Monday, January 19, 2026

खुदीराम बोस

 

खुदीराम बोस

 

★★★ जन्म :

 

3 दिसंबर, 1889, हबीबपुर, मिदनापुर ज़िला, बंगाल

 

★★★ स्वर्गवास :

 

11 अगस्त, 1908, मुजफ्फरपुर

 

★★★ कार्य : भारतीय क्रन्तिकारी :

 

भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास महान वीरों और उनके सैकड़ों साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है। ऐसे ही क्रांतिकारियों की सूची में एक नाम खुदीराम बोस का है। खुदीराम बोस एक भारतीय युवा क्रन्तिकारी थे जिनकी शहादत ने सम्पूर्ण देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी। खुदीराम बोस देश की आजादी के लिए मात्र 19 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ गये। इस वीर पुरुष की शहादत से सम्पूर्ण देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी। इनके वीरता को अमर करने के लिए गीत लिखे गए और इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। खुदीराम बोस के सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जो बंगाल में लोक गीत के रूप में प्रचलित हुए।

★★★ प्रारंभिक जीवन :

 

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 ई. को बंगाल में मिदनापुर ज़िले के हबीबपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रैलोक्य नाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिय देवी था। बालक खुदीराम के सिर से माता-पिता का साया बहुत जल्दी ही उतर गया था इसलिए उनका लालन-पालन उनकी बड़ी बहन ने किया। उनके मन में देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल थी कि उन्होंने स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ कर दिया था। सन 1902 और 1903 के दौरान अरविंदो घोष और भगिनी निवेदिता ने मेदिनीपुर में कई जन सभाएं की और क्रांतिकारी समूहों के साथ भी गोपनीय बैठकें आयोजित की।

 

खुदीराम भी अपने शहर के उस युवा वर्ग में शामिल थे जो अंग्रेजी हुकुमत को उखाड़ फेंकने के लिए आन्दोलन में शामिल होना चाहता था। खुदीराम प्रायः अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ होने वाले जलसे-जलूसों में शामिल होते थे तथा नारे लगाते थे। उनके मन में देश प्रेम इतना कूट-कूट कर भरा था कि उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और देश की आजादी में मर-मिटने के लिए जंग-ए-आज़ादी में कूद पड़े।

★★★ क्रांतिकारी जीवन :

 

बीसवीं शदी के प्रारंभ में स्वाधीनता आन्दोलन की प्रगति को देख अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन की चाल चली जिसका घोर विरोध हुआ। इसी दौरान सन् 1905 ई. में बंगाल विभाजन के बाद खुदीराम बोस स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपना क्रांतिकारी जीवन सत्येन बोस के नेतृत्व में शुरू किया था। मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने पुलिस स्टेशनों के पास बम रखा और सरकारी कर्मचारियों को निशाना बनाया। वह रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हो गए और वंदेमातरम के पर्चे वितरित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

सन 1906 में पुलिस ने बोस को दो बार पकड़ा – 28 फरवरी, सन 1906 को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बांटते हुए बोस पकडे गए पर पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहे। इस मामले में उनपर राजद्रोह का आरोप लगाया गया और उन पर अभियोग चलाया परन्तु गवाही न मिलने से खुदीराम निर्दोष छूट गये। दूसरी बार पुलिस ने उन्हें 16 मई को गिरफ्तार किया पर कम आयु होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

6 दिसंबर 1907 को खुदीराम बोस ने नारायणगढ़ नामक रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर साफ़-साफ़ बच निकला। वर्ष 1908 में उन्होंने वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर नामक दो अंग्रेज अधिकारियों पर बम से हमला किया लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया और वे बच गए।

★★★ किंग्जफोर्ड को मारने की योजना :

 

बंगाल विभाजन के विरोध में लाखों लोग सडकों पर उतरे और उनमें से अनेकों भारतीयों को उस समय कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। वह क्रान्तिकारियों को ख़ास तौर पर बहुत दण्डित करता था। अंग्रेजी हुकुमत ने किंग्जफोर्ड के कार्य से खुश होकर उसकी पदोन्नति कर दी और मुजफ्फरपुर जिले में सत्र न्यायाधीश बना दिया। क्रांतिकारियों ने किंग्जफोर्ड को मारने का निश्चय किया और इस कार्य के लिए चयन हुआ खुदीराम बोस और प्रफुल्लकुमार चाकी का। मुजफ्फरपुर पहुँचने के बाद इन दोनों ने किंग्जफोर्ड के बँगले और कार्यालय की निगरानी की।

 

30 अप्रैल 1908 को चाकी और बोस बाहर निकले और किंग्जफोर्ड के बँगले के बाहर खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे। खुदीराम ने अँधेरे में ही आगे वाली बग्गी पर बम फेंका पर उस बग्गी में किंग्स्फोर्ड नहीं बल्कि दो यूरोपियन महिलायें थीं जिनकी मौत हो गयी। अफरा-तफरी के बीच दोनों वहां से नंगे पाँव भागे। भाग-भाग कर थक गए खुदीराम वैनी रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां एक चाय वाले से पानी माँगा पर वहां मौजूद पुलिस वालों को उन पर शक हो गया और बहुत मशक्कत के बाद दोनों ने खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया। 1 मई को उन्हें स्टेशन से मुजफ्फरपुर लाया गया।

उधर प्रफ्फुल चाकी भी भाग-भाग कर भूक-प्यास से तड़प रहे थे। 1 मई को ही त्रिगुनाचरण नामक ब्रिटिश सरकार में कार्यरत एक आदमी ने उनकी मदद की और रात को ट्रेन में बैठाया पर रेल यात्रा के दौरान ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर को शक हो गया और उसने मुजफ्फरपुर पुलिस को इस बात की जानकारी दे दी। जब चाकी हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए मोकामाघाट स्टेशन पर उतरे तब पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी। अंग्रेजों के हाथों मरने के बजाए चाकी ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए।

★★★ गिरफ्तारी और फांसी :

 

खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया और फिर फांसी की सजा सुनाई गयी। 11 अगस्त सन 1908 को उन्हें फाँसी दे दी गयी। उस समय उनकी उम्र मात्र 18 साल और कुछ महीने थी। खुदीराम बोस इतने निडर थे कि हाथ में गीता लेकर ख़ुशी-ख़ुशी फांसी चढ़ गए।

उनकी निडरता, वीरता और शहादत ने उनको इतना लोकप्रिय कर दिया कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे और बंगाल के राष्ट्रवादियों और क्रांतिकारियों के लिये वह और अनुकरणीय हो गए। उनकी फांसी के बाद विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया और कई दिन तक स्कूल-कालेज बन्द रहे। इन दिनों नौजवानों में एक ऐसी धोती का प्रचलन हो चला था जिसकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।


रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई

 

★★★ जन्म :

 

19 नवम्बर 1828, वाराणसी

 

★★★ स्वर्गवास :

 

17 जून 1858

 

★★★ उपलब्धियां :

 

रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी थीं और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकुमत के विरुद्ध बिगुल बजाने वाले वीरों में से एक थीं। वे ऐसी वीरांगना थीं जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश साम्राज्य की सेना से मोर्चा लिया और रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हो गयीं परन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपने राज्य झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

★★★ प्रारंभिक जीवन :

 

लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले में 19 नवम्बर 1828 को एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसके बचपन का नाम मणिकर्णिका था पर परिवारवाले उन्हें स्नेह से मनु पुकारते थे। उनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे था और माता का नाम भागीरथी सप्रे। उनके माता-पिता महाराष्ट्र से सम्बन्ध रखते थे। जब लक्ष्मीबाई मात्र चार साल की थीं तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। उनके पिता मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माँ के निधन के बाद घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गये। वहां मनु के स्वभाव ने सबका मन मोह लिया और लोग उसे प्यार से “छबीली” कहने लगे।

 

शास्त्रों की शिक्षा के साथ-साथ मनु को शस्त्रों की शिक्षा भी दी गयी। सन 1842 में मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और इस प्रकार वे झाँसी की रानी बन गयीं और उनका नाम बदलकर लक्ष्मीबाई कर दिया गया। सन् 1851 में रानी लक्ष्मीबाई और गंगाधर राव को पुत्र रत्न की पारपत हुई पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। उधर गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। उन्होंने वैसा ही किया और पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को गंगाधर राव परलोक सिधार गए। उनके दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

★★★ अंग्रजों की राज्य हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स) और झाँसी :

 

ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत अंग्रेजों ने बालक दामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स नीति के तहत झाँसी राज्य का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में करने का फैसला कर लिया। हालाँकि रानी लक्ष्मीबाई ने अँगरेज़ वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया पर अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध कोई फैसला हो ही नहीं सकता था इसलिए बहुत बहस के बाद इसे खारिज कर दिया गया।

 

अंग्रेजों ने झाँसी राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगादाहर राव के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काटने का हुक्म दे दिया। अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को झाँसी का किला छोड़ने को कहा जिसके बाद उन्हें रानीमहल में जाना पड़ा। 7 मार्च 1854 को झांसी पर अंगरेजों का अधिकार कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में झाँसी की रक्षा करने का निश्चय किया।

★★★ अंग्रेजी हुकुमत से संघर्ष :

 

अंग्रेजी हुकुमत से संघर्ष के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भी भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। झाँसी की आम जनता ने भी इस संग्राम में रानी का साथ दिया। लक्ष्मीबाई की हमशक्ल झलकारी बाई को सेना में प्रमुख स्थान दिया गया।

अंग्रेजों के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई की जंग में कई और अपदस्त और अंग्रेजी हड़प नीति के शिकार राजाओं जैसे बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस कार्य में सहयोग देने का प्रयत्न करने लगे।

सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली। झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं।

तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया पर 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गयीं।



मदनमोहन मालवीय

मदनमोहन मालवीय

 

★★★ जन्म :

25 दिसंबर 1861, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

★★★ स्वर्गवास :

12 नवंबर 1946

★★★ कॅरिअरः राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद :

महात्मा गांधी ने उन्हें अपना बड़ा भाई कहा और भारत निर्माता की संज्ञा दी। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें एक ऐसी महान आत्मा कहा, जिन्होंने आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता की नींव रखी। वह व्यक्ति और कोई नहीं मदन मोहन मालवीय हैं, जिन्हें महात्मना (एक सम्मान) के नाम से भी जाना जाता है। वह एक महान राजनेता और शिक्षाविद थे। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जो भारत के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक है, की स्थापना की। वह एक ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए हरसंभव कोशिश की और आज वह युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं।

★★★ प्रारंभिक जीवन :

मदन मोहन मालवीय का जन्म इलाहाबाद के एक ब्राह्मण परिवार में 25 दिसंबर 1861 को हुआ था। वह अपने पिता पंडित बैजनाथ और माता मीना देवी के आठ बच्चों में से एक थे। पांच वर्ष की उम्र में उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई और उन्हें महाजनी स्कूल भेज दिया गया। इसके बाद वह धार्मिक विद्यालय चले गए जहां उनकी शिक्षा-दीक्षा हरादेव जी के मार्गदर्शन में हुई। यहीं से उनकी सोच पर हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रभाव पड़ा।

वर्ष 1868 में उन्होंने तब हाल ही में स्थापित हुए शासकीय हाईस्कूल में दाखिला लिया। 1879 में उन्होंने मूइर सेंट्रल कॉलेज (अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय) से मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1884 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए की शिक्षा पूरी की और 40 रुपये मासिक वेतन पर इलाहाबाद जिले में शिक्षक बन गए। वह आगे एम.ए. की पढ़ाई करना चाहते थे लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण ऐसा नहीं कर पाए।

★★★ कॅरिअर :

एक राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मदन मोहन के जीवन की शुरुआत वर्ष 1886 में कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भाग लेने के साथ हुई। इस शुरुआती अधिवेशन में उनके द्वारा दिए गए भाषण को वहां मौजूद लोगों ने काफी सराहा।  मदन मोहन के भाषण का असर महाराज श्रीरामपाल सिंह पर पड़ा। प्रभावित होकर महाराज ने उनसे साप्ताहिक समाचार पत्र हिंदुस्तान का संपादक बनने और उसका प्रबंधन संभालने की पेशकश की। ढाई वर्ष तक संपादक के पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद वह एल.एल.बी. की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद वापस चले आए। 1891 में उन्होंने अपनी एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की और इलाहाबाद जिला न्यायालय में प्रेक्टिस शुरू कर दी।

वर्ष 1893 में प्रगति करते हुए वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रेक्टिस करने लगे। वर्ष 1907 में मदन मोहन ने अभ्युदय नामक हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया और 1915 में इसे दैनिक समाचार पत्र में तब्दील कर दिया। इस अवधि के दौरान उन्होंने कुछ मासिक पत्रिकाएं और अंग्रेजी में एक दैनिक पत्र भी निकाला। 1909 में पहली बार मदन मोहन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। भारत में स्काउटिंग की स्थापना मदन मोहन मालवीय, न्यायमूर्ति विवियन बोस, पंडित ह्रदयनाथ कुंजरू, गिरजा शंकर बाजपेयी, एनी बेसेंट  और जॉर्ज अरुणदले के संयुक्त प्रयास से हुई। वर्ष 1913 से स्काउट में भारतीयों को प्रवेश मिलने लगा।

मदन मोहल मालवीय वर्ष 1912 से 1926 तक इंपीरियल विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1919 में इस परिषद को केंद्रीय विधान परिषद का नाम दिया गया। बनारस में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 21वें अधिवेशन में मदन मोहन ने एक हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार सबके सामने प्रस्तुत किया। 1915 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय विधेयक पास हो गया और 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। अब तक यह भारत में शिक्षा का प्रमुख संस्थान बना हुआ है। हालांकि शिक्षा और समाज कल्याण के लिए काम करने के लिए मदन मोहन मालवीय ने अपनी न्यायिक प्रेक्टिस सन 1911 में ही छोड़ दी थी लेकिन उन्होंने चौरी-चौरा कांड में दोषी बताए गए 177 लोगों को बचाने के लिए न्यायालय में केस लड़ा, इन सभी को फांसी की सजा सुनाई गई थी।

177 में 156 को कोर्ट ने दोष मुक्त घोषित किया। उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा 1920 में शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई और भारतीय इतिहास की दिग्गज हस्तियों जैसे लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू समेत कई अन्य के साथ साइमन कमीशन का विरोध किया। 30 मई 1932 को मदन मोहन ने घोषणा पत्र जारी कर भारतीय  खरीदो/ स्वदेशी खरीदो आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की। जब स्वतंत्रता लगभग मिलने ही वाली थी तब उन्होंने महात्मा गांधी को देश के विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता स्वीकार न करने की राय दी।

वह लखनऊ पैक्ट के तहत मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के पक्ष में नहीं थे और 1920 के दशक में खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी के भी विरोध में थे। वर्ष 1931 में उन्होंने पहले गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्हें सत्य की ही जीत होगी नारे को प्रसिद्ध करने वाले के तौर पर भी जाना जाता है।

मदन मोहन मालवीय ने बी.एच.यू. के कुलपति का पद शिक्षाविद एस. राधाकृष्णन के लिए छोड़ दिया, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। इस दौर में हिंदुस्तान टाइम्स अपने बुरे दिनों से गुजर रहा था और बंद होने की कगार पर था, तभी मदन मोहन मालवीय इसके तारणहार बनकर सामने आए। उन्होंने दैनिक जीवन में एक समाचार पत्र के महत्व और इसकी भूमिका का अहसास कराया। लाला लाजपत राय और एम. आर. जयकर जैसे राष्ट्रीय नेताओं तथा उद्योगपति जी डी बिरला के आर्थिक सहयोग से उन्होंने समाचार पत्र को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। 1946 तक वह इसके अध्यक्ष पद पर रहे। 1936 में समाचार पत्र का हिंदी संस्करण शुरू हो गया, यह उनके ही प्रयास का परिणाम था । वर्तमान में इस समाचार पत्र का स्वामित्व बिरला परिवार के पास है।

★★★ निजी जीवन :

16 वर्ष की उम्र में मदन मोहन मालवीय का विवाह मिर्जापुर की कुंदन देवी के साथ वर्ष 1878 में हो गया। उनकी पांच पुत्रियां और पांच पुत्र थे।

★★★ राजनीतिक जीवन :

जीवनकाल के प्रारम्भ से ही मालवीय जी राजनीति में रुचि लेने लगे और 1886 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सम्मिलित हुए। मालवीय जी दो बार 1909 तथा 1918 ई. में कांग्रेस के अध्यक्ष हुए। 1902 ई. में मालवीय जी उत्तर प्रदेश 'इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल' के सदस्य और बाद में 'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' के सदस्य चुने गये।

मालवीय जी ब्रिटिश सरकार के निर्भीक आलोचक थे और उन्होंने पंजाब की दमन नीति की तीव्र आलोचना की, जिसकी चरम परिणति जलियांवाला बाग़ काण्ड में हुई। वे कट्टर हिन्दू थे, परन्तु शुद्धि (हिन्दू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेने वालों को पुन: हिन्दू बना लेते) तथा अस्पृश्यता निवारण में विश्वास करते थे। वे तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1915 ई. में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' की स्थापना है। विश्वविद्यालय स्थापना के लिए उन्होंने सारे देश का दौरा करके देशी राजाओं तथा जनता से चंदा की भारी राशि एकत्रित की।

★★★ सम्पादक :

बालकृष्ण भट्ट के हिन्दी प्रदीप में हिन्दी के विषय में उन्होंने उन दिनों बहुत कुछ लिखा सन् 1886 ई. में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन के अवसर पर कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह से उनका परिचय हुआ तथा मालवीय जी की भाषा से प्रभावित होकर राजा साहब ने उन्हें दैनिक 'हिन्दुस्तान' का सम्पादक बनने पर राजी कर लिया। मालवीय जी के लिए यह एक यशस्वी जीवन का शुभ श्रीगणेश सिद्ध हुआ।

★★★ रचनाएँ :

★★ अभ्युदय (साप्ताहिक पत्र) :

सन 1905 ई. में मालवीय की हिन्दू विश्वविद्यालय की योजना प्रत्यक्ष रूप धारण कर चुकी थी। इसी के प्रचार की दृष्टि से उन्होंने 1907 ई. में 'अभ्युदय' की स्थापना की। मालवीय जी ने दो वर्ष तक इसका सम्पादन किया। प्रारम्भ में यह पत्र साप्ताहिक रहा, फिर सन् 1915 ई. से दैनिक हो गया।

★★★ लीडर और हिन्दुस्तान टाइम्स :

★★ लीडर (समाचार पत्र) :

'लीडर' और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' की स्थापना का श्रेय भी मालवीय जी को ही है। 'लीडर' के हिन्दी संस्करण 'भारत' का आरम्भ सन् 1921 में हुआ और 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का हिन्दी संस्करण 'हिन्दुस्तान' भी वर्षों से निकल रहा है। इनकी मूल प्रेरणा में मालवीय जी ही थे।

★★ मर्यादा (पत्रिका) :

'लीडर' के एक वर्ष बाद ही मालवीय जी ने 'मर्यादा' नामक पत्रिका निकलवाने का प्रबन्ध किया था। इस पत्र में भी वे बहुत दिनों तक राजनीतिक समस्याओं पर निबन्ध लिखते रहे। यह पत्रिका कुछ दिनों तक ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी से प्रकाशित होती रही।

★★★ सनातन धर्म :

सन 1906 ई. में इलाहाबाद के कुम्भ के अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म का विराट अधिवेशन कराया, जिसमें उन्होंने 'सनातन धर्म-संग्रह' नामक एक बृहत ग्रंथ तैयार कराकर महासभा में उपस्थित किया। कई वर्ष तक उस सनातन धर्म सभा के बड़े-बड़े अधिवेशन मालवीय जी ने कराये। अगले कुम्भ में त्रिवेणी के संगम पर इनका सनातन धर्म सम्मेलन भी इस सभा से मिल गया। सनातन धर्म सभा के सिद्धांतों के प्रचारार्थ काशी से 20 जुलाई, 1933 ई. को मालवीय जी की संरक्षता में 'सनातन धर्म' नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित होने लगा और लाहौर से मिश्रबन्धु निकला यह सब मालवीय जी के प्रयत्नों का ही फल था।

अन्य पत्रों को भी मालवीय जी सदा सहायक करते रहे। वे पत्रों द्वारा जनता में प्रचार करने में बहुत विश्वास रखते थे। और स्वयं वर्षों तक कई पत्रों के सम्पादक रहे। पत्रकारिता के अतिरिक्त वे विविध सम्मेलनों, सार्वजनिक सभाओं आदि में भी भाग लेते रहे। कई साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से उनका सम्पर्क हुआ तथा उनका सम्बन्ध आजीवन बना रहा। इसके अतिरिक्त 'सनातन धर्म सभा' के नेता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में जितने भी सनातन धर्म महाविद्यालयों की स्थापना हुई, वह मालवीय जी की सहायता से ही हुई। इनमें कानपुर, लाहौर, अलीगढ़, आदि स्थानों के सनातन धर्म महाविद्यालय उल्लेखनीय हैं।

★★★ हिन्दी के विकास में योगदान :

मालवीय जी एक सफल पत्रकार थे और हिन्दी पत्रकारिता से ही उन्होंने जीवन के कर्मक्षेत्र में पदार्पण किया। वास्तव में मालवीय जी ने उस समय पत्रों को अपने हिन्दी-प्रचार का प्रमुख साधन बना लिया और हिन्दी भाषा के स्तर को ऊँचा किया था। धीरे-धीरे उनका क्षेत्र विस्तृत होने लगा। पत्र सम्पादन से धार्मिक संस्थाएँ और इनसे सार्वजनिक सभाएँ विशेषकर हिन्दी के समर्थनार्थ और यहाँ से राजनीति की ओर इस क्रम ने उनसे सम्पादन कार्य छुड़वा दिया और वे विभित्र संस्थाओं के सदस्य, संस्थापक अथवा संरक्षक के रूप में सामने आने लगे। पत्रकार के रूप में उनकी हिन्दी सेवा की यही सीमा है, यद्यपि लेखक की हैसियत से वे भाषा और साहित्य की उत्रति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे। हिन्दी के विकास में उनके योगदान का तब दूसरा अध्याय आरम्भ हुआ।

हिन्दी की सबसे बड़ी सेवा मालवीय जी ने यह की कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की अदालतों और दफ़्तरों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पहले केवल उर्दू ही सरकारी दफ़्तरों और अदालतों की भाषा थी। यह आन्दोलन उन्होंने सन् 1890 ई. में आरम्भ किया था। तर्क और आँकडों के आधार पर शासकों को उन्होंने जो आवेदन पत्र भेजा उसमें लिखा कि पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध की प्रजा में शिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है और गुरुतर प्रमाणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों और सरकारी दफ़्तरों में नागरी अक्षर जारी किये जायेंगे।

अतएव अब इस शुभ कार्य में जरा-सा भी विलम्ब न होना चाहिए। सन् 1900 ई. में गवर्नर ने उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया और इस प्रकार हिन्दी को सरकारी कामकाज में हिस्सा मिला। 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के कुलपति की स्थिति में उपाधिवितरणोंत्सवों पर प्राय: मालवीय जी हिन्दी में ही भाषण करते थे। शिक्षा के माध्यम के विषय में मालवीय जी के विचार बड़े स्पष्ट थे। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरुह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।

★★★ हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान :

लोकमान्य तिलक, राजेन्द्र बाबू, और जवाहरलाल नेहरू के मौलिक या अनुदित साहित्य की तरह मालवीय जी की रचनाओं से हिन्दी की साहित्य निधि भरित नहीं हुई। इसलिए उनके सम्पूर्ण कृतित्व को आँकते हुए यह मानना होगा कि हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में मालवीय जी का योगदान क्रियात्मक अधिक है, रचनात्मक साहित्यकार के रूप में कम है। महामना मालवीय जी अपने युग के प्रधान नेताओं में थे। जिन्होंने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित कराया।

★★★ टाइमलाइन (जीवन घटनाक्रम) :

1861: मदनमोहन मालवीय का जन्म इलाहाबाद में हुआ

1878: कुंदन देवी से विवाह किया

1879: मुइर सेंट्रल कालेज से मेट्रिक की पढ़ाई पूरी की

1884: कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए की पढ़ाई पूरी की और इलाहाबाद जिले के विद्यालय में शिक्षक बन गए

1886: दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में भाग लिया

1887: राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्र में बतौर संपादक नौकरी शुरू की

1889: संपादक की नौकरी छोड़कर एलएलबी की पढ़ाई शुरू की

1891: एलएलबी पूरा करने के बाद इलाहाबाद जिला न्यायालय में प्रेक्टिस शुरू की

1907: अभ्युदय नामक साप्ताहिक हिंदी समाचारपत्र शुरू किया

1909: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने

1910: मर्यादा नामक हिंदी मासिक पत्रिका शुरू की

1911: समाज और देश सेवा के लिए अपनी जमी हुई वकालत की प्रेक्टिस छोड़ दी

1912.1926: इंपीरियल विधान परिषद के सदस्य रहे

1914.1946: ऑल इंडिया सेवा समिति में अपनी सेवाएं दीं

1915: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय विधेयक पास कराने में मुख्य भूमिका निभाई

1916: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई

1916 – 1918: औद्योगिक आयोग के सदस्य के तौर पर सेवाएं दीं

1919 – 1939: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर काम किया

1924 -1946: हिंदुस्तान टाइम्स समाचार पत्र के संचालक दल के चेयरमैन रहे

1928: साइमन कमीशन का विरोध किया

1931: प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया

1932: भारतीय खरीदो आंदोलन की बात करने वाला घोषणापत्र जारी किया

1939: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के लाइफ रेक्टर नियुक्त किए गए

1941: गोरक्षा मंडल की स्थापना की

★★★मृत्यु :

जीवन के अंतिम वर्षों में बीमारी के चलते मदन मोहन मालवीय का निधन 12 नवंबर 1946 को हो गया।

★★★ विरासत :

मदनमोहन मालवीय के नाम पर इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, भोपाल और जयपुर में रिहायशी क्षेत्रों को मालवीय नगर नाम दिया गया। उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया । उनके नाम पर मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्टनोलॉजी, जयपुर और मदन मोहन इंजीनियर कॉलेज गोरखपुर, उत्तरप्रदेश का नामकरण किया गया।

मदन मोहन मालवीय की पहल पर शुरू की गई आरती हरिद्वार में हर की पौड़ी घाट पर अब भी की जाती है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में असेंबली हॉल के मुख्य द्वार पर और पोर्च के बाहर पंडित मदन मोहन मालवीय की अर्द्ध प्रतिमाएं हैं। इनका उद्घाटन 25 दिसंबर 1971 को पंडित जी की जयंती पर किया गया था।



जगदीश चंद्र बोस

जगदीश चंद्र बोस

 

★★★ जन्म :

 

30 नवंबर, 1858, मेमनसिंह गाँव, बंगाल

 

★★★ स्वर्गवास :

 

23 नवंबर, 1937, गिरिडीह, बंगाल

 

★★★ उपलब्धियां :

 

श्री जगदीश चंद्र बोस भारत के प्रसिद्ध भौतिकविद् तथा पादपक्रिया वैज्ञानिक थे। जगदीश चंद्र बोस ने कई महान ग्रंथ भी लिखे हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित विषयों पर आधारित हैं, जैसे- सजीव तथा निर्जीव की अभिक्रियाएँ (1902), वनस्पतियों की अभिक्रिया (1906), पौधों की प्रेरक यांत्रिकी (1926) इत्यादि।

★★★ शिक्षा :

 

जगदीश चंद्र बोस ने ग्यारह वर्ष की आयु तक गाँव के ही एक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद ये कलकत्ता आ गये और 'सेंट जेवियर स्कूल' में प्रवेश लिया। जगदीश चंद्र बोस की जीव विज्ञान में बहुत रुचि थी फिर भी भौतिकी के एक विख्यात प्रो. फादर लाफोण्ट ने बोस को 'भौतिक शास्त्र' के अध्ययन के लिए प्रेरित किया। भौतिक शास्त्र में बी. ए. की डिग्री प्राप्त करने के बाद 22 वर्षीय बोस चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा के लिए लंदन चले गए। मगर स्वास्थ्य के ख़राब रहने की वजह से इन्होंने चिकित्सक (डॉक्टर) बनने का विचार छोड़ दिया और कैम्ब्रिज के 'क्राइस्ट महाविद्यालय' से बी. ए. की डिग्री ले ली।

★★★ अध्यापन :

 

जगदीश चंद्र बोस वर्ष 1885 में स्वदेश लौट कर आये और भौतिक विषय के सहायक प्राध्यापक के रूप में 'प्रेसिडेंसी कॉलेज' में अध्यापन करने लगे। यहाँ वह 1915 तक कार्यरत रहे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेज़ शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था। इसका श्री जगदीश चंद्र बोस ने बहुत विरोध किया और तीन वर्षों तक बिना वेतन लिए काम करते रहे, जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई और उन पर काफ़ी कर्ज़ भी हो गया था। इस कर्ज़ को चुकाने के लिये उन्होंने अपनी पुश्तैनी ज़मीन भी बेच दी।

 

चौथे वर्ष जगदीश चंद्र बोस की जीत हुई और उन्हें पूरा वेतन दे दिया गया। बोस एक बहुत अच्छे शिक्षक भी थे, वह कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का प्रयोग करते थे। बोस के ही कुछ छात्र सत्येंद्रनाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री बने। प्रेसिडेंसी कॉलेज से सेवानिवृत्त होने पर 1917 ई. में इन्होंने बोस रिसर्च इंस्टिट्यूट, कलकत्ता की स्थापना की और 1937 तक इसके निदेशक रहे।

★★★ प्रयोग और सफलता :

 

जगदीश चंद्र बोस ने सूक्ष्म तरंगों (माइक्रोवेव) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य तथा अपवर्तन, विवर्तन और ध्रुवीकरण के विषय में अपने प्रयोग आरंभ कर दिये थे। लघु तरंगदैर्ध्य, रेडियो तरंगों तथा श्वेत एवं पराबैंगनी प्रकाश दोनों के रिसीवर में गेलेना क्रिस्टल का प्रयोग बोस के द्वारा ही विकसित किया गया था।

 

मारकोनी के प्रदर्शन से 2 वर्ष पहले ही 1885 में बोस ने रेडियो तरंगों द्वारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में जगदीश चंद्र बोस ने दूर से एक घण्टी बजाई और बारूद में विस्फोट कराया था। आजकल प्रचलित बहुत सारे माइक्रोवेव उपकरण जैसे वेव गाईड, ध्रुवक, परावैद्युत लैंस, विद्युतचुम्बकीय विकिरण के लिये अर्धचालक संसूचक, इन सभी उपकरणों का उन्नींसवी सदी के अंतिम दशक में बोस ने अविष्कार किया और उपयोग किया था।

बोस ने ही सूर्य से आने वाले विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व का सुझाव दिया था जिसकी पुष्टि 1944 में हुई। इसके बाद बोस ने, किसी घटना पर पौधों की प्रतिक्रिया पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। बोस ने दिखाया कि यांत्रिक, ताप, विद्युत तथा रासायनिक जैसी विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाओं में सब्जियों के ऊतक भी प्राणियों के समान विद्युतीय संकेत उत्पन्न करते हैं।

★★★ 'नाइट' की उपाधि :

 

1917 में जगदीश चंद्र बोस को नाइट की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए 'रॉयल सोसायटी लंदन' के फैलो चुन लिए गए। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य किसी अच्छे (महगें) उपकरण और प्रयोगशाला से नहीं किया था, इसलिये जगदीश चंद्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाला बनाने की सोच रहे थे। 'बोस इंस्टीट्यूट' (बोस विज्ञान मंदिर) इसी विचार से प्रेरित है जो विज्ञान में शोध कार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है।

★★★ मृत्यु :

 

जगदीश चंद्र बोस की 23 नवंबर, 1937 को बंगाल के गिरिडीह नगर में मृत्यु हुई।


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