्टि से अरब महासागर के तट पर, तिरुवनंतपुरम के निकट थुम्बा में स्थापित किया गया। अवसंरचना, कार्मिक, संचार लिंक और प्रमोचन मंचों की स्थापना के उल्लेखनीय प्रयासों के बाद 21 नवम्बर, 1963 को सोडियम वाष्प नीतभार सहित उद्घाटन उड़ान प्रमोचित की गयी।

★★★ अन्य योगदान :

 

डॉ. साराभाई विज्ञान की शिक्षा में अत्यधिक दिलचस्पी रखते थे। इसीलिए उन्होंने 1966 में सामुदायिक विज्ञान केंद्र की स्थापना अहमदाबाद में की। आज यह केंद्र 'विक्रम साराभाई सामुदायिक विज्ञान केंद्र' कहलाता है। 1966 में नासा के साथ डॉ. साराभाई के संवाद के परिणामस्वरूप जुलाई, 1975 से जुलाई, 1976 के दौरान 'उपग्रह अनुदेशात्मक दूरदर्शन परीक्षण' (एसआईटीई) का प्रमोचन किया गया। डॉ. साराभाई ने भारतीय उपग्रहों के संविरचन और प्रमोचन के लिए परियोजनाएँ प्रारंभ कीं। इसके परिणामस्वरूप प्रथम भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट, रूसी कॉस्मोड्रोम से 1975 में कक्षा में स्थापित किया गया।

★★★ मृत्यु :

 

अंतरिक्ष की दुनिया में भारत को बुलन्दियों पर पहुँचाने वाले और विज्ञान जगत में देश का परचम लहराने वाले इस महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई की मृत्यु 30 दिसम्बर, 1971 को कोवलम, तिरुवनंतपुरम, केरल में हुई।

★★★ पुरस्कार :

 

1. शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार (1962)

 

2. पद्मभूषण (1966)

 

3. पद्मविभूषण, मरणोपरांत (1972)

★★★ महत्त्वपूर्ण पद :

 

1. भौतिक विज्ञान अनुभाग, भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष ([1962)

 

2. आई.ए.ई.ए., वेरिना के महा सम्मलेनाध्यक्ष (1970)

 

3. उपाध्यक्ष, 'परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग' पर चौथा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1971)

★★★ सम्मान :

 

रॉकेटों के लिए ठोस और द्रव नोदकों में विशेषज्ञता रखने वाले अनुसंधान संस्थान, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) का नामकरण उनकी स्मृति में किया गया, जो केरल राज्य की राजधानी तिरूवनंतपुरम में स्थित है। 1974 में सिडनी में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने निर्णय लिया कि सी ऑफ़ सेरिनिटी में स्थित 'चंद्रमा क्रेटर बेसेल' (बीईएसएसईएल) डॉ. साराभाई क्रेटर के रूप में जाना जाएगा।



राजेन्द्र प्रसाद

 

राजेन्द्र प्रसाद

 

★★★ जन्म :

 

3 दिसम्बर, 1884, जीरादेयू, बिहार

 

★★★ स्वर्गवास :

 

28 फ़रवरी, 1963, सदाकत आश्रम, पटना

 

★★★ उपलब्धियां :

 

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। राजेन्द्र प्रसाद बेहद प्रतिभाशाली और विद्वान व्यक्ति थे। राजेन्द्र प्रसाद, भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे जिन्होंने दो कार्यकालों तक राष्ट्रपति पद पर कार्य किया।

★★★ जन्म :

 

बिहार प्रान्त के एक छोटे से गाँव जीरादेयू में 3 दिसम्बर, 1884 में राजेन्द्र प्रसाद का जन्म हुआ था। एक बड़े संयुक्त परिवार के राजेन्द्र प्रसाद सबसे छोटे सदस्य थे, इसलिए वह सबके दुलारे थे। राजेन्द्र प्रसाद के परिवार के सदस्यों के सम्बन्ध गहरे और मृदु थे। राजेन्द्र प्रसाद को अपनी माता और बड़े भाई महेन्द्र प्रसाद से बहुत स्नेह था। जीरादेयू गाँव की आबादी मिश्रित थी। मगर सब लोग इकट्ठे रहते थे। राजेन्द्र प्रसाद की सबसे पहली याद अपने हिन्दू और मुसलमान दोस्तों के साथ 'चिक्का और कबड्डी' खेलने की है।

 

किशोरावस्था में उन्हें होली के त्योहार का इंतज़ार रहता था और उसमें उनके मुसलमान दोस्त भी शामिल रहते थे और मुहर्रम पर हिन्दू ताज़िये निकालते थे। 'राजेन बाबू' (राजेन्द्र प्रसाद) को गाँव के मठ में रामायण सुनना और स्थानीय रामलीला देखना बड़ा अच्छा लगता था। घर का वातावरण भी ईश्वर पर पूर्ण विश्वास का था। राजेन्द्र प्रसाद की माता बहुत बार उन्हें रामायण से कहानियाँ सुनातीं और भजन भी गाती थी। उनके चरित्र की दृढ़ता और उदार दृष्टिकोण की आधारशिला बचपन में ही रखी गई थी।

★★★ विवाह :

 

गाँव का जीवन पुरानी परम्पराओं से भरपूर था। इनमें से एक रिवाज था- बाल विवाह और परम्परा के अनुसार राजेन्द्र प्रसाद का विवाह भी केवल बारह वर्ष की आयु में हो गया था। यह एक विस्तृत अनुष्ठान था जिसमें वधू के घर पहुँचने में घोड़ों, बैलगाड़ियों और हाथी के जुलूस को दो दिन लगे थे। वर एक चांदी की पालकी में, जिसे चार आदमी उठाते थे, सजे-धजे बैठे थे। रास्ते में उन्हें एक नदी भी पार करनी थी। बरातियों को नदी पार कराने के लिए नाव का इस्तेमाल किया गया। घोड़े और बैलों ने तैरकर नदी पार की, मगर इकलौते हाथी ने पानी में उतरने से इंकार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हाथी को पीछे ही छोड़ना पड़ा और राजेन्द्र प्रसाद के पिता जी 'महादेव सहाय' को इसका बड़ा दुख हुआ।

 

अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने से दो मील पहले उन्होंने किसी अन्य विवाह से लौटते दो हाथी देखे। उनसे लेनदेन तय हुआ और परम्परा के अनुसार हाथी फिर विवाह के जुलूस में शामिल हो गए। किसी तरह से यह जुलूस मध्य रात्रि को वधू के घर पहुँचा। लम्बी यात्रा और गर्मी से सब बेहाल हो रहे थे और वर तो पालकी में ही सो गये थे। बड़ी कठिनाई से उन्हें विवाह की रस्म के लिए उठाया गया। वधू, राजवंशी देवी, उन दिनों के रिवाज के अनुसार पर्दे में ही रहती थी। छुट्टियों में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने या उससे बोलने का राजेन्द्र प्रसाद को बहुत ही कम अवसर मिलता था।

राजेन्द्र प्रसाद बाद में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गए। तब वह पत्नी से और भी कम मिल पाते थे। वास्तव में विवाह के प्रथम पचास वर्षों में शायद पति-पत्नी पचास महीने ही साथ-साथ रहे होंगे। राजेन्द्र प्रसाद अपना सारा समय काम में बिताते और पत्नी बच्चों के साथ जीरादेयू गाँव में परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहती थीं।

★★★ मातृभूमि के लिए समर्पित :

 

राजेन्द्र प्रसाद प्रतिभाशाली और विद्वान थे और कलकत्ता के एक योग्य वकील के यहाँ काम सीख रहे थे। राजेन्द्र प्रसाद का भविष्य एक सुंदर सपने की तरह था। राजेन्द्र प्रसाद का परिवार उनसे कई आशायें लगाये बैठा था। वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद के परिवार को उन पर गर्व था। लेकिन राजेन्द्र प्रसाद का मन इन सब में नहीं था। राजेन्द्र प्रसाद केवल धन और सुविधायें पाने के लिए आगे पढ़ना नहीं चाहते थे। एकाएक राजेन्द्र प्रसाद की दृष्टि में इन चीज़ों का कोई मूल्य नहीं रह गया था। राष्ट्रीय नेता गोखले के शब्द राजेन्द्र प्रसाद के कानों में बार-बार गूँज.



लाल बहादुर शास्त्री

 

लाल बहादुर शास्त्री

 

★★★ जन्म :

2 अक्टूबर, 1904

★★★ स्वर्गवास :

10 जनवरी, 1966

★★★ उपलब्धियां :

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत के संसदीय सचिव, पंत मंत्रिमंडल में पुलिस और परिवहन मंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेलवे और परिवहन मंत्री, केन्द्रीय मंत्रिमंडल में परिवहन और संचार, वाणिज्य और उद्योग,1964 में भारत के प्रधान मंत्री बने

लाल बहादुर शास्त्री स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। शारीरिक कद में छोटे होने के बावजूद भी वह महान साहस और इच्छाशक्ति के व्यक्ति थे। पाकिस्तान के साथ 1965 केयुद्ध के दौरान उन्होंने सफलतापूर्वक देश का नेतृत्व किया। युद्ध के दौरान देश को एकजुट करने के लिए उन्होंने “जय जवान जय किसान का नारा दिया। आज़ादी से पहले उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने बड़ी सादगी और ईमानदारी के साथ अपना जीवन जिया और सभी देशवासियों के लिए एक प्रेरणा के श्रोत बने।

★★★ प्रारंभिक जीवन :

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुग़लसराय में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद और माँ रामदुलारी देवी थीं। लाल बहादुर का उपनाम श्रीवास्तव था पर उन्होंने इसे बदल दिया क्योंकि वह अपनी जाति को अंकित करना नहीं चाहते थे। लाल बहादुर के पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और बाद में वह इलाहबाद के आयकर विभाग में क्लर्क बन गए। गरीब होने के वाबजूद भी शारदा प्रशाद अपनी ईमानदारी और शराफत के लिए जाने जाते थे। लाल बहादुर केवल एक वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया। तत्पश्चात रामदुलारी देवी ने लाल बहादुर और अपनी दो पुत्रियों का पालन पोषण अपने पिता के घर पर किया।

जब लाल बहादुर छः वर्ष के थे तब एक दिलचस्प घटना घटी। एक दिन विद्यालय से घर लौटते समय लाल बहादुर और उनके दोस्त एक आम के बगीचे में गए जो उनके घर के रास्ते में ही पड़ता था। उनके दोस्त आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ गए जबकि लाल बहादुर निचे ही खड़े रहे। इसी बीच माली आ गया और उसने लालबहादुर को पकड़कर डांटा और पीटना शुरू कर दिया। बालक लाल बहादुर ने माली से निवेदन किया कि वह एक अनाथ है इसलिए उन्हें छोड़ दें। बालक पर दया दिखाते हुए माली ने कहा “चूँकि तुम एक अनाथ हो इसलिए यह सबसे जरुरी है कि तुम बेहतर आचरण सीखो” इन शब्दों ने उन पर एक गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने भविष्य में बेहतर व्यवहार करने की कसम खाई।

लाल बहादुर अपने दादा के घर पर 10 साल की उम्र तक रुके। तब तक उन्होंने कक्षा छः की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह वाराणसी गए।

★★★ राजनैतिक जीवन :

1921 में जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन की शुरुआत की तब लाल बहादुर शास्त्री मात्र 17 साल के थे। जब महात्मा गांधी ने युवाओं को सरकारी स्कूलों और कॉलेजों, दफ्तरों और दरबारों से बाहर आकर आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर करने का आह्वान किया तब उन्होंने अपना स्कूल छोड़ दिया। हांलाकि उनकी माताजी और रिश्तेदारों ने ऐसा न करने का सुझाव दिया पर वो अपने फैसले पर अटल रहे। लाल बहादुर को असहयोग आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया पर कम उम्र के कारण उन्हें छोड़ दिया गया।

जेल से छूटने के पश्चात लाल बहादुर ने काशी विद्यापीठ में चार साल तक दर्शनशास्त्र की पढाई की। वर्ष 1926 में लाल बहादुर ने “शास्त्री” की उपाधि प्राप्त कर ली। काशी विद्यापीठ छोड़ने के पश्चात वो “द सर्वेन्ट्स ऑफ़ द पीपल सोसाइटी” से जुड़ गए जिसकी शुरुआत 1921 में लाला लाजपत राय द्वारा की गयी थी। इस सोसाइटी का प्रमुख उद्देश्य उन युवाओं को प्रशिक्षित करना था जो अपना जीवन देश की सेवा में समर्पित करने के लिए तैयार थे। 1927 में लाल बहादुर शास्त्री का विवाह ललिता देवी के साथ हुआ। विवाह संस्कार काफी साधारण तरीके से हुआ।

1930 में गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया और लाल बहादुर भी इस आंदोलन से जुड़े और लोगों को सरकार को भू-राजस्व और करों का भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और ढाई साल के लिए जेल भेज दिया गया। जेल में वो पश्चिमी देशों के दार्शनिकों, क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों के कार्यों से परिचित हुए। वह बहुत ही आत्म सम्मानी व्यक्ति थे। एक बार जब वह जेल में थे उनकी एक बेटी गंभीर रूप से बीमार हो गयी।

अधिकारीयों ने उन्हें कुछ समय के लिए इस शर्त पर रिहा करने की सहमति जताई कि वह यह लिख कर दें कि वह इस दौरान किसी भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लेंगे। लाल बहादुर जेल से कुछ समय के लिए रिहा होने के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के इच्छुक नहीं थे फिर भी उन्होंने कहा कि वह यह बात लिख कर नहीं देंगे। उनका मानना था कि लिखित रूप में देना उनके आत्म सम्मान के विरुद्ध है।

1939 में दूसरे विश्व युद्ध शुरू होने के बाद सन 1940 में कांग्रेस ने आजादी कि मांग करने के लिए “एक जन आंदोलन” प्रारम्भ किया। लाल बहादुर शास्त्री को जन आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल के बाद रिहा किया गया। 8 अगस्त 1942 को गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया। उन्होंने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

इसी दौरान वह भूमिगत हो गए पर बाद में गिरफ्तार कर लिए और फिर 945 में दूसरे बड़े नेताओं के साथ उन्हें भी रिहा कर दिया गया। उन्होंने 1946 में प्रांतीय चुनावों के दौरान अपनी कड़ी मेहनत से पंडित गोविन्द वल्लभ पंत को बहुत प्रभावित किया। लाल बहादुर की प्रशासनिक क्षमता और संगठन कौशल इस दौरान सामने आया। जबगोविन्द वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने लाल बहादुर को संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया। 1947 में शास्त्रीजी पंत मंत्रिमंडल में पुलिस और परिवहन मंत्री बने।

भारत के गणराज्य बनने के बाद जब पहले आम चुनाव आयोजित किये गए तब लाल बहादुर शास्त्री कांग्रेस पार्टी के महासचिव थे। कांग्रेस पार्टी ने भारी बहुमत के साथ चुनाव जीता। 1952 में जवाहर लाल नेहरू ने लाल बहादुर शास्त्री को केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेलवे और परिवहन मंत्री के रूप में नियुक्त किया। तृतीय श्रेणी के डिब्बों में यात्रियों को और अधिक सुविधाएं प्रदान करने में लाल बहादुर शास्त्री के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

उन्होंने रेलवे में प्रथम श्रेणी और तृतीय श्रेणी के बीच विशाल अंतर को कम किया। 1956 में लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। जवाहरलाल नेहरू ने शास्त्रीजी को मनाने की बहुत कोशिश की पर लाल बहादुर शास्त्री अपने फैसले पर कायम रहे। अपने कार्यों से लाल बहादुर शास्त्री ने सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के एक नए मानक को स्थापित किया ।

अगले आम चुनावों में जब कांग्रेस सत्ता में वापस आयी तब लाल बहादुर शास्त्री परिवहन और संचार मंत्री और बाद में वाणिज्य और उद्द्योग मंत्री बने। वर्ष 1961 में गोविन्द वल्लभ पंत के देहांत के पश्चात वह गृह मंत्री बने । सन 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान शास्त्रीजी ने देश की आतंरिक सुरक्षा बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1964 में जवाहरलाल नेहरू के मरणोपरांत सर्वसम्मति से लाल बहादुर शास्त्री को भारत का प्रधान मंत्री चुना गया। यह एक मुश्किल समय था और देश बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा था। देश में खाद्यान की कमी थी और पाकिस्तान सुरक्षा के मोर्चे पर समस्या खड़ा कर रहा था। 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। कोमल स्वभाव वाले लाल बहादुर शास्त्री ने इस अवसर पर अपनी सूझबूझ और चतुरता से देश का नेतृत्व किया। सैनिकों और किसानों को उत्साहित करने के लिए उन्होंने “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया। पाकिस्तान को युद्ध में हार का सामना करना पड़ा और शास्त्रीजी के नेतृत्व की प्रशंसा हुई।

जनवरी 1966 में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता के लिए ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान के बीच हुई बातचीत हुई। भारत और पाकिस्तान ने रूसी मध्यस्थता के तहत संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। संधि के तहत भारत युद्ध के दौरान कब्ज़ा किये गए सभी प्रांतो को पाकिस्तान को लौटने के लिए सहमत हुआ। 10 जनवरी 1966 को संयुक्त घोषणा पत्र हस्ताक्षरित हुआ और उसी रात को दिल का दौरा पड़ने से लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया।